संविधान (26वाँ संशोधन) अधिनियम, 1971
अवलोकन
अनुच्छेदों में संशोधन किया गया
- 366
लेख सम्मिलित किए गए
- 363ए
लेख हटा दिए गए
- 291
निजी निधियों और वर्तमान कार्यों या सामाजिक उद्देश्यों से असंबंधित विशेष विशेषाधिकारों से युक्त शासन की अवधारणा समतावादी सामाजिक व्यवस्था के साथ असंगत है। अतः सरकार ने पूर्व भारतीय राज्यों के शासकों की निजी निधियों और विशेषाधिकारों को समाप्त करने का निर्णय लिया है।
उद्देश्यों और कारणों का कथन
संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) विधेयक, 1971 के साथ संलग्न उद्देश्यों और कारणों का विवरण, जिसे संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के रूप में अधिनियमित किया गया था।
निजी भत्तों और विशेष विशेषाधिकारों से युक्त शासन की अवधारणा, जिनका वर्तमान कार्यों और सामाजिक उद्देश्यों से कोई संबंध नहीं है, समतावादी सामाजिक व्यवस्था के अनुकूल नहीं है। अतः सरकार ने पूर्व भारतीय राज्यों के शासकों के निजी भत्तों और विशेषाधिकारों को समाप्त करने का निर्णय लिया है। इसके लिए संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों में संशोधन करने के अतिरिक्त, एक नया अनुच्छेद जोड़ना आवश्यक है, ताकि ऐसे शासकों को पहले से दी गई मान्यता को स्पष्ट रूप से समाप्त किया जा सके और निजी भत्तों को समाप्त करते हुए उनसे संबंधित सभी अधिकारों, दायित्वों और बाध्यताओं को समाप्त किया जा सके। अतः यह विधेयक प्रस्तुत किया जा रहा है।
भारत के संविधान में आगे संशोधन करने के लिए एक अधिनियम।
भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद द्वारा यह अधिनियमित किया जाता है कि:---
संक्षिप्त नाम
इस अधिनियम को संविधान (बीसवां-साठवां संशोधन) अधिनियम, 1971 कहा जा सकता है।
अनुच्छेद 291 और 362 का लोप
संविधान के अनुच्छेद 291 और 362 को हटा दिया जाएगा।
नए अनुच्छेद 363A का अंतःस्थापन
संविधान के अनुच्छेद 363 के स्थान पर निम्नलिखित अनुच्छेद जोड़ा जाएगा, अर्थात्:---
363 ए. भारतीय राज्यों के शासकों को दी गई मान्यता समाप्त की जाएगी और निजी पर्स समाप्त किए जाएंगे। - इस संविधान में या उस समय लागू किसी भी कानून में किसी बात के होते हुए भी -
(क) वह राजकुमार, मुखिया या अन्य व्यक्ति जिसे संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ होने से पहले किसी भी समय राष्ट्रपति द्वारा किसी भारतीय राज्य के शासक के रूप में मान्यता प्राप्त थी, या कोई भी व्यक्ति जिसे ऐसे प्रारंभ होने से पहले किसी भी समय राष्ट्रपति द्वारा ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त थी, ऐसे प्रारंभ होने के दिन से ऐसे शासक या ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता प्राप्त करना बंद कर देगा;
(ख) संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के लागू होने की तिथि से निजी पर्स समाप्त कर दिया गया है और निजी पर्स से संबंधित सभी अधिकार, दायित्व और बाध्यताएँ समाप्त हो गई हैं और तदनुसार खंड (क) में निर्दिष्ट शासक या, जैसा भी मामला हो, ऐसे शासक के उत्तराधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति को निजी पर्स के रूप में कोई राशि नहीं दी जाएगी।
अनुच्छेद 366 का संशोधन
संविधान के अनुच्छेद 366 में खंड (22) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:-(22) "शासक" से तात्पर्य राजकुमार, प्रमुख या
कोई अन्य व्यक्ति जिसे संविधान (छब्बीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारंभ होने से पहले किसी भी समय राष्ट्रपति द्वारा किसी भारतीय राज्य के शासक के रूप में मान्यता दी गई हो या कोई भी व्यक्ति जिसे ऐसे प्रारंभ होने से पहले किसी भी समय राष्ट्रपति द्वारा ऐसे शासक के उत्तराधिकारी के रूप में मान्यता दी गई हो;
