संविधान (42वाँ संशोधन) अधिनियम, 1976
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 31सी
- 39
- 55
- 74
- 77
- 81
- 82
- 83
- 100
- 102
- 105
- 118
- 145
- 166
- 170
- 172
- 189
- 191
- 194
- 208
- 217
- 225
- 227
- 228
- 311
- 312
- 330
- 352
- 353
- 356
- 357
- 358
- 359
- 366
- 368
- 371एफ
लेख सम्मिलित किए गए
- 31
- 31डी
- 32ए
- 39ए
- 43 ए
- 48ए
- 131ए
- 139ए
- 144ए
- 226ए
- 228ए
- 257ए
लेख प्रतिस्थापित
- 103
- 150
- 192
- 226
कार्यक्रम प्रभावित हुए
- सातवीं अनुसूची
प्रभावित हिस्से
- भाग IV
- भाग XIV
किसी संविधान को जीवंत रहने के लिए विकसित होना आवश्यक है। यदि संविधान के विकास में बाधा डालने वाली चीजों को दूर नहीं किया गया, तो संविधान वस्तुतः निष्क्रिय हो जाएगा।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (चौवालीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1976 (विधेयक संख्या 91, 1976) के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
किसी संविधान को जीवंत रहने के लिए विकसित होना आवश्यक है। यदि संविधान के विकास में आने वाली बाधाओं को दूर नहीं किया गया, तो संविधान वस्तुतः निष्क्रिय हो जाएगा। गरीबी, अज्ञानता, बीमारी और अवसर की असमानता को समाप्त करने वाली सामाजिक-आर्थिक क्रांति के उद्देश्य को प्राप्त करने में उत्पन्न कठिनाइयों को दूर करने के लिए संविधान में संशोधन का प्रश्न पिछले कुछ वर्षों से सरकार और जनता का सक्रिय ध्यान आकर्षित कर रहा है।
2. संविधान में दिए गए लोकतांत्रिक संस्थान मूलतः सुदृढ़ हैं और प्रगति का मार्ग इनमें से किसी भी संस्थान को नीचा दिखाने में निहित नहीं है। हालांकि, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इन संस्थानों पर काफी दबाव और तनाव पड़ा है और निहित स्वार्थों ने जनहित को घोर हानि पहुंचाते हुए अपने स्वार्थों को बढ़ावा देने का प्रयास किया है।
3. अतः, संविधान में संशोधन करके समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और राष्ट्र की अखंडता के उच्च आदर्शों को स्पष्ट रूप से परिभाषित करने, निर्देशक सिद्धांतों को अधिक व्यापक बनाने और उन्हें उन मौलिक अधिकारों पर प्राथमिकता देने का प्रस्ताव है जिनका उपयोग निर्देशक सिद्धांतों को लागू करने के लिए सामाजिक-आर्थिक सुधारों को विफल करने के लिए किया गया है। साथ ही, नागरिकों के मौलिक कर्तव्यों को निर्दिष्ट करने और व्यक्तियों या संगठनों द्वारा की जाने वाली राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से निपटने के लिए विशेष प्रावधान करने का भी प्रस्ताव है।
4. संसद और राज्य विधानमंडल जनता की इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं और लोकतंत्र का सार यही है कि जनता की इच्छा सर्वोपरि हो। यद्यपि संविधान का अनुच्छेद 368 संशोधन शक्ति की सर्वव्यापी प्रकृति के संबंध में स्पष्ट और निश्चित है, फिर भी इस मामले को संदेह से परे रखना आवश्यक समझा जाता है। संसद और राज्य विधानमंडलों द्वारा अधिनियमित कानूनों की संवैधानिकता के पक्ष में अनुमान को मजबूत करने के लिए कानूनों की संवैधानिकता के प्रश्नों के निर्धारण हेतु न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या और किसी भी कानून को संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित करने के लिए कम से कम दो-तिहाई के विशेष बहुमत की आवश्यकता का प्रावधान किया गया है। साथ ही, केंद्रीय कानूनों की संवैधानिक वैधता के निर्धारण के संबंध में उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को समाप्त करने और इस संबंध में सर्वोच्च न्यायालय को अनन्य अधिकार क्षेत्र प्रदान करने का भी प्रस्ताव है, ताकि विभिन्न उच्च न्यायालयों में एक ही केंद्रीय कानून की वैधता से संबंधित कार्यवाही की बहुलता और परिणामस्वरूप एक राज्य में केंद्रीय कानून के वैध और दूसरे राज्य में अवैध होने की संभावना से बचा जा सके।
5. उच्च न्यायालयों में लंबित मामलों की बढ़ती संख्या को कम करने और सेवा मामलों, राजस्व मामलों और सामाजिक-आर्थिक विकास एवं प्रगति के संदर्भ में विशेष महत्व के कुछ अन्य मामलों के शीघ्र निपटान को सुनिश्चित करने के लिए, संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को संरक्षित रखते हुए, ऐसे मामलों से निपटने के लिए प्रशासनिक और अन्य न्यायाधिकरणों की स्थापना करना उचित समझा जाता है। अनुच्छेद 226 के तहत उच्च न्यायालयों के रिट अधिकार क्षेत्र में कुछ संशोधन करना भी आवश्यक है।
6. संविधान के कामकाज के आलोक में आवश्यक हो चुके कुछ अन्य संशोधनों को करने के लिए वर्तमान अवसर का लाभ उठाने का प्रस्ताव है।
7. विधेयक में प्रस्तावित विभिन्न संशोधनों को खंडों पर दिए गए नोटों में समझाया गया है।
8. विधेयक उपरोक्त उद्देश्यों को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
अनुभागों की व्यवस्था
1. संक्षिप्त शीर्षक और प्रारंभ
2. प्रस्तावना में संशोधन
3. अनुच्छेद 31 के बाद नया उपशीर्षक जोड़ना
4. अनुच्छेद 31सी में संशोधन
5. नए अनुच्छेद 31D का समावेश
6. नए अनुच्छेद 32ए का समावेश
7. अनुच्छेद 39 में संशोधन
8. नए अनुच्छेद 39ए का समावेश
9. नए अनुच्छेद 43ए का समावेश
10. नए अनुच्छेद 48ए का समावेश
11. नए भाग IVA का समावेश
12. अनुच्छेद 55 का संशोधन
13. अनुच्छेद 74 में संशोधन
14. अनुच्छेद 77 में संशोधन
15. अनुच्छेद 81 में संशोधन
16. अनुच्छेद 82 का संशोधन
17. अनुच्छेद 83 में संशोधन
18. अनुच्छेद 100 का संशोधन
19. अनुच्छेद 102 का संशोधन
20. अनुच्छेद 103 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
21. अनुच्छेद 105 का संशोधन
22. अनुच्छेद 118 का संशोधन
23. नए अनुच्छेद 131ए का समावेश
24. नए अनुच्छेद 139ए का समावेश
25. नए अनुच्छेद 144ए का समावेश
26. अनुच्छेद 145 का संशोधन
27. अनुच्छेद 150 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
28. अनुच्छेद 166 का संशोधन
29. अनुच्छेद 170 का संशोधन
30. अनुच्छेद 172 का संशोधन
31. अनुच्छेद 189 का संशोधन
32. अनुच्छेद 191 का संशोधन
33. अनुच्छेद 192 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
34. अनुच्छेद 194 में संशोधन
35. अनुच्छेद 208 का संशोधन
36. अनुच्छेद 217 का संशोधन
37. अनुच्छेद 225 का संशोधन
38. अनुच्छेद 226 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
39. नए अनुच्छेद 226ए का समावेश
40. अनुच्छेद 227 का संशोधन
41. अनुच्छेद 228 का संशोधन
42. नए अनुच्छेद 228ए का समावेश
43. नए अनुच्छेद 257ए का समावेश
44. अनुच्छेद 311 का संशोधन
45. अनुच्छेद 312 का संशोधन
46. भाग XIVA का नया समावेश
47. अनुच्छेद 330 का संशोधन
48. अनुच्छेद 352 का संशोधन
49. अनुच्छेद 353 में संशोधन
50. अनुच्छेद 356 में संशोधन
51. अनुच्छेद 357 में संशोधन
52. अनुच्छेद 358 का संशोधन
53. अनुच्छेद 359 में संशोधन
54. अनुच्छेद 366 में संशोधन
55. अनुच्छेद 368 में संशोधन
56. अनुच्छेद 371F में संशोधन
57. सातवीं अनुसूची में संशोधन
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 कहा जा सकता है।
(2) यह अधिनियम ऐसे किसी तिथि से लागू होगा जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे तथा इस अधिनियम के विभिन्न प्रावधानों के लिए अलग-अलग तिथियां नियुक्त की जा सकती हैं।
उद्देशिका का संशोधन
संविधान की प्रस्तावना में,-
(क) "संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य" शब्दों के स्थान पर "संप्रभु समाजवादी धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे; और (ख) "राष्ट्र की एकता" शब्दों के स्थान पर "राष्ट्र की एकता और अखंडता" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 31 के पश्चात् नए उपशीर्ष का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 31 के बाद निम्नलिखित उपशीर्षक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:--- "कुछ कानूनों का संरक्षण"
अनुच्छेद 31C का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 31सी में, "अनुच्छेद 39 के खंड (ख) या खंड (ग) में निर्दिष्ट सिद्धांत" शब्दों, कोष्ठकों, अक्षरों और अंकों के स्थान पर "भाग IV में निर्धारित सभी या कोई भी सिद्धांत" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
नए अनुच्छेद 31D का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 31सी के बाद और "संवैधानिक उपचारों का अधिकार" उपशीर्षक से पहले निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:---
31D. राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के संबंध में कानूनों का संरक्षण।
(1) अनुच्छेद 13 में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी कानून जो निम्नलिखित के लिए प्रावधान करता हो-
(क) राष्ट्रविरोधी गतिविधियों की रोकथाम या निषेध; या
(ख) राष्ट्रविरोधी संगठनों के गठन की रोकथाम या उन पर प्रतिबंध लगाना इस आधार पर अमान्य माना जाएगा कि यह अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 या अनुच्छेद 31 द्वारा प्रदत्त किसी भी अधिकार के साथ असंगत है, या उसे छीनता है या कम करता है।
(2) इस संविधान में किसी बात के होते हुए भी, संसद को खंड (1) के उपखंड (क) या उपखंड (ख) में निर्दिष्ट किसी भी मामले के संबंध में कानून बनाने का अधिकार होगा, जबकि किसी राज्य के विधानमंडल को यह अधिकार नहीं होगा।
(3) खंड (1) के उपखंड (क) या उपखंड (ख) में निर्दिष्ट किसी मामले के संबंध में कोई कानून, जो संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 5 के प्रारंभ होने से ठीक पहले लागू था, संसद द्वारा परिवर्तित, निरस्त या संशोधित किए जाने तक लागू रहेगा।
(4) इस अनुच्छेद में,-
(क) "संघ" से तात्पर्य व्यक्तियों के संघ से है;
(ख) किसी व्यक्ति या संगठन के संबंध में "राष्ट्र-विरोधी गतिविधि" से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति या संगठन द्वारा की गई किसी भी कार्रवाई से है-
(i) जिसका उद्देश्य किसी भी आधार पर भारत के भूभाग के किसी भाग का हस्तांतरण या भारत के भूभाग के किसी भाग का अलगाव करवाना हो, या जो किसी दावे का समर्थन करता हो, या जो शहरों में किसी व्यक्ति या संघ को ऐसा हस्तांतरण या अलगाव करवाने के लिए उकसाता हो;
(ii) जो भारत की संप्रभुता और अखंडता या राज्य की सुरक्षा या राष्ट्र की एकता को अस्वीकार करता है, उस पर सवाल उठाता है, उसे धमकी देता है, बाधित करता है या उसे धमकी देने या बाधित करने का इरादा रखता है;
(iii) जिसका उद्देश्य बलपूर्वक विधि द्वारा स्थापित सरकार को उखाड़ फेंकना है, या जो किसी ऐसी योजना का हिस्सा है जिसका उद्देश्य बलपूर्वक सरकार को उखाड़ फेंकना है;
(iv) जिसका उद्देश्य आंतरिक अशांति पैदा करना या सार्वजनिक सेवाओं में व्यवधान उत्पन्न करना है, या जो किसी ऐसी योजना का हिस्सा है जिसका उद्देश्य आंतरिक अशांति या सार्वजनिक सेवाओं में व्यवधान उत्पन्न करना है;
(v) जिसका उद्देश्य विभिन्न धार्मिक, नस्लीय, भाषाई या क्षेत्रीय समूहों या जातियों या समुदायों के बीच सद्भाव को खतरे में डालना या बाधित करना है, या जो किसी ऐसी योजना का हिस्सा है जिसका उद्देश्य ऐसा करना है;
(ग) "राष्ट्र-विरोधी संगठन" से तात्पर्य एक ऐसे संगठन से है---
(i) जिसका उद्देश्य कोई राष्ट्रविरोधी गतिविधि हो;
(ii) जो व्यक्तियों को किसी राष्ट्रविरोधी गतिविधि में शामिल होने या उसे अंजाम देने के लिए प्रोत्साहित करता है या सहायता करता है;
(iii) जिनके सदस्य किसी राष्ट्रविरोधी गतिविधि में भाग लेते हैं या उसमें संलग्न होते हैं।
नए अनुच्छेद 32A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 32 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
32ए. अनुच्छेद 32 के अंतर्गत कार्यवाही में राज्य कानूनों की संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 32 में किसी बात के होते हुए भी, सर्वोच्च न्यायालय उस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी भी कार्यवाही में किसी राज्य कानून की संवैधानिक वैधता पर तब तक विचार नहीं करेगा जब तक कि ऐसी कार्यवाही में किसी केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता का मुद्दा भी न हो।
अनुच्छेद 39 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 39 में खंड (एफ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(f) बच्चों को स्वस्थ तरीके से और स्वतंत्रता एवं गरिमा की स्थितियों में विकसित होने के अवसर और सुविधाएं दी जाएं तथा बचपन और युवावस्था को शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से बचाया जाए।
नए अनुच्छेद 39A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 39 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:---
39ए. समान न्याय और निःशुल्क कानूनी सहायता।
राज्य यह सुनिश्चित करेगा कि विधिक व्यवस्था का संचालन समान अवसर के आधार पर न्याय को बढ़ावा दे, और विशेष रूप से, उपयुक्त कानून या योजनाओं या किसी अन्य तरीके से मुफ्त कानूनी सहायता प्रदान करेगा, ताकि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसरों से वंचित न किया जाए।
नए अनुच्छेद 43A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 43 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:---
43ए. उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी।
राज्य, उपयुक्त कानून बनाकर या किसी अन्य तरीके से, किसी भी उद्योग में लगे उपक्रमों, प्रतिष्ठानों या अन्य संगठनों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाएगा।
नए अनुच्छेद 48A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 48 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:---
48ए. पर्यावरण संरक्षण एवं सुधार तथा वनों और वन्य जीवन की सुरक्षा।
राज्य पर्यावरण की रक्षा और सुधार करने तथा देश के वनों और वन्य जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा। नए भाग IV का सम्मिलन।
नए भाग IVA का अंतःस्थापन
संविधान के भाग IV के बाद निम्नलिखित भाग जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
भाग IV मौलिक कर्तव्य
51ए. मौलिक कर्तव्य.- भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा---
(क) संविधान का पालन करना तथा उसके आदर्शों और संस्थाओं, राष्ट्रीय ध्वज और राष्ट्रीय गान का सम्मान करना;
(ख) उन महान आदर्शों को संजोना और उनका पालन करना जिन्होंने हमारे राष्ट्रीय स्वतंत्रता संग्राम को प्रेरित किया;
(ग) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को बनाए रखना और उसकी रक्षा करना;
(घ) बुलाए जाने पर देश की रक्षा करना और राष्ट्रीय सेवा प्रदान करना;
(ई) धार्मिक, भाषाई और क्षेत्रीय या सांप्रदायिक विविधताओं से परे भारत के सभी लोगों के बीच सद्भाव और सामान्य भाईचारे की भावना को बढ़ावा देना; महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का त्याग करना;
(f) हमारी मिश्रित संस्कृति की समृद्ध विरासत को महत्व देना और संरक्षित करना;
(जी) वनों, झीलों, नदियों और वन्य जीवन सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और सुधार करना तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखना;
(h) वैज्ञानिक सोच, मानवतावाद और जिज्ञासा एवं सुधार की भावना विकसित करना;
(i) सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करना और हिंसा का त्याग करना;
(j) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कृष्टता की ओर प्रयास करना ताकि राष्ट्र निरंतर प्रयास और उपलब्धि के उच्च स्तरों तक पहुंचता रहे।
अनुच्छेद 55 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 55 में स्पष्टीकरण के स्थान पर निम्नलिखित स्पष्टीकरण प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
स्पष्टीकरण - इस लेख में, "जनसंख्या" अभिव्यक्ति से तात्पर्य पिछली जनगणना में निर्धारित जनसंख्या से है जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित किए जा चुके हैं।
बशर्ते कि इस स्पष्टीकरण में पिछली जनगणना का, जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं, उल्लेख, वर्ष 2000 के बाद हुई पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित होने तक, 1971 की जनगणना के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
अनुच्छेद 74 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 74 में खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(1) राष्ट्रपति को सहायता और सलाह देने के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद होगी, और राष्ट्रपति अपने कार्यों के निष्पादन में ऐसी सलाह के अनुसार कार्य करेगा।"
अनुच्छेद 77 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 77 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(4) कोई भी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी भारत सरकार के कामकाज के सुगम संचालन के लिए खंड (3) के अंतर्गत बनाए गए किसी भी नियम को प्रस्तुत करने की मांग करने का हकदार नहीं होगा।
अनुच्छेद 81 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 81 में खंड (3) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
इस खंड में पिछली जनगणना का, जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं, उल्लेख, वर्ष 2000 के बाद हुई पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित होने तक, 1971 की जनगणना के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
अनुच्छेद 82 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 82 में परंतुक के बाद निम्नलिखित परंतुक जोड़े जाएंगे, अर्थात्:---
इसके अलावा, यह भी प्रावधान है कि ऐसा पुनर्व्यवस्थापन राष्ट्रपति द्वारा आदेश द्वारा निर्दिष्ट तिथि से प्रभावी होगा और जब तक ऐसा पुनर्व्यवस्थापन प्रभावी नहीं हो जाता, तब तक सदन के लिए कोई भी चुनाव ऐसे पुनर्व्यवस्थापन से पहले विद्यमान क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर आयोजित किया जा सकता है।
इसके अलावा, जब तक वर्ष 2000 के बाद हुई पहली जनगणना के संबंधित आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते, तब तक इस अनुच्छेद के तहत लोकसभा में राज्यों को सीटों के आवंटन और प्रत्येक राज्य को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित करने की आवश्यकता नहीं होगी।
अनुच्छेद 83 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 83 में खंड (2) में, उन दो स्थानों पर जहाँ “पाँच वर्ष” शब्द आते हैं, उनके स्थान पर “छह वर्ष” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
(2) अनुच्छेद 83 के खंड (2) में उपधारा (1) द्वारा किए गए संशोधन इस धारा के लागू होने की तिथि को विद्यमान लोकसभा पर भी लागू होंगे, तथा उस खंड के परंतुक के अधीन उस सदन की अवधि बढ़ाने के संबंध में संसद की शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अनुच्छेद 100 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 100 में खंड (3) और (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 102 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 102 में खंड (1) के उपखंड (क) के स्थान पर निम्नलिखित उपखंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(क) यदि वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी ऐसे लाभ के पद पर आसीन है जिसे संसद द्वारा विधि द्वारा उसके धारक को अयोग्य घोषित किया गया हो;"।
अनुच्छेद 103 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 103 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
103. अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय।
(1) यदि कोई प्रश्न उठता है-
(क) क्या संसद के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 102 के खंड (1) में उल्लिखित किसी अयोग्यता के अधीन हो गया है, या
(ख) संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के तहत संसद के किसी सदन के चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोषी पाए जाने वाले व्यक्ति को संसद के किसी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य चुने जाने और सदस्य बने रहने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा या नहीं, या उसे कितने समय के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा, या ऐसी अयोग्यता को हटाया जाएगा या उसकी अवधि कम की जाएगी, इस संबंध में प्रश्न राष्ट्रपति के निर्णय के लिए भेजा जाएगा और उनका निर्णय अंतिम होगा।
(2) ऐसे किसी प्रश्न पर निर्णय देने से पहले राष्ट्रपति चुनाव आयोग से परामर्श करेंगे और चुनाव आयोग इस उद्देश्य से ऐसी जांच कर सकता है जैसा वह उचित समझे।
अनुच्छेद 105 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 105 में खंड (3) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(3) अन्य मामलों में, संसद के प्रत्येक सदन और उसके सदस्यों और समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ वही होंगी जो संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 21 के प्रारंभ होने के समय उस सदन और उसके सदस्यों और समितियों की थीं, और जिन्हें संसद के उस सदन द्वारा समय-समय पर विकसित किया जा सकता है।
अनुच्छेद 118 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 118 में, खंड (1) में, "इसकी प्रक्रिया" शब्दों के बाद, कोष्ठक और शब्द "(सदन की बैठक गठित करने के लिए कोरम सहित)" सम्मिलित किए जाएंगे।
नए अनुच्छेद 131A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 131 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
131ए. केंद्रीय कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्नों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय का अनन्य क्षेत्राधिकार।
(1) इस संविधान के किसी अन्य प्रावधान में निहित किसी बात के बावजूद, सर्वोच्च न्यायालय को किसी अन्य न्यायालय को छोड़कर, किसी केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता से संबंधित सभी प्रश्नों का निर्धारण करने का अधिकार होगा।
(2) जहाँ उच्च न्यायालय संतुष्ट हो-
(क) यदि उसके समक्ष या उसके अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले में किसी केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्न शामिल हों, या जैसा भी मामला हो, केंद्रीय और राज्य दोनों कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्न हों; और (ख) यदि ऐसे प्रश्नों का निर्धारण मामले के निपटारे के लिए आवश्यक हो, तो उच्च न्यायालय उन प्रश्नों को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय हेतु संदर्भित करेगा।
(3) खंड (2) के प्रावधानों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां भारत के अटॉर्नी-जनरल द्वारा किए गए आवेदन पर सर्वोच्च न्यायालय संतुष्ट हो,-
(क) कि उच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के अधीनस्थ न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले में किसी केंद्रीय कानून या, जैसा भी मामला हो, केंद्रीय और राज्य दोनों कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्न शामिल हैं; और
(ख) यदि ऐसे प्रश्नों का निर्धारण मामले के निपटारे के लिए आवश्यक है, तो सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय से इन प्रश्नों को निर्णय हेतु अपने पास भेजने का अनुरोध कर सकता है।
(4) जब खंड (2) या खंड (3) के तहत कोई संदर्भ दिया जाता है, तो उच्च न्यायालय मामले के संबंध में सभी कार्यवाही को तब तक स्थगित रखेगा जब तक कि सर्वोच्च न्यायालय संदर्भित प्रश्नों का निर्णय नहीं कर लेता।
(5) सर्वोच्च न्यायालय, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के बाद, संदर्भित प्रश्नों का निर्णय करेगा, और वह---
(क) या तो मामले का निपटारा स्वयं कर लें; या
(ख) मामले को उच्च न्यायालय को उसके निर्णय की प्रति सहित लौटा दिया जाए ताकि उच्च न्यायालय या, जैसा भी मामला हो, उसके अधीनस्थ न्यायालय द्वारा ऐसे निर्णय के अनुरूप मामले का निपटारा किया जा सके।
नए अनुच्छेद 139A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 139 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
139ए. कुछ मामलों का स्थानांतरण।
(1) यदि भारत के अटॉर्नी-जनरल द्वारा किए गए आवेदन पर सर्वोच्च न्यायालय संतुष्ट है कि एक ही या सारतः एक ही विधि के प्रश्न से संबंधित मामले उसके समक्ष और एक या एक से अधिक उच्च न्यायालयों के समक्ष या दो या दो से अधिक उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित हैं और ऐसे प्रश्न सामान्य महत्व के सारगर्भित प्रश्न हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय उच्च न्यायालय या उच्च न्यायालयों के समक्ष लंबित मामले या मामलों को वापस ले सकता है और सभी मामलों का निपटारा स्वयं कर सकता है।
(2) यदि सर्वोच्च न्यायालय न्याय के हित में उचित समझे तो वह किसी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित किसी मामले, अपील या अन्य कार्यवाही को किसी अन्य उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर सकता है।
नए अनुच्छेद 144A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 144 के बाद निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:- "144क. कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्नों के निपटान के लिए विशेष प्रावधान।"
(1) किसी केंद्रीय कानून या राज्य कानून की संवैधानिक वैधता के संबंध में किसी प्रश्न का निर्धारण करने के उद्देश्य से बैठने वाले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या सात होगी।
(2) किसी केंद्रीय कानून या राज्य कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसे कानून की संवैधानिक वैधता के प्रश्न का निर्धारण करने के उद्देश्य से बैठे न्यायाधीशों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत इसे संवैधानिक रूप से अमान्य न मानें।
अनुच्छेद 145 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 145 में,-
(क) खंड (1) में उपखंड (ग) के बाद निम्नलिखित उपखंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
"(सीसी) अनुच्छेद 131ए और 139ए के तहत न्यायालय में कार्यवाही संबंधी नियम;"
(ख) खंड (2) में, शब्द, कोष्ठक और अंक "खंड (3) के प्रावधान" के स्थान पर शब्द, अंक, अक्षर और कोष्ठक "अनुच्छेद 144ए और खंड (3) के प्रावधान" प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ग) खंड (3) में, "न्यूनतम संख्या" शब्दों के स्थान पर, "अनुच्छेद 144ए के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, न्यूनतम संख्या" शब्द, अंक और अक्षर प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 150 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 150 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
150. संघ और राज्यों के खातों का प्रारूप।
संघ और राज्यों के खाते ऐसे प्रारूप में रखे जाएंगे जैसा कि राष्ट्रपति, भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक से परामर्श करने के बाद, निर्धारित करें।
अनुच्छेद 166 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 166 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(4) कोई भी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी राज्य सरकार के कामकाज के सुगम संचालन के लिए खंड (3) के तहत बनाए गए किसी भी नियम को प्रस्तुत करने की मांग करने का हकदार नहीं होगा।
अनुच्छेद 170 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 170 में,-
(क) खंड (2) में स्पष्टीकरण के स्थान पर निम्नलिखित स्पष्टीकरण प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
स्पष्टीकरण - इस खंड में, "जनसंख्या" अभिव्यक्ति का अर्थ पिछली जनगणना में निर्धारित जनसंख्या से है जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं: बशर्ते कि इस स्पष्टीकरण में पिछली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़ों के प्रकाशित होने तक, वर्ष 2000 के बाद ली गई पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित होने तक, इसका अर्थ 1971 की जनगणना समझा जाएगा।
(ख) खंड (3) में परंतुक के पश्चात, निम्नलिखित परंतुक जोड़े जाएंगे, अर्थात्:-
इसके अलावा, यह भी प्रावधान है कि ऐसा पुनर्व्यवस्थापन राष्ट्रपति द्वारा आदेश द्वारा निर्दिष्ट तिथि से प्रभावी होगा और जब तक ऐसा पुनर्व्यवस्थापन प्रभावी नहीं हो जाता, तब तक विधान सभा के चुनाव ऐसे पुनर्व्यवस्थापन से पहले विद्यमान क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों के आधार पर आयोजित किए जा सकते हैं।
इसके अलावा, जब तक वर्ष 2000 के बाद हुई पहली जनगणना के संबंधित आंकड़े प्रकाशित नहीं हो जाते, तब तक इस खंड के तहत प्रत्येक राज्य की विधान सभा की कुल सीटों की संख्या और ऐसे राज्य को क्षेत्रीय निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजित करने की आवश्यकता नहीं होगी।
अनुच्छेद 172 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 172 में खंड (1) में, उन दो स्थानों पर जहाँ “पाँच वर्ष” शब्द आते हैं, उनके स्थान पर “छह वर्ष” शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
(2) अनुच्छेद 172 के खंड (1) में उपधारा (1) द्वारा किए गए संशोधन इस धारा के लागू होने की तिथि को विद्यमान प्रत्येक विधान सभा (केरल राज्य की विधान सभा सहित) पर भी लागू होंगे, तथापि उस खंड के परंतुक के अधीन ऐसी विधान सभा की अवधि बढ़ाने के संबंध में संसद की शक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
अनुच्छेद 189 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 189 में खंड (3) और (4) को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 191 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 191 में खंड (1) के उपखंड (क) के स्थान पर निम्नलिखित उपखंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
"(क) यदि वह भारत सरकार या प्रथम अनुसूची में निर्दिष्ट किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी ऐसे लाभ के पद पर आसीन हो, जिसे संसद द्वारा विधि द्वारा उसके धारक को अयोग्य घोषित किया गया हो;"।
अनुच्छेद 192 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 192 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
192. अयोग्यता संबंधी प्रश्नों पर निर्णय।-
(1) यदि कोई प्रश्न उठता है-
(क) इस संबंध में कि क्या किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 191 के खंड (1) में उल्लिखित किसी अयोग्यता के अधीन हो गया है, या
(ख) यदि कोई व्यक्ति, संसद द्वारा निर्मित किसी कानून के तहत राज्य के विधानमंडल के किसी सदन के चुनाव में भ्रष्ट आचरण का दोषी पाया जाता है, तो क्या वह संसद के किसी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी सदन का सदस्य चुने जाने और सदस्य बने रहने के लिए अयोग्य घोषित किया जाएगा, या उसकी अयोग्यता की अवधि क्या होगी, या ऐसी अयोग्यता को समाप्त करने या उसकी अवधि को कम करने के संबंध में, प्रश्न राष्ट्रपति के निर्णय हेतु भेजा जाएगा और उनका निर्णय अंतिम होगा।
(2) ऐसे किसी प्रश्न पर निर्णय देने से पहले राष्ट्रपति चुनाव आयोग से परामर्श करेंगे और चुनाव आयोग इस उद्देश्य से ऐसी जांच कर सकता है जैसा वह उचित समझे।
अनुच्छेद 194 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 194 में खंड (3) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(3) अन्य मामलों में, किसी राज्य के विधानमंडल के सदन और उसके सदस्यों एवं समितियों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियाँ वही होंगी जो संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 34 के प्रारंभ होने के समय उस सदन और उसके सदस्यों एवं समितियों की थीं, और जो राज्य के विधानमंडल के ऐसे सदन द्वारा विकसित की जा सकती हैं, जहाँ तक संभव हो, लोक सभा एवं उसके सदस्यों एवं समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियों के अनुरूप, जहाँ ऐसा सदन विधान सभा है, और राज्य परिषद एवं उसके सदस्यों एवं समितियों की शक्तियों, विशेषाधिकार एवं उन्मुक्तियों के अनुरूप, जहाँ ऐसा सदन विधान परिषद है।
अनुच्छेद 208 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 208 में, खंड (1) में, "इसकी प्रक्रिया" शब्दों के बाद, कोष्ठक और शब्द "(सदन की बैठक गठित करने के लिए कोरम सहित)" सम्मिलित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 217 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 217 में, खंड (2) में,-
(क) उपखंड (ख) में अंत में "या" शब्द जोड़ा जाएगा;
(ख) उपखंड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित उपखंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(ग) राष्ट्रपति की राय में, एक प्रतिष्ठित न्यायविद हैं।
(ग) स्पष्टीकरण में, खंड (क) में, "न्यायिक पद धारण किया है" शब्दों के स्थान पर "न्यायिक पद या न्यायाधिकरण के सदस्य का पद या संघ या राज्य के अधीन कोई पद धारण किया है, जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान आवश्यक है" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
अनुच्छेद 225 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 225 में, परंतुक को हटा दिया जाएगा।
अनुच्छेद 226 के स्थान पर नए अनुच्छेद का प्रतिस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 226 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
226. कुछ रिट जारी करने के लिए उच्च न्यायालयों की शक्ति।
(1) अनुच्छेद 32 में किसी बात के होते हुए भी, अनुच्छेद 131ए और अनुच्छेद 226ए के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक उच्च न्यायालय को उन सभी क्षेत्रों में, जिनके संबंध में वह क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है, किसी भी व्यक्ति या प्राधिकरण को, जिसमें उचित मामलों में कोई सरकार भी शामिल है, निर्देश, आदेश या रिट जारी करने का अधिकार होगा, जिनमें बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, निषेध, अधिकार अधिकार का अनुरोध और प्रमाणन संबंधी रिट या इनमें से कोई भी शामिल है।
(क) भाग III के प्रावधानों द्वारा प्रदत्त किसी भी अधिकार के प्रवर्तन के लिए; या
(ख) इस संविधान के किसी अन्य प्रावधान या किसी अधिनियम या अध्यादेश या उसके अंतर्गत बनाए गए किसी आदेश, नियम, विनियम, उपनियम या अन्य दस्तावेज के उल्लंघन के कारण उत्पन्न किसी महत्वपूर्ण प्रकार की क्षति के निवारण के लिए; या
(ग) उप-खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी प्रावधान के तहत किसी प्राधिकरण द्वारा या उसके समक्ष किसी कार्यवाही में किसी अवैधता के कारण हुई किसी चोट के निवारण के लिए, जहां ऐसी अवैधता के परिणामस्वरूप न्याय में पर्याप्त विफलता हुई हो।
(2) खंड (1) द्वारा प्रदत्त किसी सरकार, प्राधिकरण या व्यक्ति को निर्देश, आदेश या रिट जारी करने की शक्ति का प्रयोग किसी उच्च न्यायालय द्वारा भी किया जा सकता है जो उन क्षेत्रों के संबंध में क्षेत्राधिकार का प्रयोग करता है जिनमें वाद का कारण पूर्णतः या आंशिक रूप से ऐसी शक्ति के प्रयोग के लिए उत्पन्न होता है, भले ही ऐसी सरकार या प्राधिकरण का मुख्यालय या ऐसे व्यक्ति का निवास उन क्षेत्रों के भीतर न हो।
(3) खंड (1) के उपखंड (ख) या उपखंड (ग) में निर्दिष्ट किसी भी चोट के निवारण के लिए कोई याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, यदि किसी अन्य कानून द्वारा या उसके अधीन ऐसे निवारण के लिए कोई अन्य उपाय प्रदान किया गया हो।
(4) खंड (1) के अंतर्गत किसी याचिका पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में कोई अंतरिम आदेश (चाहे निषेधाज्ञा या स्थगन के रूप में या किसी अन्य तरीके से) तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि-
(क) ऐसी याचिका की प्रतियां और ऐसे अंतरिम आदेश की मांग के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतियां उस पक्ष को उपलब्ध कराई जाती हैं जिसके खिलाफ ऐसी याचिका दायर की गई है या दायर करने का प्रस्ताव है; और
(ख) ऐसे पक्ष को मामले में सुनवाई का अवसर दिया जाता है।
(5) उच्च न्यायालय खंड (4) के उपखंड (क) और (ख) की आवश्यकताओं को माफ कर सकता है और असाधारण उपाय के रूप में अंतरिम आदेश जारी कर सकता है, यदि वह लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों से संतुष्ट है कि याचिकाकर्ता को होने वाली किसी भी हानि को रोकने के लिए ऐसा करना आवश्यक है जिसकी आर्थिक रूप से पर्याप्त भरपाई नहीं की जा सकती है, लेकिन ऐसा कोई भी अंतरिम आदेश, यदि इसे पहले रद्द नहीं किया जाता है, तो इसे जारी किए जाने की तारीख से चौदह दिनों की अवधि की समाप्ति पर प्रभावहीन हो जाएगा, जब तक कि उक्त आवश्यकताओं का अनुपालन उस अवधि की समाप्ति से पहले नहीं किया गया हो और उच्च न्यायालय ने अंतरिम आदेश के संचालन को जारी रखा हो।
(6) खंड (4) या खंड (5) में किसी बात के होते हुए भी, खंड (1) के तहत दायर याचिका पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में कोई अंतरिम आदेश (चाहे निषेधाज्ञा या स्थगन के रूप में हो या किसी अन्य तरीके से) नहीं दिया जाएगा, जहां ऐसे आदेश का प्रभाव सार्वजनिक महत्व के किसी मामले की जांच या कारावास से दंडनीय अपराध की किसी जांच या पूछताछ या सार्वजनिक उपयोगिता के किसी कार्य या परियोजना के निष्पादन के लिए किसी कार्रवाई या सरकार या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाले किसी निगम द्वारा ऐसे निष्पादन के लिए किसी संपत्ति के अधिग्रहण में देरी करना होगा।
(7) इस अनुच्छेद द्वारा उच्च न्यायालय को प्रदत्त शक्ति, अनुच्छेद 32 के खंड (2) द्वारा सर्वोच्च न्यायालय को प्रदत्त शक्ति का अपव्यय नहीं करेगी।
नए अनुच्छेद 226A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 226 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
226ए. अनुच्छेद 226 के तहत कार्यवाही में केंद्रीय कानूनों की संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 226 में किसी बात के होते हुए भी, उच्च न्यायालय उस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी भी कार्यवाही में किसी भी केंद्रीय कानून की संवैधानिक वैधता पर विचार नहीं करेगा।
अनुच्छेद 227 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 227 में,-
(क) खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(1) प्रत्येक उच्च न्यायालय को अपने अपीलीय क्षेत्राधिकार के अधीन सभी न्यायालयों पर अधीक्षण का अधिकार होगा।
(ख) खंड (4) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:---
(5) इस अनुच्छेद में ऐसा कुछ भी नहीं कहा गया है जिससे उच्च न्यायालय को किसी निचली अदालत के किसी ऐसे फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार प्राप्त हो जो अन्यथा अपील या पुनरीक्षण के अधीन न हो।
अनुच्छेद 228 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 228 में, "यह मामला वापस ले लेगा और कर सकता है---" शब्दों के स्थान पर, "यह मामला वापस ले लेगा और अनुच्छेद 131ए के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, कर सकता है---" शब्द, अंक और अक्षर प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
नए अनुच्छेद 228A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 228 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
228ए. राज्य कानूनों की संवैधानिक वैधता से संबंधित प्रश्नों के निपटान के संबंध में विशेष प्रावधान।
(1) किसी भी उच्च न्यायालय को किसी केंद्रीय कानून को संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित करने का अधिकार नहीं होगा।
(2) अनुच्छेद 131ए के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, उच्च न्यायालय किसी भी राज्य कानून की संवैधानिक वैधता से संबंधित सभी प्रश्नों का निर्धारण कर सकता है।
(3) किसी राज्य विधि की संवैधानिक वैधता के संबंध में किसी प्रश्न का निर्धारण करने के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या पाँच होगी: बशर्ते कि जहाँ उच्च न्यायालय में पाँच से कम न्यायाधीश हों, वहाँ उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश बैठकर ऐसे प्रश्न का निर्धारण कर सकते हैं।
(4) किसी राज्य विधि को उच्च न्यायालय द्वारा संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित नहीं किया जाएगा जब तक कि-
(क) जहां उच्च न्यायालय में पांच या अधिक न्यायाधीश हों, वहां ऐसे कानून की वैधता निर्धारित करने के उद्देश्य से बैठे न्यायाधीशों में से कम से कम दो-तिहाई न्यायाधीश इसे संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित करें; और
(ख) जहां उच्च न्यायालय में पांच से कम न्यायाधीश हों, वहां इस उद्देश्य से बैठे उच्च न्यायालय के सभी न्यायाधीश इसे संवैधानिक रूप से अमान्य मानते हैं।
(5) इस अनुच्छेद के प्रावधान इस भाग में निहित किसी भी बात के बावजूद प्रभावी होंगे।
स्पष्टीकरण :---इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या की गणना करते समय, व्यक्तिगत या आर्थिक पूर्वाग्रह के कारण अयोग्य घोषित न्यायाधीश को शामिल नहीं किया जाएगा।
नए अनुच्छेद 257A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 257 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
257ए. संघ के सशस्त्र बलों या अन्य बलों की तैनाती द्वारा राज्यों को सहायता।
(1) भारत सरकार किसी राज्य में कानून और व्यवस्था की किसी गंभीर स्थिति से निपटने के लिए संघ के किसी सशस्त्र बल या संघ के नियंत्रण के अधीन किसी अन्य बल को तैनात कर सकती है।
(2) किसी राज्य में खंड (1) के अधीन तैनात कोई सशस्त्र बल या अन्य बल या उसका कोई दल या इकाई भारत सरकार द्वारा जारी किए गए निर्देशों के अनुसार कार्य करेगा और ऐसे निर्देशों में अन्यथा प्रावधान किए जाने के अलावा, राज्य सरकार या राज्य सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकरण के अधीक्षण या नियंत्रण के अधीन नहीं होगा।
(3) संसद विधि द्वारा खंड (1) के अधीन तैनात किसी बल या उसके किसी दल या इकाई के सदस्यों की ऐसी तैनाती की अवधि के दौरान उनकी शक्तियों, कार्यों, विशेषाधिकारों और दायित्वों को निर्दिष्ट कर सकती है।
अनुच्छेद 311 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 311 के खंड (2) में,-(क) "और जहां ऐसी जांच के बाद उस पर कोई ऐसा दंड लगाने का प्रस्ताव हो" शब्द
"दंड, जब तक उसे प्रस्तावित दंड पर अपना पक्ष रखने का उचित अवसर नहीं दिया जाता, लेकिन केवल ऐसी जांच के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर" वाक्यांश को हटा दिया जाएगा;
(ख) "बशर्ते कि यह खंड लागू नहीं होगा---" शब्दों के स्थान पर निम्नलिखित शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्:-
बशर्ते कि यदि ऐसी जांच के बाद उस व्यक्ति पर कोई ऐसा दंड लगाने का प्रस्ताव हो, तो ऐसा दंड ऐसी जांच के दौरान प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर लगाया जा सकता है और ऐसे व्यक्ति को प्रस्तावित दंड पर अपना पक्ष रखने का कोई अवसर देना आवश्यक नहीं होगा।
इसके अलावा यह खंड लागू नहीं होगा---"।
अनुच्छेद 312 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 312 में,-
(क) खंड (1) में,-
(i) शब्द और अंक "भाग XI" के स्थान पर, शब्द और अंक "भाग VI या भाग XI का अध्याय VI" प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) "अखिल भारतीय सेवाओं" शब्दों के बाद, कोष्ठक और शब्द "(अखिल भारतीय न्यायिक सेवा सहित)" जोड़े जाएंगे;
(ख) खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़े जाएंगे, अर्थात्:-
(3) खंड (1) में निर्दिष्ट अखिल भारतीय न्यायिक सेवा में अनुच्छेद 236 में परिभाषित जिला न्यायाधीश के पद से निम्न स्तर का कोई पद शामिल नहीं होगा।
(4) उपर्युक्त अखिल भारतीय न्यायिक सेवा के सृजन का प्रावधान करने वाले कानून में भाग छह के अध्याय छह में संशोधन के लिए ऐसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं जो उस कानून के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हों, और ऐसे किसी भी कानून को अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन नहीं माना जाएगा।
नए भाग XIVA का अंतःस्थापन
संविधान के भाग XIV के बाद निम्नलिखित भाग जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
भाग XIVA न्यायाधिकरण
323ए. प्रशासनिक न्यायाधिकरण।-
(1) संसद विधि द्वारा, संघ या किसी राज्य या भारत के क्षेत्र के भीतर किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के मामलों से संबंधित या भारत सरकार के नियंत्रण में या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाले किसी निगम के मामलों से संबंधित सार्वजनिक सेवाओं और पदों पर नियुक्त व्यक्तियों की भर्ती और सेवा शर्तों के संबंध में विवादों और शिकायतों के प्रशासनिक न्यायाधिकरणों द्वारा निर्णय या परीक्षण का प्रावधान कर सकती है।
(2) खंड (1) के अधीन बनाया गया कानून-
(क) संघ के लिए एक प्रशासनिक न्यायाधिकरण और प्रत्येक राज्य या दो या दो से अधिक राज्यों के लिए एक अलग प्रशासनिक न्यायाधिकरण की स्थापना का प्रावधान करना;
(ख) उक्त न्यायाधिकरणों में से प्रत्येक द्वारा प्रयोग किए जाने वाले क्षेत्राधिकार, शक्तियों (अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति सहित) और अधिकार को निर्दिष्ट करना;
(ग) उक्त न्यायाधिकरणों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया (जिसमें परिसीमा और साक्ष्य के नियमों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं) का प्रावधान करना;
(घ) अनुच्छेद 136 के अधीन सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को छोड़कर, खंड (1) में निर्दिष्ट विवादों या शिकायतों के संबंध में सभी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को बाहर रखा जाएगा;
(ई) ऐसे प्रत्येक प्रशासनिक न्यायाधिकरण को किसी भी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण के समक्ष लंबित मामलों के हस्तांतरण का प्रावधान करना, जो ऐसे न्यायाधिकरण की स्थापना से ठीक पहले लंबित थे और ऐसे न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र में होते यदि वे कारण जिन पर ऐसे मुकदमे या कार्यवाही आधारित हैं, ऐसी स्थापना के बाद उत्पन्न हुए होते;
(f) अनुच्छेद 371D के खंड (3) के तहत राष्ट्रपति द्वारा जारी किसी आदेश को निरस्त या संशोधित करना;
(जी) इसमें ऐसे पूरक, आकस्मिक और परिणामी प्रावधान (शुल्क संबंधी प्रावधानों सहित) शामिल होंगे जिन्हें संसद ऐसे न्यायाधिकरणों के प्रभावी कामकाज, मामलों के शीघ्र निपटान और उनके आदेशों के प्रवर्तन के लिए आवश्यक समझे।
(3) इस अनुच्छेद के प्रावधान इस संविधान के किसी अन्य प्रावधान या किसी अन्य कानून में यथास्थिति होने के बावजूद प्रभावी होंगे।
323बी. अन्य मामलों के लिए न्यायाधिकरण।
(1) उपयुक्त विधानमंडल, विधि द्वारा, खंड (2) में निर्दिष्ट सभी या किसी भी मामले के संबंध में, जिसके संबंध में ऐसे विधानमंडल को विधि बनाने की शक्ति है, किसी भी विवाद, शिकायत या अपराध के न्यायाधिकरणों द्वारा निर्णय या परीक्षण का प्रावधान कर सकता है।
(2) खंड (1) में निर्दिष्ट मामले निम्नलिखित हैं, अर्थात्:-
(क) किसी कर का लगाना, निर्धारण करना, संग्रह करना और लागू करना;
(ख) सीमा शुल्क सीमाओं के पार विदेशी मुद्रा, आयात और निर्यात;
(ग) औद्योगिक एवं श्रम विवाद;
(घ) अनुच्छेद 31ए में परिभाषित किसी संपदा या उसमें निहित किसी अधिकार के राज्य द्वारा अधिग्रहण के माध्यम से या ऐसे किसी अधिकार के समाप्ति या संशोधन के माध्यम से या कृषि भूमि पर सीमा लगाने के माध्यम से या किसी अन्य तरीके से भूमि सुधार;
(ई) शहरी संपत्ति पर अधिकतम सीमा;
(f) संसद के किसी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी सदन या किसी सदन के चुनाव, लेकिन अनुच्छेद 329 और अनुच्छेद 329ए में निर्दिष्ट मामलों को छोड़कर;
(जी) खाद्य पदार्थों (खाद्य तिलहन और तेल सहित) और ऐसी अन्य वस्तुओं का उत्पादन, खरीद, आपूर्ति और वितरण, जिन्हें राष्ट्रपति सार्वजनिक अधिसूचना द्वारा इस अनुच्छेद के प्रयोजन के लिए आवश्यक वस्तु घोषित कर सकते हैं, और ऐसी वस्तुओं के मूल्यों का नियंत्रण;
(h) उपखंड (क) से (घ) में निर्दिष्ट किसी भी मामले के संबंध में कानूनों के विरुद्ध अपराध और उन मामलों के संबंध में शुल्क;
(i) उपखंड (क) से (ह) में निर्दिष्ट किसी भी मामले से संबंधित कोई भी मामला।
(3) खंड (1) के अधीन बनाया गया कानून-
(क) न्यायाधिकरणों की एक पदानुक्रमिक प्रणाली की स्थापना का प्रावधान करना;
(ख) उक्त न्यायाधिकरणों में से प्रत्येक द्वारा प्रयोग किए जाने वाले क्षेत्राधिकार, शक्तियों (अवमानना के लिए दंड देने की शक्ति सहित) और अधिकार को निर्दिष्ट करना;
(ग) उक्त न्यायाधिकरणों द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया (जिसमें परिसीमा और साक्ष्य के नियमों से संबंधित प्रावधान शामिल हैं) का प्रावधान करना;
(घ) उक्त न्यायाधिकरणों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले सभी या किसी भी मामले के संबंध में अनुच्छेद 136 के तहत सर्वोच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को छोड़कर सभी न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र को बाहर करना;
(ई) ऐसे प्रत्येक न्यायाधिकरण को किसी भी न्यायालय या किसी अन्य प्राधिकरण के समक्ष लंबित मामलों के हस्तांतरण का प्रावधान करना, जो ऐसे न्यायाधिकरण की स्थापना से ठीक पहले लंबित थे और जो ऐसे न्यायाधिकरण के अधिकार क्षेत्र में होते यदि वे कारण जिन पर ऐसे मुकदमे या कार्यवाही आधारित हैं, ऐसी स्थापना के बाद उत्पन्न हुए होते;
(f) इसमें ऐसे पूरक, आकस्मिक और परिणामी प्रावधान (शुल्क संबंधी प्रावधानों सहित) शामिल होंगे, जिन्हें उपयुक्त विधानमंडल ऐसे न्यायाधिकरणों के प्रभावी कामकाज, मामलों के शीघ्र निपटान और उनके आदेशों के प्रवर्तन के लिए आवश्यक समझे।
(4) इस अनुच्छेद के प्रावधान इस संविधान के किसी अन्य प्रावधान या किसी अन्य कानून में समय-समय पर लागू किसी भी बात के बावजूद प्रभावी होंगे।
स्पष्टीकरण - इस अनुच्छेद में, किसी भी मामले के संबंध में "उपयुक्त विधानमंडल" से तात्पर्य संसद या, जैसा भी मामला हो, भाग XI के प्रावधानों के अनुसार ऐसे मामले के संबंध में कानून बनाने के लिए सक्षम राज्य विधानमंडल से है।
अनुच्छेद 330 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 330 में अंत में निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
स्पष्टीकरण - इस अनुच्छेद और अनुच्छेद 332 में, "जनसंख्या" अभिव्यक्ति से तात्पर्य पिछली जनगणना में निर्धारित जनसंख्या से है जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित किए गए हैं।
बशर्ते कि इस स्पष्टीकरण में पिछली जनगणना का, जिसके प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं, उल्लेख, वर्ष 2000 के बाद हुई पहली जनगणना के प्रासंगिक आंकड़े प्रकाशित होने तक, 1971 की जनगणना के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।
अनुच्छेद 352 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 352 में,-
(क) खंड (1) में, "इस आशय की घोषणा करना" शब्दों के स्थान पर, निम्नलिखित शब्द जोड़े जाएंगे, अर्थात्:-
"पूरे भारत के संबंध में या उसके ऐसे भाग के संबंध में जैसा कि उद्घोषणा में निर्दिष्ट किया गया हो";
(ख) खंड (2) में, उपखंड (क) में, "रद्द" शब्द के बाद, "या संशोधित" शब्द जोड़े जाएंगे;
(ग) खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(2क) जहां खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा को किसी पश्चात की उद्घोषणा द्वारा परिवर्तित किया जाता है, तो खंड (2) के प्रावधान, जहां तक संभव हो, ऐसी पश्चात की उद्घोषणा के संबंध में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा के संबंध में लागू होते हैं।
अनुच्छेद 353 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 353 में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि जहां आपातकाल की घोषणा केवल भारत के किसी भाग में लागू हो,-
(i) खंड (क) के अधीन निर्देश देने की संघ की कार्यकारी शक्ति, और
(ii) खंड (ख) के अधीन कानून बनाने की संसद की शक्ति, उस राज्य के अतिरिक्त किसी अन्य राज्य पर भी लागू होगी जिसमें या जिसके किसी भाग में आपातकाल की घोषणा लागू है, यदि और जहाँ तक भारत की सुरक्षा या उसके किसी भाग की सुरक्षा, भारत के उस भाग में या उससे संबंधित गतिविधियों से खतरे में है जिसमें आपातकाल की घोषणा लागू है।
अनुच्छेद 356 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 356 में खंड (4) में, जहाँ कहीं भी "छह महीने" शब्द आते हैं, उनके स्थान पर "एक वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएँगे।
अनुच्छेद 357 का संशोधन
(1) संविधान के अनुच्छेद 357 में खंड (2) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(2) संसद या राष्ट्रपति या खंड (1) के उपखंड (क) में निर्दिष्ट अन्य प्राधिकारी द्वारा राज्य के विधानमंडल की शक्ति का प्रयोग करते हुए बनाया गया कोई भी कानून, जिसे संसद या राष्ट्रपति या ऐसा अन्य प्राधिकारी अनुच्छेद 356 के तहत उद्घोषणा जारी किए बिना बनाने के लिए सक्षम नहीं होता, उद्घोषणा के प्रभाव समाप्त होने के बाद, सक्षम विधानमंडल या अन्य प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरस्त या संशोधित किए जाने तक लागू रहेगा।
(2) उपधारा (1) द्वारा किया गया संशोधन संविधान के अनुच्छेद 357 के खंड (2) में निर्दिष्ट किसी भी कानून पर भी लागू होगा जो इस धारा के लागू होने से ठीक पहले लागू था।
अनुच्छेद 358 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 358 में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि यदि भारत के भूभाग के किसी भाग में ही आपातकाल की घोषणा लागू हो, तो इस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी ऐसे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में, जिसमें या जिसके किसी भाग में आपातकाल की घोषणा लागू नहीं है, कोई ऐसा कानून बनाया जा सकता है या कोई ऐसी कार्यकारी कार्रवाई की जा सकती है, यदि और जहाँ तक भारत या उसके भूभाग के किसी भाग की सुरक्षा को भारत के उस भूभाग में या उससे संबंधित गतिविधियों से खतरा हो, जिसमें आपातकाल की घोषणा लागू है।
अनुच्छेद 359 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 359 में,-
(क) खंड (1क) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि यदि भारत के भूभाग के किसी भाग में ही आपातकाल की घोषणा लागू हो, तो इस अनुच्छेद के अंतर्गत किसी ऐसे राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में, जिसमें या जिसके किसी भाग में आपातकाल की घोषणा लागू नहीं है, कोई ऐसा कानून बनाया जा सकता है या कोई ऐसी कार्यकारी कार्रवाई की जा सकती है, यदि और जहाँ तक भारत या उसके भूभाग के किसी भाग की सुरक्षा को भारत के उस भूभाग में या उससे संबंधित गतिविधियों से खतरा हो, जिसमें आपातकाल की घोषणा लागू है।
(ख) खंड (2) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
बशर्ते कि यदि आपातकाल की घोषणा केवल भारत के भूभाग के किसी एक भाग में लागू है, तो ऐसा कोई आदेश भारत के भूभाग के किसी अन्य भाग में तब तक लागू नहीं होगा जब तक कि राष्ट्रपति, इस बात से संतुष्ट न हो जाएं कि भारत या उसके भूभाग के किसी भाग की सुरक्षा उस भूभाग में या उससे संबंधित गतिविधियों से खतरे में है जिसमें आपातकाल की घोषणा लागू है, और ऐसे विस्तार को आवश्यक न समझें।
अनुच्छेद 366 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 366 में,-
(क) खंड (4) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(4ए) "केंद्रीय कानून" से तात्पर्य राज्य कानून के अलावा किसी अन्य कानून से है, लेकिन इसमें अनुच्छेद 368 के तहत किए गए इस संविधान के किसी भी संशोधन को शामिल नहीं किया गया है;
(ख) खंड (26) के स्थान पर निम्नलिखित खंड जोड़ा जाएगा, अर्थात्:-
(26ए) "राज्य कानून" से तात्पर्य है-
(क) राज्य अधिनियम या संघ शासित प्रदेश के विधानमंडल का अधिनियम;
(ख) किसी राज्य के राज्यपाल द्वारा अनुच्छेद 213 के अधीन या किसी केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक द्वारा अनुच्छेद 239ख के अधीन जारी किया गया अध्यादेश;
(ग) इस संविधान के प्रारंभ होने से पहले निर्मित किसी केंद्रीय अधिनियम में राज्य सूची में उल्लिखित किसी विषय के संबंध में कोई प्रावधान;
(घ) किसी प्रांतीय अधिनियम में राज्य सूची या समवर्ती सूची में उल्लिखित किसी विषय के संबंध में कोई प्रावधान;
(ई) किसी अधिनियम, अध्यादेश या उप-खंड (क), उप-खंड (ख), उप-खंड (ग) या उप-खंड (घ) में निर्दिष्ट प्रावधानों के तहत बनाया गया कोई अधिसूचना, आदेश, योजना, नियम, विनियम या उप-नियम या कानून का बल रखने वाला कोई अन्य उपकरण;
(f) कोई अधिसूचना, आदेश, योजना, नियम, विनियम या उपनियम या कानून का बल रखने वाला कोई अन्य दस्तावेज, जो उप-खंड (e) के अंतर्गत नहीं आता हो, और जो किसी राज्य सरकार या किसी केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासक या ऐसे सरकार या प्रशासक के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकरण द्वारा बनाया गया हो; और
(जी) राज्य सूची में शामिल किसी मामले के संबंध में कोई अन्य कानून (कानून का बल रखने वाली कोई प्रथा या रीति-रिवाज सहित)।
अनुच्छेद 368 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 368 में खंड (3) के बाद निम्नलिखित खंड जोड़े जाएंगे, अर्थात्:-
(4) इस संविधान का कोई संशोधन (भाग III के प्रावधानों सहित) जो इस अनुच्छेद के तहत किया गया हो या किया गया प्रतीत होता हो, चाहे संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 55 के प्रारंभ होने से पहले या बाद में किया गया हो, किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर प्रश्न में नहीं उठाया जाएगा।
(5) संदेह दूर करने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि इस अनुच्छेद के अंतर्गत इस संविधान के प्रावधानों में जोड़, परिवर्तन या निरसन द्वारा संशोधन करने की संसद की संवैधानिक शक्ति पर कोई सीमा नहीं होगी।
अनुच्छेद 371F का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 371एफ में, खंड (सी) में, "पांच वर्ष" शब्दों के स्थान पर "छह वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे तथा "चार वर्ष" शब्दों के स्थान पर उन दो स्थानों पर जहां वे आते हैं, "पांच वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे।
सातवीं अनुसूची का संशोधन
संविधान की सातवीं अनुसूची में,-
(क) सूची I-संघ सूची में, प्रविष्टि 2 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि जोड़ी जाएगी, अर्थात्:-
2ए. संघ के किसी सशस्त्र बल या संघ के नियंत्रण के अधीन किसी अन्य बल या उसके किसी दल या इकाई की किसी राज्य में नागरिक शक्ति की सहायता के लिए तैनाती; ऐसी तैनाती के दौरान ऐसे बलों के सदस्यों की शक्तियां, अधिकार क्षेत्र, विशेषाधिकार और दायित्व।
(ख) सूची द्वितीय में.-राज्य सूची,-
(i) प्रविष्टि 1 में, "संघ की नौसेना, सैन्य या वायु सेना या किसी अन्य सशस्त्र बलों का उपयोग" शब्दों के स्थान पर "संघ की किसी नौसेना, सैन्य या वायु सेना या किसी अन्य सशस्त्र बल या संघ के नियंत्रण के अधीन किसी अन्य बल या उसके किसी दल या इकाई का उपयोग" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ii) प्रविष्टि 2 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
2. पुलिस (रेलवे और ग्राम पुलिस सहित) सूची 1 की प्रविष्टि 2ए के प्रावधानों के अधीन होगी।
(iii) प्रविष्टि 3 में, "न्याय का प्रशासन; सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय को छोड़कर सभी न्यायालयों का गठन और संगठन;" शब्द हटा दिए जाएंगे;
(iv) प्रविष्टियाँ 11, 19, 20 और 29 को हटा दिया जाएगा;
(v) प्रविष्टि 55 में, अंत में "और रेडियो या टेलीविजन द्वारा प्रसारित विज्ञापन" शब्द जोड़े जाएंगे;
(ग) सूची III.-समवर्ती सूची में,-
(i) प्रविष्टि 11 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि जोड़ी जाएगी, अर्थात्:-
11ए. न्याय प्रशासन; सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों को छोड़कर सभी न्यायालयों का गठन और संगठन।
(ii) प्रविष्टि 17 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टियाँ जोड़ी जाएंगी, अर्थात्:-
"17ए. वन.
17बी. वन्य पशुओं और पक्षियों का संरक्षण।
(iii) प्रविष्टि 20 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि जोड़ी जाएगी, अर्थात्:-
20ए. जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन।
(iv) प्रविष्टि 25 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:-
25. शिक्षा, जिसमें तकनीकी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और विश्वविद्यालय शामिल हैं, सूची I की प्रविष्टियों 63, 64, 65 और 66 के प्रावधानों के अधीन; श्रम का व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण।
(v) प्रविष्टि 33 के स्थान पर निम्नलिखित प्रविष्टि जोड़ी जाएगी, अर्थात्:-
33ए. मानकों की स्थापना को छोड़कर वजन और माप।
अनुच्छेद 226 के अधीन लंबित याचिकाओं के बारे में विशेष उपबंध
(1) संविधान में किसी बात के होते हुए भी, यदि निर्धारित दिन से पहले संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत की गई कोई याचिका, जो उस दिन से ठीक पहले किसी उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित हो (इस धारा में ऐसी याचिका को लंबित याचिका कहा गया है), तथा उस दिन से पहले ऐसी याचिका पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में दिया गया कोई अंतरिम आदेश (चाहे निषेधाज्ञा, स्थगन या किसी अन्य तरीके से हो) धारा 38 द्वारा प्रतिस्थापित अनुच्छेद 226 के प्रावधानों के अनुसार निपटाया जाएगा।
(2) विशेष रूप से, और उप-धारा (1) के प्रावधानों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित प्रत्येक याचिका, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा अनुच्छेद 226 के प्रावधानों के तहत, धारा 38 द्वारा प्रतिस्थापित किए जाने के बाद, यदि ऐसी याचिका नियुक्त तिथि के बाद दायर की गई होती, स्वीकार नहीं किया जाता, तो वह निरस्त हो जाएगी और ऐसी याचिका पर या उससे संबंधित किसी भी कार्यवाही में दिया गया कोई भी अंतरिम आदेश (चाहे निषेधाज्ञा या स्थगन या किसी अन्य तरीके से) निरस्त हो जाएगा: बशर्ते कि इस उप-धारा में निहित कोई भी बात याचिकाकर्ता के उस अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी कि वह उन मामलों के संबंध में किसी अन्य कानून के तहत राहत प्राप्त करे जिनसे ऐसी याचिका संबंधित है और ऐसी राहत प्राप्त करने के लिए परिसीमा अवधि की गणना करते समय, यदि कोई हो, तो वह अवधि जिसके दौरान ऐसी याचिका से संबंधित कार्यवाही उच्च न्यायालय में लंबित थी, को बाहर रखा जाएगा।
(3) प्रत्येक अंतरिम आदेश (चाहे निषेधाज्ञा या स्थगन के रूप में हो या किसी अन्य तरीके से) जो नियुक्त दिन से पहले किसी लंबित याचिका [उपधारा (2) के तहत समाप्त हो चुकी लंबित याचिका को छोड़कर] पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में दिया गया हो और जो उस दिन लागू हो, यदि नियुक्त दिन से पहले ऐसी लंबित याचिका की प्रतियां और ऐसे अंतरिम आदेश के लिए दलील के समर्थन में दस्तावेजों की प्रतियां उस पक्ष को उपलब्ध नहीं कराई गई हों जिसके विरुद्ध ऐसा अंतरिम आदेश दिया गया था और ऐसे पक्ष को मामले में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया हो, तो वह (यदि पहले रद्द नहीं किया गया हो) प्रभावहीन हो जाएगा।
(क) निर्धारित दिन से एक माह की अवधि समाप्त होने पर, यदि उक्त एक माह की अवधि समाप्त होने से पहले लंबित याचिका की प्रतियां और अंतरिम आदेश की मांग के समर्थन में दस्तावेज संबंधित पक्ष को उपलब्ध नहीं कराए जाते हैं; या
(ख) निर्धारित दिन से चार महीने की अवधि समाप्त होने पर, यदि खंड (क) में निर्दिष्ट प्रतियां उस खंड में निर्दिष्ट एक महीने की अवधि के भीतर ऐसे पक्ष को उपलब्ध करा दी गई हों, लेकिन उक्त चार महीने की अवधि समाप्त होने से पहले ऐसे पक्ष को मामले में सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया हो।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, नियुक्त दिन से पहले किसी लंबित याचिका [उपधारा (2) के अधीन समाप्त हो चुकी लंबित याचिका को छोड़कर] पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में दिया गया प्रत्येक अंतरिम आदेश (चाहे निषेधाज्ञा या स्थगन के रूप में हो या किसी अन्य तरीके से) जो उस दिन लागू हो, यदि ऐसे आदेश से सरकार या सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण वाले किसी निगम द्वारा सार्वजनिक महत्व के किसी मामले की जांच या कारावास से दंडनीय अपराध की किसी जांच या पूछताछ या सार्वजनिक उपयोगिता के किसी कार्य या परियोजना के निष्पादन या ऐसे निष्पादन के लिए किसी संपत्ति के अधिग्रहण में देरी होती है, तो वह आदेश निरस्त हो जाएगा।
स्पष्टीकरण .-इस खंड में, "नियुक्त दिन" से तात्पर्य उस तिथि से है जिस दिन धारा 38 लागू होती है।
राष्ट्रपति की कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति
(1) यदि इस अधिनियम द्वारा संशोधित संविधान के प्रावधानों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है (जिसमें राष्ट्रपति द्वारा इस अधिनियम को स्वीकृति देने की तिथि से ठीक पूर्व संविधान के प्रावधानों से इस अधिनियम द्वारा संशोधित संविधान के प्रावधानों में संक्रमण से संबंधित कोई कठिनाई भी शामिल है), तो राष्ट्रपति आदेश द्वारा ऐसे प्रावधान कर सकते हैं, जिनमें संविधान के किसी प्रावधान का अनुकूलन या संशोधन भी शामिल है, जो उन्हें कठिनाई को दूर करने के उद्देश्य से आवश्यक या उपयुक्त प्रतीत हों:
बशर्ते कि ऐसी सहमति की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के बाद ऐसा कोई आदेश जारी नहीं किया जाएगा।
(2) उपधारा (1) के अधीन पारित प्रत्येक आदेश, पारित होने के बाद यथाशीघ्र संसद के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा।
