संविधान (57वाँ संशोधन) अधिनियम, 1987
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 332
संविधान (इक्यावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1984 को नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा में सीटों के आरक्षण और नागालैंड और मेघालय की विधान सभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करने के लिए अधिनियमित किया गया था।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (अट्ठावनवाँ संशोधन) विधेयक, 1987 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (अठावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1987 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
संविधान (इक्यावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1984 को नागालैंड, मेघालय, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश में अनुसूचित जनजातियों के लिए लोकसभा में सीटों के आरक्षण का प्रावधान करने और अनुच्छेद 330 और 332 में उपयुक्त संशोधन करके नागालैंड और मेघालय की विधान सभाओं में अनुसूचित जनजातियों के लिए सीटों के आरक्षण का प्रावधान करने के लिए अधिनियमित किया गया था। यद्यपि ये राज्य मुख्य रूप से आदिवासी क्षेत्र हैं, फिर भी उक्त अधिनियम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों को उन्नत वर्गों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में असमर्थता के कारण न्यूनतम प्रतिनिधित्व से वंचित न रहना पड़े।
2. संविधान (इक्यावनवाँ संशोधन) अधिनियम, यद्यपि औपचारिक रूप से लागू हो चुका है, तब तक पूर्णतः कार्यान्वित नहीं हो सकता जब तक इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण करने हेतु समानांतर कार्रवाई न की जाए। संविधान के अनुच्छेद 332 के अंतर्गत किसी भी राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों की संख्या का निर्धारण संविधान के अनुच्छेद 332(3) के प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा। यद्यपि, उत्तर-पूर्वी राज्यों में शामिल क्षेत्रों की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के विकास की स्थिति और अन्य प्रासंगिक बातों को ध्यान में रखते हुए, इन क्षेत्रों में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण हेतु अस्थायी रूप से विशेष व्यवस्था करना आवश्यक समझा जाता है, ताकि इन क्षेत्रों को संविधान में परिकल्पित सामान्य व्यवस्थाओं में सुगमतापूर्वक परिवर्तित किया जा सके। अतः, संविधान के अनुच्छेद 332 में आगे संशोधन करने का प्रस्ताव है ताकि इन राज्यों के लिए संविधान के अनुच्छेद 170 के तहत वर्ष 2000 के बाद पहली जनगणना के आधार पर सीटों के पुनर्व्यवस्थापन तक अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या निर्धारित करने हेतु एक अस्थायी प्रावधान किया जा सके।
3. प्रस्तावित संशोधन में यह प्रावधान किया गया है कि यदि इस संविधान संशोधन अधिनियम के लागू होने की तिथि को विद्यमान राज्यों की विधान सभाओं की सभी सीटें अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों द्वारा धारित हैं, तो एक को छोड़कर सभी सीटें अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित होंगी और अन्य मामलों में इतनी सीटें आरक्षित की जाएंगी जो कुल सीटों के अनुपात में वर्तमान विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों की संख्या के अनुपात से कम न हों।
4. यह विधेयक उपरोक्त उद्देश्य की प्राप्ति का प्रयास करता है। भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम। भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित रूप से अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (सत्तावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1987 कहा जा सकता है।
(2) यह ऐसी तिथि_675 से लागू होगा, जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे।
अनुच्छेद 332 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 332 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(3क) खंड (3) में किसी बात के होते हुए भी, वर्ष 2000 के बाद की पहली जनगणना के आधार पर अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड राज्यों की विधान सभाओं में सीटों की संख्या के अनुच्छेद 170 के तहत पुनर्व्यवस्थापन के प्रभावी होने तक, ऐसे किसी भी राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित सीटें निम्नलिखित होंगी:-
(क) यदि संविधान (सत्तावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1987 के लागू होने की तिथि को विद्यमान किसी राज्य की विधान सभा (जिसे इस खंड में आगे वर्तमान विधानसभा कहा गया है) की सभी सीटें अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों द्वारा धारित हैं, तो एक को छोड़कर सभी सीटें;
(ख) किसी अन्य मामले में, सीटों की ऐसी संख्या, जो कुल सीटों की संख्या के अनुपात में हो, वर्तमान विधानसभा में अनुसूचित जनजातियों के सदस्यों की संख्या (उक्त तिथि पर) के अनुपात से कम न हो।
(2) संविधान के अनुच्छेद 332 में उप-धारा (1) द्वारा किए गए संशोधन से अरुणाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा, मेघालय राज्य की विधान सभा, मिजोरम राज्य की विधान सभा या नागालैंड राज्य की विधान सभा में किसी भी प्रतिनिधित्व पर तब तक कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जब तक कि इस अधिनियम के प्रारंभ होने के समय विद्यमान अरुणाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा, मेघालय राज्य की विधान सभा, मिजोरम राज्य की विधान सभा या नागालैंड राज्य की विधान सभा भंग न हो जाए।
