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CrPC धारा 328 अब BNSS धारा 367 है
धारा 328. विकृतचित्त अभियुक्त की दशा में प्रक्रिया
पुराना कानून
CrPC §328
धारा 328. विकृतचित्त अभियुक्त की दशा में प्रक्रिया
328. विकृतचित्त अभियुक्त की दशा में प्रक्रिया
(1) जब जांच करने वाले मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है, विकृतचित्त है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तब मजिस्ट्रेट ऐसी चित्त-विकृति के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की परीक्षा जिले के सिविल सर्जन द्वारा या ऐसे अन्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, कराएगा, और तब ऐसे सर्जन या अन्य अधिकारी की साक्षी के रूप में परीक्षा करेगा तथा उस परीक्षा को लेखबद्ध करेगा।
(1क) यदि सिविल सर्जन यह पाता है कि अभियुक्त विकृतचित्त है, तो वह ऐसे व्यक्ति को उसकी दशा की देखभाल, उपचार और रोग-पूर्वानुमान के लिए किसी मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक के पास निर्दिष्ट करेगा, और मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को यह सूचित करेगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से या मानसिक मंदता से ग्रस्त है या नहीं:
परन्तु यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक द्वारा, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—
(क) निकटतम राजकीय अस्पताल में मनोचिकित्सा इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम चिकित्सा महाविद्यालय में मनोचिकित्सा का कोई संकाय सदस्य।
(2) ऐसी परीक्षा और जांच के लंबित रहने तक, मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के बारे में धारा 330 के उपबंधों के अनुसार कार्रवाई कर सकेगा।
(3) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह चित्त-विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा तथा अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किन्तु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि वह यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह जांच को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को उन्मोचित करेगा और उसके बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा:
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट यह पाता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध, जिसकी बाबत चित्त-विकृति का निष्कर्ष निकाला गया है, प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है, तो वह कार्यवाही को ऐसी अवधि के लिए स्थगित करेगा, जो मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है, और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रूप से कार्रवाई किए जाने का आदेश देगा।
(4) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक मंदता से ग्रस्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह मानसिक मंदता अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा।
पूरा पढ़ें: CrPC §328(1) जब जांच करने वाले मजिस्ट्रेट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति, जिसके विरुद्ध जांच की जा रही है, विकृतचित्त है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तब मजिस्ट्रेट ऐसी चित्त-विकृति के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की परीक्षा जिले के सिविल सर्जन द्वारा या ऐसे अन्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा, जिसे राज्य सरकार निर्दिष्ट करे, कराएगा, और तब ऐसे सर्जन या अन्य अधिकारी की साक्षी के रूप में परीक्षा करेगा तथा उस परीक्षा को लेखबद्ध करेगा।
(1क) यदि सिविल सर्जन यह पाता है कि अभियुक्त विकृतचित्त है, तो वह ऐसे व्यक्ति को उसकी दशा की देखभाल, उपचार और रोग-पूर्वानुमान के लिए किसी मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक के पास निर्दिष्ट करेगा, और मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को यह सूचित करेगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से या मानसिक मंदता से ग्रस्त है या नहीं:
परन्तु यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक द्वारा, जैसी भी स्थिति हो, मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—
(क) निकटतम राजकीय अस्पताल में मनोचिकित्सा इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम चिकित्सा महाविद्यालय में मनोचिकित्सा का कोई संकाय सदस्य।
(2) ऐसी परीक्षा और जांच के लंबित रहने तक, मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति के बारे में धारा 330 के उपबंधों के अनुसार कार्रवाई कर सकेगा।
(3) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह चित्त-विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा तथा अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात् किन्तु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि वह यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह जांच को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को उन्मोचित करेगा और उसके बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा:
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट यह पाता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध, जिसकी बाबत चित्त-विकृति का निष्कर्ष निकाला गया है, प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है, तो वह कार्यवाही को ऐसी अवधि के लिए स्थगित करेगा, जो मनोचिकित्सक या चिकित्सीय मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है, और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रूप से कार्रवाई किए जाने का आदेश देगा।
(4) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक मंदता से ग्रस्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट यह और अवधारित करेगा कि क्या वह मानसिक मंदता अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और अभियुक्त के बारे में धारा 330 में उपबंधित रीति से कार्रवाई करेगा।
नया कानून
BNSS §367
यदि आरोपी व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है तो प्रक्रिया क्या होगी?
(1) जब किसी मजिस्ट्रेट को जांच करते समय यह विश्वास करने का कारण हो कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध जांच की जा रही है वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है और फलस्वरूप अपना बचाव करने में असमर्थ है, तो मजिस्ट्रेट मानसिक अस्वस्थता के तथ्य की जांच करेगा और ऐसे व्यक्ति की जांच जिले के सिविल सर्जन या राज्य सरकार द्वारा निर्देशित किसी अन्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा करवाएगा और उसके बाद ऐसे सर्जन या अन्य चिकित्सा अधिकारी को गवाह के रूप में उपस्थित करेगा और जांच को लिखित रूप में दर्ज करेगा।
(2) यदि सिविल सर्जन अभियुक्त को मानसिक रूप से अस्वस्थ पाता है, तो वह ऐसे व्यक्ति को सरकारी अस्पताल या सरकारी मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास देखभाल, उपचार और स्थिति के निदान के लिए भेजेगा और मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक, जैसा भी मामला हो, मजिस्ट्रेट को सूचित करेगा कि अभियुक्त मानसिक अस्वस्थता या बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित है या नहीं।
बशर्ते कि यदि अभियुक्त मनोरोग विशेषज्ञ या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से असंतुष्ट है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे:
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोरोग इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग का कोई संकाय सदस्य।
(3) ऐसी परीक्षा एवं पूछताछ लंबित रहने के दौरान, मजिस्ट्रेट धारा 369 के प्रावधानों के अनुसार ऐसे व्यक्ति से निपट सकता है।
(4) यदि मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो मजिस्ट्रेट आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या मानसिक अस्वस्थता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है, और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट इस आशय का निष्कर्ष दर्ज करेगा, और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की जांच करेगा और अभियुक्त के वकील को सुनने के बाद, लेकिन अभियुक्त से पूछताछ किए बिना, यदि वह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो वह जांच को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को बरी कर देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से उसके साथ व्यवहार करेगा।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि जिस अभियुक्त के संबंध में मानसिक अस्वस्थता का निष्कर्ष निकाला गया है, उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह कार्यवाही को उतनी अवधि के लिए स्थगित कर देगा, जितनी मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए आवश्यक है, और अभियुक्त के साथ धारा 369 के तहत प्रावधान के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देगा।
(5) यदि मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति बौद्धिक रूप से अक्षम है, तो मजिस्ट्रेट आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या बौद्धिक अक्षमता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है, और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से अभियुक्त से निपटेगा।
पूरा पढ़ें: BNSS §367(2) यदि सिविल सर्जन अभियुक्त को मानसिक रूप से अस्वस्थ पाता है, तो वह ऐसे व्यक्ति को सरकारी अस्पताल या सरकारी मेडिकल कॉलेज के मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास देखभाल, उपचार और स्थिति के निदान के लिए भेजेगा और मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक, जैसा भी मामला हो, मजिस्ट्रेट को सूचित करेगा कि अभियुक्त मानसिक अस्वस्थता या बौद्धिक अक्षमता से पीड़ित है या नहीं।
बशर्ते कि यदि अभियुक्त मनोरोग विशेषज्ञ या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से असंतुष्ट है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे:
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोरोग इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग का कोई संकाय सदस्य।
(3) ऐसी परीक्षा एवं पूछताछ लंबित रहने के दौरान, मजिस्ट्रेट धारा 369 के प्रावधानों के अनुसार ऐसे व्यक्ति से निपट सकता है।
(4) यदि मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो मजिस्ट्रेट आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या मानसिक अस्वस्थता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है, और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट इस आशय का निष्कर्ष दर्ज करेगा, और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की जांच करेगा और अभियुक्त के वकील को सुनने के बाद, लेकिन अभियुक्त से पूछताछ किए बिना, यदि वह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो वह जांच को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को बरी कर देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से उसके साथ व्यवहार करेगा।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि जिस अभियुक्त के संबंध में मानसिक अस्वस्थता का निष्कर्ष निकाला गया है, उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह कार्यवाही को उतनी अवधि के लिए स्थगित कर देगा, जितनी मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए आवश्यक है, और अभियुक्त के साथ धारा 369 के तहत प्रावधान के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देगा।
(5) यदि मजिस्ट्रेट को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति बौद्धिक रूप से अक्षम है, तो मजिस्ट्रेट आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या बौद्धिक अक्षमता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है, और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट जांच बंद करने का आदेश देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से अभियुक्त से निपटेगा।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
