पाठ लगभग अपरिवर्तित है
CrPC धारा 228 अब BNSS धारा 251 है
धारा 228. आरोप की विरचना
पुराना कानून
CrPC §228
धारा 228. आरोप की विरचना
228. आरोप की विरचना
(1) यदि पूर्वोक्त रूप से विचार करने और सुनवाई के पश्चात् न्यायाधीश की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने कोई ऐसा अपराध किया है जो—
(क) केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकेगा और आदेश द्वारा मामला विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट [या किसी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को अंतरित कर सकेगा और अभियुक्त को यह निदेश दे सकेगा कि वह, यथास्थिति, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसी तारीख को हाजिर हो जो वह ठीक समझे, और तब ऐसा मजिस्ट्रेट] पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट-मामलों के विचारण के लिए प्रक्रिया के अनुसार उस अपराध का विचारण करेगा;
(ख) केवल उस न्यायालय द्वारा विचारणीय है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध लिखित रूप में आरोप विरचित करेगा।
(2) जहां न्यायाधीश उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोई आरोप विरचित करता है, वहां वह आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा और अभियुक्त से यह पूछा जाएगा कि क्या वह आरोपित अपराध के लिए दोषी होने की अभिवाक् करता है या विचारण का दावा करता है।
[दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा ", और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" के स्थान पर प्रतिस्थापित]
राज्य संशोधन
कर्नाटक:
धारा 228 की उपधारा (1) के खंड (क) में, "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या मामले का विचारण करने के लिए सक्षम किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट को और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या ऐसा अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसे मामला अंतरित किया गया हो" शब्द रखे जाएंगे।
[कर्नाटक अधिनियम 1994 का 22, धारा 2 द्वारा (18-5-1994 से प्रभावी)]
पश्चिमी बंगाल:
धारा 228 की उपधारा (1) के खंड (क) में, "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या मामले का विचारण करने के लिए सक्षम किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट को, और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या ऐसा अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसे मामला अंतरित किया गया हो" शब्द रखे जाएंगे।
[पश्चिमी बंगाल अधिनियम 1978 का 63, धारा 3 द्वारा (1-6-1979 से प्रभावी)]
पूरा पढ़ें: CrPC §228(1) यदि पूर्वोक्त रूप से विचार करने और सुनवाई के पश्चात् न्यायाधीश की यह राय है कि यह उपधारणा करने का आधार है कि अभियुक्त ने कोई ऐसा अपराध किया है जो—
(क) केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप विरचित कर सकेगा और आदेश द्वारा मामला विचारण के लिए मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट [या किसी अन्य प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट को अंतरित कर सकेगा और अभियुक्त को यह निदेश दे सकेगा कि वह, यथास्थिति, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसी तारीख को हाजिर हो जो वह ठीक समझे, और तब ऐसा मजिस्ट्रेट] पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित वारंट-मामलों के विचारण के लिए प्रक्रिया के अनुसार उस अपराध का विचारण करेगा;
(ख) केवल उस न्यायालय द्वारा विचारणीय है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध लिखित रूप में आरोप विरचित करेगा।
(2) जहां न्यायाधीश उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन कोई आरोप विरचित करता है, वहां वह आरोप अभियुक्त को पढ़कर सुनाया और समझाया जाएगा और अभियुक्त से यह पूछा जाएगा कि क्या वह आरोपित अपराध के लिए दोषी होने की अभिवाक् करता है या विचारण का दावा करता है।
[दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 2005 द्वारा ", और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" के स्थान पर प्रतिस्थापित]
राज्य संशोधन
कर्नाटक:
धारा 228 की उपधारा (1) के खंड (क) में, "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या मामले का विचारण करने के लिए सक्षम किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट को और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या ऐसा अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसे मामला अंतरित किया गया हो" शब्द रखे जाएंगे।
[कर्नाटक अधिनियम 1994 का 22, धारा 2 द्वारा (18-5-1994 से प्रभावी)]
पश्चिमी बंगाल:
धारा 228 की उपधारा (1) के खंड (क) में, "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर "मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को या मामले का विचारण करने के लिए सक्षम किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट को, और तब मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या ऐसा अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसे मामला अंतरित किया गया हो" शब्द रखे जाएंगे।
[पश्चिमी बंगाल अधिनियम 1978 का 63, धारा 3 द्वारा (1-6-1979 से प्रभावी)]
नया कानून
BNSS §251
आरोप का निर्धारण।
(1) यदि उपर्युक्त विचार-विमर्श और सुनवाई के बाद न्यायाधीश की यह राय हो कि यह अनुमान लगाने का आधार है कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है जो—
(क) यदि मामला सत्र न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप निर्धारित कर सकता है और आदेश द्वारा मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के किसी अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सुनवाई के लिए स्थानांतरित कर सकता है तथा अभियुक्त को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसी तिथि पर उपस्थित होने का निर्देश दे सकता है, जिसे वह उचित समझे, और उसके बाद ऐसा मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट पर दर्ज वारंट मामलों की सुनवाई की प्रक्रिया के अनुसार अपराध की सुनवाई करेगा;
(ख) यदि न्यायालय द्वारा ही विचारणीय हो, तो वह आरोप पर पहली सुनवाई की तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर अभियुक्त के विरुद्ध लिखित रूप में आरोप तैयार करेगा।
(2) जहाँ न्यायाधीश उपधारा (1) के खंड (ख) के तहत कोई आरोप तय करता है, तो आरोप उपस्थित अभियुक्त को शारीरिक रूप से या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से पढ़कर सुनाया जाएगा और समझाया जाएगा तथा अभियुक्त से पूछा जाएगा कि क्या वह आरोपित अपराध का दोषी मानता है या मुकदमा चलाने का दावा करता है।
पूरा पढ़ें: BNSS §251(क) यदि मामला सत्र न्यायालय द्वारा विशेष रूप से विचारणीय नहीं है, तो वह अभियुक्त के विरुद्ध आरोप निर्धारित कर सकता है और आदेश द्वारा मामले को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के किसी अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को सुनवाई के लिए स्थानांतरित कर सकता है तथा अभियुक्त को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष ऐसी तिथि पर उपस्थित होने का निर्देश दे सकता है, जिसे वह उचित समझे, और उसके बाद ऐसा मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट पर दर्ज वारंट मामलों की सुनवाई की प्रक्रिया के अनुसार अपराध की सुनवाई करेगा;
(ख) यदि न्यायालय द्वारा ही विचारणीय हो, तो वह आरोप पर पहली सुनवाई की तारीख से साठ दिनों की अवधि के भीतर अभियुक्त के विरुद्ध लिखित रूप में आरोप तैयार करेगा।
(2) जहाँ न्यायाधीश उपधारा (1) के खंड (ख) के तहत कोई आरोप तय करता है, तो आरोप उपस्थित अभियुक्त को शारीरिक रूप से या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से पढ़कर सुनाया जाएगा और समझाया जाएगा तथा अभियुक्त से पूछा जाएगा कि क्या वह आरोपित अपराध का दोषी मानता है या मुकदमा चलाने का दावा करता है।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
