गिरफ़्तारी के समय आपके अधिकार

यह पन्ना अपने फ़ोन में सुरक्षित रखिए। हर अधिकार के साथ उसकी धारा दी गई है।

मुफ़्त कानूनी सहायता आपका अधिकार है (NALSA / ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण)।

गिरफ़्तारी के समय आपके अधिकार

  1. संविधान अनुच्छेद 22(1)

    गिरफ़्तारी का कारण जानने और अपनी पसंद के वकील का अधिकार

    संविधान का अनुच्छेद 22(1) कहता है कि गिरफ़्तार किए गए किसी भी व्यक्ति को गिरफ़्तारी के कारण बताए बिना हिरासत में नहीं रखा जाएगा, और उसे अपनी पसंद के विधि-व्यवसायी से परामर्श करने तथा उसके द्वारा प्रतिरक्षा कराने के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा।

    संविधान अनुच्छेद 22(1)
  2. संविधान अनुच्छेद 22(2)

    24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी

    अनुच्छेद 22(2) के अनुसार गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी से 24 घंटे के भीतर — यात्रा में लगे समय को छोड़कर — निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया जाएगा, और मजिस्ट्रेट के प्राधिकार के बिना उससे अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जाएगा।

    संविधान अनुच्छेद 22(2)
  3. संविधान अनुच्छेद 20(3)भा.ना.सु.सं. धारा 180(पहले दं.प्र.सं. धारा 161)

    स्वयं के विरुद्ध साक्षी बनने की बाध्यता नहीं — चुप रहने का अधिकार

    अनुच्छेद 20(3) के अनुसार किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति को स्वयं अपने विरुद्ध साक्षी होने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 180(2) (पहले दं.प्र.सं. धारा 161(2)) इसी को प्रक्रिया में उतारती है: पुलिस अधिकारी के प्रश्नों का सच्चा उत्तर देना बाध्यकर है, किंतु उन प्रश्नों का नहीं जिनके उत्तर से आपके किसी आपराधिक आरोप, शास्ति या समपहरण में फँसने की प्रवृत्ति हो।

    नंदिनी सतपथी बनाम पी. एल. दानी (1978) में उच्चतम न्यायालय ने माना कि यह संरक्षण केवल न्यायालय तक सीमित नहीं है — यह अन्वेषण के चरण में और औपचारिक रूप से अभियुक्त बनाए जाने से पहले संदिग्ध व्यक्ति पर भी लागू होता है, और 'बाध्यता' में शारीरिक बल के अलावा मानसिक और परिस्थितिजन्य दबाव भी आता है।

    संविधान अनुच्छेद 20(3)पूरी धारा पढ़िए
  4. भा.ना.सु.सं. धारा 47(पहले दं.प्र.सं. धारा 50)

    गिरफ़्तारी के आधार और जमानत की सूचना

    भा.ना.सु.सं. की धारा 47 (पहले दं.प्र.सं. धारा 50) के अनुसार बिना वारंट गिरफ़्तार करने वाला पुलिस अधिकारी उस अपराध का पूरा विवरण और गिरफ़्तारी के आधार तुरंत बताएगा। यदि अपराध जमानतीय है तो वह यह भी बताएगा कि आप जमानत के हकदार हैं और प्रतिभू (ज़मानतदार) का प्रबंध कर सकते हैं।

    पूरी धारा पढ़िए
  5. भा.ना.सु.सं. धारा 48(पहले दं.प्र.सं. धारा 50A)

    अपने बताए हुए व्यक्ति को सूचना

    भा.ना.सु.सं. की धारा 48 (पहले दं.प्र.सं. धारा 50क) के अनुसार गिरफ़्तार करने वाला व्यक्ति आपके बताए हुए मित्र, नातेदार या अन्य व्यक्ति को — और ज़िले के नामित पुलिस अधिकारी को भी — गिरफ़्तारी और आपको कहाँ रखा गया है, इसकी सूचना तुरंत देगा। थाने में रखी बही में यह दर्ज होगा कि किसे सूचित किया गया, और पेशी पर मजिस्ट्रेट इसका पालन सुनिश्चित करेगा।

    पूरी धारा पढ़िए
  6. भा.ना.सु.सं. धारा 36(पहले दं.प्र.सं. धारा 41B)

    गिरफ़्तारी ज्ञापन, जिस पर एक साक्षी के हस्ताक्षर हों

    भा.ना.सु.सं. की धारा 36 (पहले दं.प्र.सं. धारा 41ख) के अनुसार गिरफ़्तार करने वाला अधिकारी अपने नाम और पदनाम की स्पष्ट, दृश्य पहचान धारण करेगा; गिरफ़्तारी का ज्ञापन तैयार करेगा जिसे कम से कम एक साक्षी — परिवार का सदस्य या मुहल्ले का प्रतिष्ठित व्यक्ति — अनुप्रमाणित करेगा और जिस पर गिरफ़्तार व्यक्ति प्रतिहस्ताक्षर करेगा; और उसे यह बताएगा कि उसे अपने नातेदार या मित्र को सूचित कराने का अधिकार है।

    पूरी धारा पढ़िए
  7. भा.ना.सु.सं. धारा 38(पहले दं.प्र.सं. धारा 41D)

    पूछताछ के दौरान वकील से मिलना

    भा.ना.सु.सं. की धारा 38 (पहले दं.प्र.सं. धारा 41घ) के अनुसार गिरफ़्तार व्यक्ति को पूछताछ के दौरान अपनी पसंद के अधिवक्ता से मिलने का अधिकार है — यद्यपि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं।

    पूरी धारा पढ़िए
  8. भा.ना.सु.सं. धारा 43(5)(पहले दं.प्र.सं. धारा 46)

    सूर्यास्त के बाद किसी महिला की गिरफ़्तारी नहीं

    भा.ना.सु.सं. की धारा 43(5) (पहले दं.प्र.सं. धारा 46(4)) के अनुसार असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर किसी महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा; और जहाँ ऐसी परिस्थितियाँ हों, वहाँ महिला पुलिस अधिकारी लिखित रिपोर्ट देकर स्थानीय अधिकारिता वाले प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुमति प्राप्त करेगी।

    पूरी धारा पढ़िए
  9. भा.ना.सु.सं. धारा 53(पहले दं.प्र.सं. धारा 54)

    गिरफ़्तारी के तुरंत बाद चिकित्सीय परीक्षा और उसकी रिपोर्ट

    भा.ना.सु.सं. की धारा 53 (पहले दं.प्र.सं. धारा 54) के अनुसार गिरफ़्तार किए गए हर व्यक्ति की, गिरफ़्तारी के तुरंत बाद, केंद्र या राज्य सरकार की सेवा में लगे चिकित्सा अधिकारी द्वारा — और वह उपलब्ध न हो तो किसी रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा — परीक्षा की जाएगी। स्त्री की देह-परीक्षा केवल महिला चिकित्सा अधिकारी द्वारा या उसकी देखरेख में होगी, और वह उपलब्ध न हो तो महिला रजिस्ट्रीकृत चिकित्सा व्यवसायी द्वारा। चिकित्सा अधिकारी परीक्षा का अभिलेख तैयार करेगा जिसमें शरीर पर पाई गई चोटें या हिंसा के चिह्न और वह अनुमानित समय दर्ज होगा जब वे कारित हुए हों; और उस रिपोर्ट की एक प्रति गिरफ़्तार व्यक्ति को, या उसके बताए हुए व्यक्ति को, दी जाएगी।

    पूरी धारा पढ़िए
  10. भा.ना.सु.सं. धारा 56(पहले दं.प्र.सं. धारा 55A)

    हिरासत में स्वास्थ्य और सुरक्षा

    भा.ना.सु.सं. की धारा 56 (पहले दं.प्र.सं. धारा 55क) के अनुसार जिस व्यक्ति की अभिरक्षा में अभियुक्त है, उसका यह कर्तव्य है कि वह अभियुक्त के स्वास्थ्य और सुरक्षा का उचित ध्यान रखे।

    पूरी धारा पढ़िए
  11. भा.ना.सु.सं. धारा 58(पहले दं.प्र.सं. धारा 57)

    24 घंटे से अधिक हिरासत नहीं

    भा.ना.सु.सं. की धारा 58 (पहले दं.प्र.सं. धारा 57) के अनुसार बिना वारंट गिरफ़्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के विशेष आदेश के बिना 24 घंटे से अधिक — थाने से मजिस्ट्रेट तक की यात्रा में लगे समय को छोड़कर — हिरासत में नहीं रखा जाएगा। इससे आगे की हिरासत धारा 187 (पहले दं.प्र.सं. धारा 167) के अधीन मजिस्ट्रेट के आदेश से ही हो सकती है।

    पूरी धारा पढ़िए
  12. भा.ना.सु.सं. धारा 35(3)(पहले दं.प्र.सं. धारा 41A)

    सात वर्ष तक के अपराध में गिरफ़्तारी के बजाय नोटिस

    भा.ना.सु.सं. की धारा 35(3) (पहले दं.प्र.सं. धारा 41क) के अनुसार जिन अपराधों में सज़ा सात वर्ष तक हो सकती है और जहाँ धारा 35(1) के अधीन गिरफ़्तारी अपेक्षित नहीं है, वहाँ पुलिस अधिकारी हाज़िर होने का नोटिस देगा। नोटिस का पालन करने वाले व्यक्ति को तब तक गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा जब तक अधिकारी गिरफ़्तारी के कारण लेखबद्ध न करे।

    अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में उच्चतम न्यायालय ने पुलिस और मजिस्ट्रेटों को निर्देश दिया कि सात वर्ष तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ़्तारी स्वतः न हो — धारा 41(1)(ख)(ii) की जाँच-सूची भरी जाए और मजिस्ट्रेट उसे देखे बिना हिरासत न दे। ये निर्देश अब भा.ना.सु.सं. की धारा 35 पर उसी तरह लागू होते हैं।

    पूरी धारा पढ़िए
  13. भा.ना.सु.सं. धारा 35(7)

    वृद्ध या अशक्त व्यक्ति की गिरफ़्तारी के लिए DSP की अनुमति

    भा.ना.सु.सं. की धारा 35(7) के अनुसार तीन वर्ष से कम के कारावास से दंडनीय अपराध में, यदि व्यक्ति अशक्त है या साठ वर्ष से अधिक आयु का है, तो पुलिस उप-अधीक्षक से अनिम्न पद के अधिकारी की पूर्व अनुमति के बिना गिरफ़्तारी नहीं होगी। यह संरक्षण BNSS में नया है — दं.प्र.सं. में इसका कोई समकक्ष नहीं था।

    पूरी धारा पढ़िए
  14. भा.ना.सु.सं. धारा 341(पहले दं.प्र.सं. धारा 304)

    राज्य के व्यय पर वकील — यदि आप वकील करने में असमर्थ हैं

    भा.ना.सु.सं. की धारा 341(1) के अनुसार जहाँ किसी न्यायालय के समक्ष विचारण या अपील में अभियुक्त की ओर से कोई अधिवक्ता नहीं है और न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के पास अधिवक्ता नियुक्त करने के लिए पर्याप्त साधन नहीं हैं, वहाँ न्यायालय उसकी प्रतिरक्षा के लिए राज्य के व्यय पर अधिवक्ता नियुक्त करेगा। पुरानी दं.प्र.सं. धारा 304(1) में यह अधिकार केवल सेशन न्यायालय के विचारण तक सीमित था। यह याचना नहीं, न्यायालय का कर्तव्य है — 'नियुक्त करेगा'।

    पूरी धारा पढ़िए
  15. भा.ना.सु.सं. धारा 187(3)(पहले दं.प्र.सं. धारा 167)

    60 / 90 दिन पर डिफ़ॉल्ट जमानत

    भा.ना.सु.सं. की धारा 187(3) के अनुसार यदि जाँच 90 दिन में पूरी नहीं होती — मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष या अधिक के कारावास वाले अपराधों में — और अन्य सभी अपराधों में 60 दिन में पूरी नहीं होती, तो अभियुक्त जमानत पर छूटने का हकदार है, बशर्ते वह जमानत देने को तैयार हो और दे दे। पुरानी दं.प्र.सं. धारा 167(2) में 'कम से कम दस वर्ष' कहा गया था। गिनती रिमांड के पहले दिन से होती है।

    पूरी धारा पढ़िए

जाँचिए: गिरफ़्तारी में क्या-क्या हुआ?

जो हुआ उस पर निशान लगाइए। यह कहीं सहेजा या भेजा नहीं जाता।

कौन-सी संहिता लागू होगी?

प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।

ऊपर हर अधिकार पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के अधीन दिया गया है। कोष्ठक में दी गई दं.प्र.सं. धारा संदर्भ के लिए है, और 1 जुलाई 2024 को पहले से लंबित मामले पर अब भी वही लागू होती है।

कौन-सी संहिता लागू होगी?

प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।