संविधान (44वाँ संशोधन) अधिनियम, 1978
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 19
- 22
- 30
- 31ए
- 31सी
- 38
- 74
- 77
- 83
- 105
- 123
- 132
- 133
- 134
- 139ए
- 150
- 166
- 172
- 194
- 213
- 217
- 225
- 226
- 227
- 239बी
- 329
- 352
- 356
- 358
- 359
- 360
- 371एफ
लेख सम्मिलित किए गए
- 134 क
- 361ए
लेख प्रतिस्थापित
- 71
- 103
- 192
लेख हटा दिए गए
- 30
- 31
- 257ए
- 329ए
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- नौवीं अनुसूची
प्रभावित हिस्से
- भाग XII
हाल के अनुभवों से पता चला है कि संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकार, जिनमें जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार भी शामिल हैं, एक क्षणिक बहुमत द्वारा छीने जा सकते हैं।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (पैंतालीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1978 (विधेयक संख्या 88, 1978) के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
हाल के अनुभवों से यह स्पष्ट है कि संविधान द्वारा नागरिकों को प्रदत्त मौलिक अधिकार, जिनमें जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार भी शामिल हैं, एक क्षणिक बहुमत द्वारा छीने जा सकते हैं। अतः भविष्य में ऐसी स्थिति की पुनरावृत्ति से बचाव के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय करना और यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि जनता को अपने अधीन शासन व्यवस्था के स्वरूप को निर्धारित करने में प्रभावी भूमिका मिले। यह इस विधेयक के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है।
2. अतः यह प्रस्ताव किया जाता है कि संविधान में कुछ ऐसे परिवर्तन, जिनसे इसके धर्मनिरपेक्ष या लोकतांत्रिक स्वरूप को हानि पहुंचे, मौलिक अधिकारों का हनन हो या उन्हें छीना जाए, वयस्क मताधिकार के आधार पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों में बाधा उत्पन्न हो या न्यायपालिका की स्वतंत्रता से समझौता हो, तभी किए जा सकते हैं जब उन्हें भारत की जनता द्वारा जनमत संग्रह में बहुमत से अनुमोदित किया जाए, जिसमें कम से कम इक्यावन प्रतिशत मतदाता भाग लें। अनुच्छेद 368 में संशोधन इसी उद्देश्य से किया जा रहा है।
3. मौलिक अधिकारों को जो विशेष दर्जा देने का प्रयास किया जा रहा है, उसे देखते हुए संपत्ति का अधिकार, जिसके कारण संविधान में कई बार संशोधन हो चुके हैं, मौलिक अधिकार नहीं रहेगा और केवल एक कानूनी अधिकार बन जाएगा। इस उद्देश्य से अनुच्छेद 19 में आवश्यक संशोधन किए जा रहे हैं और अनुच्छेद 31 को हटाया जा रहा है। हालांकि, यह सुनिश्चित किया जाएगा कि मौलिक अधिकारों की सूची से संपत्ति को हटाने से अल्पसंख्यकों के अपनी पसंद के शैक्षणिक संस्थानों की स्थापना और प्रशासन के अधिकार पर कोई प्रभाव न पड़े।
4. इसी प्रकार, निजी खेती के लिए भूमि रखने वाले और निर्धारित सीमा के भीतर आने वाले व्यक्तियों के बाजार मूल्य पर मुआवजा प्राप्त करने के अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
5. संपत्ति, मौलिक अधिकार न रहते हुए भी, एक कानूनी अधिकार के रूप में स्पष्ट मान्यता प्राप्त होगी, और यह प्रावधान किया जाएगा कि किसी भी व्यक्ति को कानून के अनुसार ही उसकी संपत्ति से वंचित किया जाएगा।
6. अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल की घोषणा का व्यावहारिक प्रभाव संविधान में संशोधन करने जैसा होता है, जिससे आपातकाल की अवधि के लिए देश एकात्मक राज्य में परिवर्तित हो जाता है और नागरिकों के मौलिक अधिकारों—जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार सहित—को लागू कराने के लिए न्यायालयों में जाने का अधिकार निलंबित हो जाता है। अतः, यह सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय आवश्यक हैं कि इस शक्ति का उचित प्रयोग हो और इसका दुरुपयोग न हो। इसलिए, यह प्रस्ताव है कि आपातकाल की घोषणा केवल तभी जारी की जा सकती है जब भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से खतरे में हो। सशस्त्र विद्रोह की श्रेणी में न आने वाली आंतरिक अशांति आपातकाल की घोषणा जारी करने का आधार नहीं होगी।
7. इसके अतिरिक्त, यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी घोषणा उचित विचार-विमर्श के बाद ही जारी की जाए, यह प्रावधान किया जा रहा है कि आपातकाल की घोषणा केवल मंत्रिमंडल द्वारा राष्ट्रपति को दी गई लिखित सलाह के आधार पर ही की जा सकती है। इसके अतिरिक्त, चूंकि आपातकाल की घोषणा का व्यावहारिक प्रभाव संविधान में संशोधन करना होता है, इसलिए यह प्रावधान किया जा रहा है कि घोषणा को संसद के दोनों सदनों द्वारा संविधान में संशोधन के लिए आवश्यक बहुमत से अनुमोदित किया जाना आवश्यक होगा और यह अनुमोदन एक माह की अवधि के भीतर दिया जाना चाहिए। ऐसी कोई भी घोषणा केवल छह माह की अवधि के लिए लागू रहेगी और इसे केवल उसी बहुमत से पारित किए गए प्रस्तावों द्वारा ही बढ़ाया जा सकता है। यदि लोकसभा द्वारा घोषणा को जारी रखने के विरुद्ध कोई प्रस्ताव पारित किया जाता है तो घोषणा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा। लोकसभा के 10 प्रतिशत या उससे अधिक सदस्य घोषणा को अस्वीकार करने के प्रस्ताव पर विचार करने के लिए विशेष बैठक बुला सकते हैं।
8. आपातकालीन प्रावधानों के दुरुपयोग पर रोक लगाने और जीवन एवं स्वतंत्रता के अधिकार को सुदृढ़ बनाने के लिए, यह प्रावधान किया जाएगा कि किसी मौलिक अधिकार के प्रवर्तन हेतु न्यायालय में अपील करने के अधिकार को निलंबित करने की शक्ति का प्रयोग जीवन एवं स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के संबंध में नहीं किया जा सकता। स्वतंत्रता के अधिकार को इस प्रावधान द्वारा और भी सुदृढ़ किया गया है कि निवारक हिरासत संबंधी कोई भी कानून किसी भी स्थिति में दो महीने से अधिक की हिरासत को अधिकृत नहीं कर सकता, जब तक कि किसी सलाहकार बोर्ड ने ऐसी हिरासत के लिए पर्याप्त कारण की रिपोर्ट न दी हो। एक अतिरिक्त सुरक्षा उपाय के रूप में यह अनिवार्य किया जाएगा कि सलाहकार बोर्ड का अध्यक्ष संबंधित उच्च न्यायालय का सेवारत न्यायाधीश हो और बोर्ड का गठन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की अनुशंसाओं के अनुसार किया जाए।
9. संसद और राज्य विधानसभाओं की कार्यवाही की स्वतंत्र और बिना सेंसरशिप के रिपोर्टिंग करने के मीडिया के अधिकार की गारंटी देने के लिए एक विशेष प्रावधान किया जा रहा है। राज्यों में संवैधानिक तंत्र के ठप होने से संबंधित प्रावधान में संशोधन किया जा रहा है ताकि अनुच्छेद 356 के तहत जारी की गई उद्घोषणा पहली बार में केवल छह महीने की अवधि के लिए लागू रहेगी और सामान्यतः एक वर्ष से अधिक नहीं हो सकती। हालांकि, यदि आपातकाल की उद्घोषणा लागू है और चुनाव आयोग यह प्रमाणित करता है कि संबंधित राज्य की विधानसभा के चुनाव कराने में कठिनाइयों के कारण राष्ट्रपति शासन को एक वर्ष से आगे बढ़ाना आवश्यक है, तो उद्घोषणा की अवधि एक वर्ष से आगे बढ़ाई जा सकती है। यह मौजूदा तीन वर्ष की सीमा के अधीन है। इन परिवर्तनों से यह सुनिश्चित होगा कि चुनाव कराने के लिए आवश्यक न्यूनतम अवधि के बाद राज्य में लोकतांत्रिक शासन बहाल हो जाए।
10. विलंब से बचने के उद्देश्य से, अनुच्छेद 132, 133 और 134 में संशोधन करने और एक नया अनुच्छेद 134ए जोड़ने का प्रस्ताव है, जिसमें यह प्रावधान होगा कि उच्च न्यायालय को किसी पक्ष द्वारा मौखिक आवेदन के आधार पर या यदि उच्च न्यायालय उचित समझे तो स्वयं ही संबंधित निर्णय, डिक्री, अंतिम आदेश या सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद सर्वोच्च न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण पत्र देने के प्रश्न पर विचार करना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अपील के लिए विशेष अनुमति के मामलों को केवल अनुच्छेद 136 के तहत विनियमित किया जाएगा।
11. विधेयक में प्रस्तावित अन्य संशोधन मुख्य रूप से आंतरिक आपातकाल की अवधि के दौरान अधिनियमित संशोधनों के कारण संविधान में आई विकृतियों को दूर करने या सुधारने के लिए हैं।
12. विधेयक उपरोक्त उद्देश्यों की प्राप्ति का प्रयास करता है। खंडों पर दिए गए नोट्स विधेयक के विभिन्न प्रावधानों की विस्तृत व्याख्या करते हैं।
अनुभागों की व्यवस्था
1. संक्षिप्त शीर्षक और प्रारंभ
2. अनुच्छेद 19 का संशोधन
3. अनुच्छेद 22 का संशोधन
4. अनुच्छेद 30 में संशोधन
5. अनुच्छेद 30 के बाद उपशीर्षक का लोप
6. अनुच्छेद 31 का लोप
7. अनुच्छेद 31ए का संशोधन
8. अनुच्छेद 31सी में संशोधन
9. अनुच्छेद 38 में संशोधन
10. अनुच्छेद 71 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
11. अनुच्छेद 74 में संशोधन
12. अनुच्छेद 77 में संशोधन
13. अनुच्छेद 83 में संशोधन
14. अनुच्छेद 103 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
15. अनुच्छेद 105 में संशोधन
16. अनुच्छेद 123 में संशोधन
17. अनुच्छेद 132 का संशोधन
18. अनुच्छेद 133 का संशोधन
19. अनुच्छेद 134 में संशोधन
20. नए अनुच्छेद 134ए का समावेश
21. अनुच्छेद 139ए का संशोधन
22. अनुच्छेद 150 का संशोधन
23. अनुच्छेद 166 का संशोधन
24. अनुच्छेद 172 का संशोधन
25. अनुच्छेद 192 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
26. अनुच्छेद 194 का संशोधन
27. अनुच्छेद 213 में संशोधन
28. अनुच्छेद 217 का संशोधन
29. अनुच्छेद 225 का संशोधन
30. अनुच्छेद 226 का संशोधन
31. अनुच्छेद 227 का संशोधन
32. अनुच्छेद 239बी का संशोधन
33. अनुच्छेद 257ए का लोप
34. भाग XII में नए अध्याय IV का समावेश
35. अनुच्छेद 329 में संशोधन
36. अनुच्छेद 329ए का लोप
37. अनुच्छेद 352 में संशोधन
38. अनुच्छेद 356 में संशोधन
39. अनुच्छेद 358 में संशोधन
40. अनुच्छेद 359 में संशोधन
41. अनुच्छेद 360 का संशोधन
42. नए अनुच्छेद 361ए का समावेश
43. अनुच्छेद 371एफ में संशोधन
44. नौवीं अनुसूची में संशोधन
45. संविधान संशोधन (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 कहा जा सकता है।
(2) यह अधिनियम ऐसे किसी तिथि से लागू होगा जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे तथा इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के लिए अलग-अलग तिथियां नियुक्त की जा सकती हैं।
अनुच्छेद 19 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 19 में,-
(क) खंड (1) में,-
(i) उपखंड (ई) में अंत में "और" शब्द जोड़ा जाएगा;
(ii) उप-खंड (f) को हटा दिया जाएगा;
(ख) खंड (5) में, शब्द, कोष्ठक और अक्षर "उपखंड (घ), (ङ) और (च)" के स्थान पर शब्द, कोष्ठक और अक्षर "उपखंड (घ) और (ङ)" प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
अनुच्छेद 22 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 22 में,-
(क) खंड (4) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(4) निवारक हिरासत का प्रावधान करने वाला कोई भी कानून किसी व्यक्ति को दो महीने से अधिक समय तक हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा, जब तक कि उपयुक्त उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की सिफारिशों के अनुसार गठित एक सलाहकार बोर्ड उक्त दो महीने की अवधि समाप्त होने से पहले यह रिपोर्ट न दे दे कि उसकी राय में ऐसी हिरासत के लिए पर्याप्त कारण हैं।
बशर्ते कि सलाहकार बोर्ड में एक अध्यक्ष और कम से कम दो अन्य सदस्य होंगे, और अध्यक्ष उपयुक्त उच्च न्यायालय का सेवारत न्यायाधीश होगा तथा अन्य सदस्य किसी भी उच्च न्यायालय के सेवारत या सेवानिवृत्त न्यायाधीश होंगे:
इसके अलावा, इस खंड में कुछ भी किसी व्यक्ति को खंड (7) के उपखंड (क) के तहत संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून द्वारा निर्धारित अधिकतम अवधि से अधिक समय तक हिरासत में रखने का अधिकार नहीं देगा।
स्पष्टीकरण .-इस खंड में, "उपयुक्त उच्च न्यायालय" से तात्पर्य है,-
(i) भारत सरकार या उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए हिरासत आदेश के अनुसरण में किसी व्यक्ति की हिरासत के मामले में, दिल्ली केंद्र शासित प्रदेश का उच्च न्यायालय;
(ii) किसी राज्य (संघ राज्य क्षेत्र को छोड़कर) की सरकार द्वारा जारी किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की स्थिति में, उस राज्य का उच्च न्यायालय; और
(iii) किसी संघ शासित प्रदेश के प्रशासक या ऐसे प्रशासक के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकरण द्वारा जारी किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने की स्थिति में, संसद द्वारा इस संबंध में बनाए गए किसी कानून के तहत निर्दिष्ट उच्च न्यायालय।
(ख) खंड (7) में,-
(i) उप-खंड (क) को हटा दिया जाएगा;
(ii) उप-खंड (ख) को उप-खंड (क) के रूप में पुनः अंकित किया जाएगा; और
(iii) उप-खंड (ग) को उप-खंड (ख) के रूप में पुनः अक्षरबद्ध किया जाएगा तथा इस प्रकार पुनः अक्षरबद्ध उप-खंड में, शब्द, कोष्ठक, अक्षर और अंक "खंड (4) का उप-खंड (क)" के स्थान पर शब्द, कोष्ठक और अंक "खंड (4)" प्रतिस्थापित किया जाएगा।
अनुच्छेद 30 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 30 में खंड (1) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(1क) किसी अल्पमत संस्था द्वारा स्थापित और प्रशासित शैक्षणिक संस्था की किसी संपत्ति के अनिवार्य अधिग्रहण का प्रावधान करने वाला कोई कानून बनाते समय, जिसका उल्लेख खंड (1) में किया गया है, राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसी संपत्ति के अधिग्रहण के लिए उस कानून द्वारा निर्धारित या तय की गई राशि ऐसी हो जो उस खंड के तहत गारंटीकृत अधिकार को प्रतिबंधित या निरस्त न करे।
अनुच्छेद 30 के पश्चात् उपशीर्ष का लोप
संविधान के अनुच्छेद 30 के बाद आने वाले उपशीर्षक "संपत्ति का अधिकार" को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 31 का लोप
संविधान के अनुच्छेद 31 को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 31A का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 31ए में खंड (1) में, "अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31" शब्दों और अंकों के स्थान पर "अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 31C का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 31सी में, "अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31" शब्दों और अंकों के स्थान पर "अनुच्छेद 14 या अनुच्छेद 19" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 38 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 38 को उसके खंड (1) के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा और इस प्रकार पुनः क्रमांकित खंड के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(2) राज्य विशेष रूप से आय में असमानताओं को कम करने का प्रयास करेगा और न केवल व्यक्तियों के बीच बल्कि विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले या विभिन्न व्यवसायों में लगे लोगों के समूहों के बीच भी स्थिति, सुविधाओं और अवसरों में असमानताओं को समाप्त करने का प्रयास करेगा।
अनुच्छेद 71 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 71 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
71. राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित या उससे जुड़े मामले।
(1) राष्ट्रपति या उप-राष्ट्रपति के चुनाव से उत्पन्न होने वाले या उससे संबंधित सभी संदेह और विवादों की जांच और निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाएगा, जिसका निर्णय अंतिम होगा।
(2) यदि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति का राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में चुनाव अमान्य घोषित कर दिया जाता है, तो सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की तिथि को या उससे पहले राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के पद की शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और निष्पादन में उसके द्वारा किए गए कार्य उस घोषणा के कारण अमान्य नहीं होंगे।
(3) इस संविधान के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, संसद कानून द्वारा राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के चुनाव से संबंधित या उससे जुड़े किसी भी मामले को विनियमित कर सकती है।
(4) किसी व्यक्ति के राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति के रूप में चुने जाने पर, उसे चुनने वाले निर्वाचक मंडल के सदस्यों में किसी भी कारण से रिक्ति होने के आधार पर प्रश्न नहीं उठाया जाएगा।
अनुच्छेद 74 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 74 के खंड (1) में अंत में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद को ऐसी सलाह पर सामान्यतः या अन्यथा पुनर्विचार करने का निर्देश दे सकते हैं, और राष्ट्रपति ऐसे पुनर्विचार के बाद दी गई सलाह के अनुसार कार्य करेंगे।
अनुच्छेद 77 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 77 में खंड (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 83 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 83 में खंड (2) में, जहाँ कहीं भी “छह वर्ष” शब्द आते हैं, उनके स्थान पर “पाँच वर्ष” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
(2) अनुच्छेद 83 के खंड (2) में उपधारा (1) द्वारा किए गए संशोधन इस धारा के लागू होने की तिथि को विद्यमान लोकसभा पर भी लागू होंगे, तथा उस खंड के परंतुक के अधीन उस सदन की अवधि बढ़ाने के संबंध में संसद की शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अनुच्छेद 103 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 103 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
103. सदस्यों की अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय।
(1) यदि कोई प्रश्न उठता है कि संसद के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 102 के खंड (1) में उल्लिखित किसी अयोग्यता के अधीन हो गया है, तो प्रश्न राष्ट्रपति के निर्णय के लिए भेजा जाएगा और उनका निर्णय अंतिम होगा।
(2) ऐसे किसी भी प्रश्न पर निर्णय देने से पहले राष्ट्रपति चुनाव आयोग की राय प्राप्त करेंगे और उस राय के अनुसार कार्य करेंगे।
अनुच्छेद 105 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 105 में, खंड (3) में, "इस संविधान के प्रारंभ में यूनाइटेड किंगडम की संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स और उसके सदस्यों और समितियों के होंगे" शब्दों के स्थान पर, "संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 15 के लागू होने से ठीक पहले उस सदन और उसके सदस्यों और समितियों के होंगे" शब्द, अंक और कोष्ठक प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
अनुच्छेद 123 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 123 में खंड (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 132 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 132 में,-
(क) खंड (1) में, "यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित करता है" शब्दों के स्थान पर, "यदि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134ए के तहत प्रमाणित करता है" शब्द, अंक और अक्षर प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) खंड (2) को हटा दिया जाएगा;
(ग) खंड (3) में, "या ऐसी अनुमति दी जाती है" और "और, सर्वोच्च न्यायालय की अनुमति से, किसी अन्य आधार पर" शब्द हटा दिए जाएंगे।
अनुच्छेद 133 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 133 में, खंड (1) में, "यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित करता है-" शब्दों के स्थान पर, "यदि उच्च न्यायालय अनुच्छेद 134ए के तहत प्रमाणित करता है-" शब्द, अंक और अक्षर प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 134 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 134 में, खंड (1) के उपखंड (सी) में, "प्रमाणित करता है" शब्द के स्थान पर, शब्द, अंक और अक्षर "अनुच्छेद 134ए के तहत प्रमाणित करता है" प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
नए अनुच्छेद 134A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 134 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
134ए. सर्वोच्च न्यायालय में अपील के लिए प्रमाण पत्र।- प्रत्येक उच्च न्यायालय, अनुच्छेद 132 के खंड (1) या अनुच्छेद 133 के खंड (1) या अनुच्छेद 134 के खंड (1) में निर्दिष्ट निर्णय, डिक्री, अंतिम आदेश या सजा पारित करते हुए या देते हुए,-
(क) यदि वह उचित समझे तो अपनी पहल पर ऐसा कर सकती है; और
(ख) यदि पीड़ित पक्ष द्वारा या उसकी ओर से ऐसे निर्णय, डिक्री, अंतिम आदेश या सजा के पारित होने या दिए जाने के तुरंत बाद मौखिक आवेदन किया जाता है, तो वह ऐसे पारित होने या दिए जाने के बाद यथाशीघ्र यह निर्धारित करेगा कि क्या अनुच्छेद 132 के खंड (1) या अनुच्छेद 133 के खंड (1) या, जैसा भी मामला हो, अनुच्छेद 134 के खंड (1) के उपखंड (ग) में निर्दिष्ट प्रकृति का प्रमाण पत्र उस मामले के संबंध में दिया जा सकता है।
अनुच्छेद 139A का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 139ए में खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(1) जहां एक ही या सारतः एक ही विधि के प्रश्नों से संबंधित मामले सर्वोच्च न्यायालय और एक या एक से अधिक उच्च न्यायालयों या दो या दो से अधिक उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित हों और सर्वोच्च न्यायालय स्वयं या भारत के अटॉर्नी-जनरल द्वारा या ऐसे किसी मामले के किसी पक्ष द्वारा किए गए आवेदन पर संतुष्ट हो जाए कि ऐसे प्रश्न सामान्य महत्व के महत्वपूर्ण प्रश्न हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित मामले या मामलों को वापस ले सकता है और सभी मामलों का निपटारा स्वयं कर सकता है:
बशर्ते कि सर्वोच्च न्यायालय उक्त विधि संबंधी प्रश्नों का निर्धारण करने के बाद, इस प्रकार वापस लिए गए किसी भी मामले को, उन प्रश्नों पर अपने निर्णय की एक प्रति सहित, उस उच्च न्यायालय को लौटा सकता है जिससे मामला वापस लिया गया है, और उच्च न्यायालय उसे प्राप्त होने पर, उस निर्णय के अनुरूप मामले का निपटारा करेगा।
अनुच्छेद 150 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 150 में, "के साथ परामर्श के बाद" शब्दों के स्थान पर "की सलाह पर" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 166 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 166 में खंड (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 172 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 172 में खंड (1) में, जहाँ कहीं भी “छह वर्ष” शब्द आते हैं, उनके स्थान पर “पाँच वर्ष” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
(2) अनुच्छेद 172 के खंड (1) में उपधारा (1) द्वारा किए गए संशोधन-
(क) यह धारा किसी भी मौजूदा राज्य विधान सभा पर लागू नहीं होगी, जिसका अस्तित्व उसकी पहली बैठक के लिए निर्धारित तिथि से इस धारा के लागू होने की तिथि तक (दोनों तिथियां शामिल) चार वर्ष और आठ माह से अधिक हो, लेकिन ऐसी प्रत्येक विधानसभा, जब तक कि उसे पहले भंग न कर दिया जाए, निम्नलिखित तिथि की समाप्ति पर स्वतः भंग हो जाएगी-
(i) इस धारा के लागू होने की तिथि से चार महीने की अवधि; या
(ii) इसकी पहली बैठक के लिए निर्धारित तिथि से छह वर्ष की अवधि, इनमें से जो भी अवधि पहले समाप्त हो;
(ख) उक्त खंड (1) के परंतुक के अधीन ऐसी विधानसभा की अवधि बढ़ाने के संबंध में संसद की शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यह प्रत्येक अन्य मौजूदा राज्य विधान सभा पर लागू होगा।
स्पष्टीकरण 1.- संविधान के अनुच्छेद 371F के खंड (ख) में निर्दिष्ट सिक्किम राज्य की विधान सभा पर लागू होने के संबंध में, यह उपधारा इस प्रकार प्रभावी होगी मानो-
(i) उस विधानसभा की पहली बैठक के लिए निर्धारित तिथि 26 अप्रैल, 1975 थी; और
(ii) इस उपधारा के खंड (क) में “चार वर्ष और आठ महीने” तथा “छह वर्ष” के संदर्भ क्रमशः “तीन वर्ष और आठ महीने” तथा “पांच वर्ष” के संदर्भ थे।
स्पष्टीकरण II.-इस उपधारा में, "वर्तमान राज्य विधान सभा" से तात्पर्य इस धारा के लागू होने की तिथि को अस्तित्व में रही किसी राज्य की विधान सभा से है।
अनुच्छेद 192 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 192 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
192. सदस्यों की अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय।
(1) यदि किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन के किसी सदस्य के अनुच्छेद 191 के खंड (1) में उल्लिखित किसी अयोग्यता के अधीन होने के संबंध में कोई प्रश्न उठता है, तो प्रश्न राज्यपाल के निर्णय के लिए भेजा जाएगा और उनका निर्णय अंतिम होगा।
(2) ऐसे किसी भी प्रश्न पर निर्णय देने से पहले राज्यपाल चुनाव आयोग की राय प्राप्त करेगा और उस राय के अनुसार कार्य करेगा।
अनुच्छेद 194 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 194 में, खंड (3) में, "इस संविधान के प्रारंभ में यूनाइटेड किंगडम की संसद के हाउस ऑफ कॉमन्स और उसके सदस्यों और समितियों के होंगे" शब्दों के स्थान पर, "संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 26 के लागू होने से ठीक पहले उस सदन और उसके सदस्यों और समितियों के होंगे" शब्द, अंक और कोष्ठक प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
अनुच्छेद 213 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 213 में खंड (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 217 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 217 में, खंड (2) में,-
(क) उपखंड (ख) में अंत में आने वाला शब्द "या" हटा दिया जाएगा;
(ख) उप-खंड (ग) को हटा दिया जाएगा;
(ग) स्पष्टीकरण में, खंड (क) को खंड (अ) के रूप में पुनः अंकित किया जाएगा और इस प्रकार पुनः अंकित खंड (अ) से पहले निम्नलिखित को जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
"(क) भारत के भूभाग में किसी व्यक्ति द्वारा न्यायिक पद धारण करने की अवधि की गणना करते समय, न्यायिक पद धारण करने के बाद की वह अवधि भी शामिल की जाएगी, जिसमें वह व्यक्ति उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा हो या किसी न्यायाधिकरण का सदस्य रहा हो या संघ या राज्य के अधीन किसी ऐसे पद पर रहा हो जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान आवश्यक हो;"।
अनुच्छेद 225 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 225 में अंत में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि राजस्व से संबंधित किसी मामले या उसके संग्रह में आदेशित या किए गए किसी कार्य के संबंध में किसी भी उच्च न्यायालय द्वारा मूल क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर इस संविधान के प्रारंभ होने से ठीक पहले लागू कोई भी प्रतिबंध ऐसे क्षेत्राधिकार के प्रयोग पर अब लागू नहीं होगा।
अनुच्छेद 226 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 226 में,-
(क) खंड (1) में, "बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, अधिकार अधिकार और प्रमाणन, या इनमें से किसी भी प्रकार की रिट" से शुरू होने वाले और "ऐसी अवैधता के परिणामस्वरूप न्याय की पर्याप्त विफलता हुई है" शब्दों पर समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"हबियस कॉर्पस, परमादेश, निषेध, क्वो वारंटो और सर्टिओरारी की प्रकृति में रिट, या इनमें से कोई भी, भाग III द्वारा प्रदत्त किसी भी अधिकार के प्रवर्तन के लिए और किसी अन्य उद्देश्य के लिए।"
(ख) खंड (3), (4), (5) और (6) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(3) जहाँ किसी पक्षकार के विरुद्ध, चाहे निषेधाज्ञा या स्थगन के रूप में या किसी अन्य तरीके से, खंड (1) के अंतर्गत याचिका पर या उससे संबंधित किसी भी कार्यवाही पर अंतरिम आदेश दिया जाता है, तो-
(क) ऐसे पक्ष को याचिका की प्रतियां और ऐसे अंतरिम आदेश की मांग के समर्थन में सभी दस्तावेज उपलब्ध कराना; और
(ख) यदि कोई पक्षकार सुनवाई का अवसर प्राप्त करने के बाद, ऐसे आदेश को रद्द करने हेतु उच्च न्यायालय में आवेदन करता है और ऐसे आवेदन की एक प्रति उस पक्षकार को या उसके वकील को प्रदान करता है जिसके पक्ष में ऐसा आदेश दिया गया है, तो उच्च न्यायालय आवेदन प्राप्त होने की तिथि से या आवेदन की प्रति प्रदान किए जाने की तिथि से, जो भी बाद में हो, दो सप्ताह की अवधि के भीतर आवेदन का निपटारा करेगा, या यदि उस अवधि के अंतिम दिन उच्च न्यायालय बंद रहता है, तो उसके बाद अगले दिन खुलने से पहले आवेदन का निपटारा करेगा; और यदि आवेदन का निपटारा इस प्रकार नहीं किया जाता है, तो अंतरिम आदेश उस अवधि की समाप्ति पर, या, जैसा भी मामला हो, उक्त अगले दिन की समाप्ति पर रद्द हो जाएगा।
(ग) खंड (7) को खंड (4) के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा।
अनुच्छेद 227 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 227 में,-
(क) खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(1) प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन सभी न्यायालयों और न्यायाधिकरणों पर अधीक्षण का अधिकार होगा, जिनके संबंध में वह क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है।
(ख) खंड (5) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 239B का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 239बी में खंड (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 257A का लोप
संविधान के अनुच्छेद 257ए को हटा दिया जाएगा।
भाग XII में नए अध्याय IV का अंतःस्थापन
संविधान के भाग बारह में, अध्याय तृतीय के बाद, निम्नलिखित अध्याय जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
अध्याय IV.-संपत्ति का अधिकार
300ए. विधि के अधिकार के बिना किसी व्यक्ति को संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।
किसी भी व्यक्ति को कानून के अधिकार के बिना उसकी संपत्ति से वंचित नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 329 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 329 के आरंभिक भाग में, "परन्तु अनुच्छेद 329ए के प्रावधानों के अधीन" शब्द, अंक और अक्षर हटा दिए जाएंगे।
अनुच्छेद 329A का लोप
संविधान के अनुच्छेद 329ए को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 352 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 352 में,-
(क) खंड (1) में,-
(i) "आंतरिक अशांति" शब्दों के स्थान पर "सशस्त्र विद्रोह" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) अंत में निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
स्पष्टीकरण.- यदि राष्ट्रपति संतुष्ट हैं कि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से खतरे में है, तो युद्ध या ऐसे किसी आक्रमण या विद्रोह के वास्तविक घटित होने से पहले आपातकाल की घोषणा की जा सकती है।
(ख) खंड (2), (2क) और (3) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
(2) खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा को बाद की उद्घोषणा द्वारा बदला या निरस्त किया जा सकता है।
(3) राष्ट्रपति खंड (1) के तहत कोई उद्घोषणा जारी नहीं करेगा, न ही ऐसी उद्घोषणा में संशोधन करने वाली कोई उद्घोषणा जारी करेगा, जब तक कि केंद्रीय मंत्रिमंडल (अर्थात् अनुच्छेद 75 के तहत नियुक्त प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल श्रेणी के अन्य मंत्रियों से मिलकर बनी परिषद) का यह निर्णय कि ऐसी उद्घोषणा जारी की जा सकती है, उसे लिखित रूप में सूचित न कर दिया गया हो।
(4) इस अनुच्छेद के तहत जारी की गई प्रत्येक उद्घोषणा संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी और पूर्व उद्घोषणा को निरस्त करने वाली उद्घोषणा को छोड़कर, एक माह की समाप्ति पर उसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उस अवधि की समाप्ति से पहले संसद के दोनों सदनों के प्रस्तावों द्वारा उसे अनुमोदित न कर दिया गया हो।
बशर्ते कि यदि ऐसी कोई उद्घोषणा (पिछली उद्घोषणा को निरस्त करने वाली उद्घोषणा न हो) ऐसे समय जारी की जाती है जब लोक सभा भंग हो चुकी हो, या लोक सभा का विघटन इस खंड में निर्दिष्ट एक माह की अवधि के दौरान होता है, और यदि राज्य परिषद द्वारा उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया गया हो, लेकिन उस अवधि की समाप्ति से पहले लोक सभा द्वारा ऐसी उद्घोषणा के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित न किया गया हो, तो लोक सभा के पुनर्गठन के बाद उसके प्रथम सत्र की तिथि से तीस दिनों की समाप्ति पर उद्घोषणा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उक्त तीस दिनों की अवधि की समाप्ति से पहले लोक सभा द्वारा उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव भी पारित न कर दिया गया हो।
(5) इस प्रकार अनुमोदित उद्घोषणा, जब तक निरस्त न की जाए, खंड (4) के अंतर्गत उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाले दूसरे प्रस्ताव के पारित होने की तिथि से छह माह की अवधि की समाप्ति पर प्रभावी होना बंद हो जाएगी;
बशर्ते कि यदि संसद के दोनों सदनों द्वारा ऐसी उद्घोषणा को लागू रखने की मंजूरी देने वाला प्रस्ताव पारित किया जाता है, और जब तक ऐसा होता है, तब तक यह उद्घोषणा, निरस्त न किए जाने पर, उस तारीख से छह महीने की अतिरिक्त अवधि के लिए लागू रहेगी जिस तारीख को अन्यथा इस खंड के तहत इसका प्रभाव समाप्त हो जाता:
इसके अलावा, यदि किसी छह महीने की अवधि के दौरान लोकसभा भंग हो जाती है और राज्य परिषद द्वारा ऐसी उद्घोषणा को लागू रखने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया जाता है, लेकिन उक्त अवधि के दौरान लोकसभा द्वारा ऐसी उद्घोषणा को लागू रखने के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया जाता है, तो लोकसभा के पुनर्गठन के बाद पहली बार बैठने की तारीख से तीस दिनों की समाप्ति पर उद्घोषणा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उक्त तीस दिनों की अवधि समाप्त होने से पहले, लोकसभा द्वारा उद्घोषणा को लागू रखने के लिए एक प्रस्ताव पारित नहीं किया जाता है।
(6) खंड (4) और (5) के प्रयोजनों के लिए, संसद के किसी भी सदन द्वारा कोई प्रस्ताव केवल उस सदन की कुल सदस्यता के बहुमत से और उस सदन के उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित किया जा सकता है।
(7) पूर्ववर्ती खंडों में किसी बात के होते हुए भी, राष्ट्रपति खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा या ऐसी उद्घोषणा में संशोधन करने वाली उद्घोषणा को निरस्त कर देगा, यदि लोक सभा ऐसी उद्घोषणा को अस्वीकृत करने वाला या, जैसा भी मामला हो, ऐसी उद्घोषणा के लागू रहने को अस्वीकृत करने वाला प्रस्ताव पारित कर दे।
(8) जहाँ लोकसभा के कुल सदस्यों में से कम से कम एक-दसवें सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित लिखित सूचना दी गई हो, जिसमें खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा या ऐसी उद्घोषणा में संशोधन करने वाली उद्घोषणा को अस्वीकृत करने या, जैसा भी मामला हो, उसके लागू रहने को अस्वीकृत करने के लिए प्रस्ताव लाने का उनका इरादा हो,-
(क) सदन के सत्र में होने की स्थिति में अध्यक्ष को; या
(ख) यदि सदन सत्र में न हो, तो अध्यक्ष या, जैसा भी मामला हो, राष्ट्रपति द्वारा ऐसी सूचना प्राप्त होने की तिथि से चौदह दिनों के भीतर सदन की एक विशेष बैठक आयोजित की जाएगी, ताकि ऐसे प्रस्ताव पर विचार किया जा सके।
(ग) खंड (4) को खंड (9) के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा तथा इस प्रकार पुनः क्रमांकित खंड में, जहाँ कहीं भी “आंतरिक अशांति” शब्द आते हैं, वहाँ उनके स्थान पर “सशस्त्र विद्रोह” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे;
(घ) खंड (5) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 356 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 356 में,-
(क) खंड (4) में,-
(i) खंड (3) के तहत उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाले दूसरे प्रस्ताव के पारित होने की तिथि से एक वर्ष के लिए शब्द, कोष्ठक और अंक के स्थान पर "उद्घोषणा जारी होने की तिथि से छह महीने" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) प्रथम परंतुक में, "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर "छह माह" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(iii) द्वितीय परंतुक में, "एक वर्ष" शब्दों के स्थान पर "छह माह" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) खंड (5) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(5) खंड (4) में किसी बात के होते हुए भी, खंड (3) के तहत अनुमोदित किसी उद्घोषणा को जारी होने की तिथि से एक वर्ष की समाप्ति के बाद किसी अवधि के लिए लागू रखने के संबंध में संसद के किसी भी सदन द्वारा कोई प्रस्ताव तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि-
(क) ऐसे प्रस्ताव पारित होने के समय, पूरे भारत में या, जैसा भी मामला हो, राज्य के पूरे या किसी भाग में आपातकाल की घोषणा लागू हो, और
(ख) चुनाव आयोग यह प्रमाणित करता है कि संबंधित राज्य की विधान सभा के आम चुनाव कराने में कठिनाइयों के कारण ऐसे प्रस्ताव में निर्दिष्ट अवधि के दौरान खंड (3) के तहत अनुमोदित उद्घोषणा का लागू रहना आवश्यक है।
अनुच्छेद 358 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 358 को उस अनुच्छेद के खंड (1) के रूप में पुनः क्रमांकित किया जाएगा, और- (क) इस प्रकार पुनः क्रमांकित खंड (1) में,-
(i) आरंभिक भाग में, "जब आपातकाल की घोषणा लागू हो" शब्दों के स्थान पर, "जब आपातकाल की घोषणा लागू हो जिसमें यह घोषित किया गया हो कि भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा युद्ध या बाह्य आक्रमण से खतरे में है" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) परंतुक में, "जहाँ आपातकाल की घोषणा" शब्दों के स्थान पर "जहाँ ऐसी आपातकाल की घोषणा" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे;
(ख) इस प्रकार पुनः क्रमांकित खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(2) खंड (1) में कोई बात लागू नहीं होगी-
(क) किसी ऐसे कानून के लिए जिसमें यह उल्लेख न हो कि ऐसा कानून आपातकाल की घोषणा के संबंध में है जो उसके लागू होने के समय प्रभावी थी; या
(ख) किसी भी कार्यकारी कार्रवाई के लिए जो ऐसे प्रावधान वाले कानून के तहत न की गई हो।"
अनुच्छेद 359 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 359 में,-
(क) खंड (1) और (1क) में, "भाग तृतीय द्वारा प्रदत्त अधिकार" शब्दों और अंकों के स्थान पर, "भाग तृतीय द्वारा प्रदत्त अधिकार (अनुच्छेद 20 और 21 को छोड़कर)" शब्द, अंक और कोष्ठक प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) खंड (1क) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(1ख) खंड (1क) में कोई बात लागू नहीं होगी-
(क) किसी ऐसे कानून के लिए जिसमें यह उल्लेख न हो कि ऐसा कानून आपातकाल की घोषणा के संबंध में है जो उसके लागू होने के समय प्रभावी थी; या
(ख) किसी भी कार्यकारी कार्रवाई के लिए जो ऐसे प्रावधान वाले कानून के तहत न की गई हो।"
अनुच्छेद 360 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 360 में,-
(क) खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(2) खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा- (क) को बाद की उद्घोषणा द्वारा निरस्त या परिवर्तित किया जा सकता है;
(ख) इसे संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा;
(ग) दो महीने की समाप्ति पर इसका प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उस अवधि की समाप्ति से पहले संसद के दोनों सदनों के प्रस्तावों द्वारा इसे अनुमोदित न कर दिया गया हो:
बशर्ते कि यदि ऐसी कोई उद्घोषणा उस समय जारी की जाती है जब लोक सभा भंग हो चुकी हो या उप-खंड (ग) में निर्दिष्ट दो महीने की अवधि के दौरान लोक सभा भंग हो जाती है, और यदि राज्य परिषद द्वारा उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव पारित कर दिया गया हो, लेकिन उस अवधि की समाप्ति से पहले लोक सभा द्वारा ऐसी उद्घोषणा के संबंध में कोई प्रस्ताव पारित नहीं किया गया हो, तो लोक सभा के पुनर्गठन के बाद पहली बार बैठने की तारीख से तीस दिनों की समाप्ति पर उद्घोषणा का प्रभाव समाप्त हो जाएगा, जब तक कि उक्त तीस दिनों की अवधि की समाप्ति से पहले लोक सभा द्वारा उद्घोषणा को अनुमोदित करने वाला प्रस्ताव भी पारित न कर दिया गया हो।
(ख) खंड (5) को हटा दिया जाएगा।
नए अनुच्छेद 361A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 361 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
`361ए. संसद और राज्य विधानमंडलों की कार्यवाही के प्रकाशन का संरक्षण।-
(1) संसद के किसी सदन या विधान सभा, या जैसा भी मामला हो, राज्य के विधानमंडल के किसी सदन की कार्यवाही की सारतः सत्य रिपोर्ट किसी समाचार पत्र में प्रकाशित करने के संबंध में कोई व्यक्ति किसी भी न्यायालय में किसी भी दीवानी या आपराधिक कार्यवाही के लिए उत्तरदायी नहीं होगा, जब तक कि यह सिद्ध न हो जाए कि प्रकाशन दुर्भावना से किया गया था।
बशर्ते कि इस खंड में कोई भी बात संसद के किसी भी सदन या विधान सभा, या जैसा भी मामला हो, किसी राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन की गुप्त बैठक की कार्यवाही की किसी रिपोर्ट के प्रकाशन पर लागू नहीं होगी।
(2) खंड (1) किसी प्रसारण स्टेशन द्वारा प्रदान किए गए किसी कार्यक्रम या सेवा के भाग के रूप में वायरलेस टेलीग्राफी के माध्यम से प्रसारित रिपोर्टों या मामलों के संबंध में उसी प्रकार लागू होगा जैसे यह समाचार पत्र में प्रकाशित रिपोर्टों या मामलों के संबंध में लागू होता है।
स्पष्टीकरण - इस लेख में, "अखबार" में समाचार एजेंसी की रिपोर्ट शामिल है जिसमें अखबार में प्रकाशन के लिए सामग्री होती है।
अनुच्छेद 371F का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 371एफ में, खंड (सी) में, "छह वर्ष" शब्दों के स्थान पर "पांच वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे, और "पांच वर्ष" शब्दों के स्थान पर दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, "चार वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
नौवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की नौवीं अनुसूची में प्रविष्टियाँ 87, 92 और 130 हटा दी जाएंगी।
संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 का संशोधन
संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 में धारा 18, 19, 21, 22, 31, 32, 34, 35, 58 और 59 को हटा दिया जाएगा।
