संविधान (30वाँ संशोधन) अधिनियम, 1972
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 133
यह विधेयक सर्वोच्च न्यायालय में सिविल अपीलों पर योग्यता प्रमाण पत्र संबंधी अपनी चौवालीसवीं और पैंतालीसवीं रिपोर्टों में भारत के विधि आयोग की सिफारिशों को प्रभावी बनाने का प्रयास करता है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (तीसवां संशोधन) विधेयक, 1972 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1973 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
यह विधेयक विधि आयोग की सर्वोच्च न्यायालय में दीवानी अपीलों के लिए उपयुक्तता प्रमाण पत्र संबंधी 44वीं और 45वीं रिपोर्टों में दी गई अनुशंसाओं को लागू करने का प्रयास करता है। वर्तमान में, उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए प्रमाण पत्र के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, जिसमें यह प्रमाणित किया गया हो कि विवादित विषय वस्तु की राशि या मूल्य 20 हजार रुपये से कम नहीं है, या निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इतनी ही राशि की संपत्ति से संबंधित कोई दावा या प्रश्न शामिल है। मूल्यांकन अपील के अधिकार का तर्कसंगत मापदंड नहीं हो सकता। कम मूल्य के मुकदमों में भी विधि का एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठ सकता है और मूल्यांकन की कसौटी के परिणामस्वरूप ऐसे मामले सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच जाते हैं जिनमें कोई योग्यता नहीं होती। विधि आयोग ने अनुशंसा की थी कि संविधान के अनुच्छेद 133(1) के खंड (क) और (ख) को हटा दिया जाए और सर्वोच्च न्यायालय में अपील तभी की जाए जब उच्च न्यायालय यह प्रमाणित करे कि मामले में सामान्य महत्व का विधि का एक महत्वपूर्ण प्रश्न शामिल है और उच्च न्यायालय की राय में उक्त प्रश्न का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक है। तदनुसार, इस अनुच्छेद में संशोधन से उन अपीलों की संख्या कम हो जाएगी जो केवल मूल्यांकन परीक्षण के संतुष्ट होने के आधार पर सर्वोच्च न्यायालय में दायर की जाती हैं, जबकि उनमें कोई योग्यता नहीं होती। विधेयक का उद्देश्य यही है।
भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम।
भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद द्वारा निम्नलिखित अधिनियमित किया जाता है:-
संक्षिप्त नाम और प्रारंभ
(1) इस अधिनियम को संविधान (तीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1972 कहा जा सकता है।
(2) यह ऐसी तिथि_665 से लागू होगा, जिसे केंद्र सरकार आधिकारिक राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त करे।
अनुच्छेद 133 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 133 में खंड (1) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-
(1) भारत के भूभाग में स्थित किसी उच्च न्यायालय के दीवानी कार्यवाही में दिए गए किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जा सकती है, यदि उच्च न्यायालय प्रमाणित करता है कि- (क) मामले में सामान्य महत्व का कोई महत्वपूर्ण विधि प्रश्न शामिल है; और (ख) उच्च न्यायालय की राय में उक्त प्रश्न का निर्णय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा किया जाना आवश्यक है।
3. लंबित कार्यवाही आदि के संबंध में विशेष प्रावधान-
(1) इस अधिनियम की कोई बात निम्नलिखित को प्रभावित नहीं करेगी- (क) संविधान के अनुच्छेद 133 के खंड (1) के उपखंड (क) या उपखंड (ख) या उपखंड (ग) के तहत कोई अपील जो इस अधिनियम के प्रारंभ होने से ठीक पहले सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लंबित थी; या (ख) इस अधिनियम के प्रारंभ होने के बाद या उसके बाद किसी उच्च न्यायालय की दीवानी कार्यवाही में किसी निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के विरुद्ध कोई अपील जो उच्च न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पहले अनुच्छेद 133 के खंड (1) के उपखंड (क) या उपखंड (ख) या उपखंड (ग) के तहत दिए गए प्रमाण पत्र के आधार पर दी गई हो। और ऐसी प्रत्येक अपील पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनवाई और निपटारा किया जा सकता है या, जैसा भी मामला हो, उस पर विचार किया जा सकता है, सुनवाई की जा सकती है और निपटारा किया जा सकता है मानो यह अधिनियम पारित न हुआ हो।
(2) उपधारा (1) के प्रावधानों के अधीन रहते हुए, संविधान के अनुच्छेद 133 के खंड (1) के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय में किसी ऐसे निर्णय, डिक्री या अंतिम आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी जो किसी वाद या अन्य दीवानी कार्यवाही से उत्पन्न हुआ हो, जो इस अधिनियम के प्रारंभ होने से पूर्व किसी न्यायालय में स्थापित या प्रारंभ की गई हो, जब तक कि ऐसी अपील इस अधिनियम द्वारा संशोधित उस खंड के प्रावधानों को संतुष्ट न करती हो।
