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धारा 167. जब चौबीस घंटे में अन्वेषण पूरा न हो सके तब प्रक्रिया
पुराना कानून
CrPC §167
धारा 167. जब चौबीस घंटे में अन्वेषण पूरा न हो सके तब प्रक्रिया
167. जब चौबीस घंटे में अन्वेषण पूरा न हो सके तब प्रक्रिया
(1) जब कभी कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया जाता है और अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाता है और यह प्रतीत होता है कि अन्वेषण धारा 57 द्वारा नियत चौबीस घंटे की अवधि के भीतर पूरा नहीं किया जा सकता, और यह विश्वास करने के आधार हैं कि अभियोग या इत्तिला सुसंगत है, तो पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी, यदि वह उपनिरीक्षक की पंक्ति से अनिम्न है, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को मामले से संबंधित उन प्रविष्टियों की एक प्रति, जो इसमें इसके पश्चात् विहित डायरी में हैं, तुरंत भेजेगा और साथ ही अभियुक्त को भी ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
(2) वह मजिस्ट्रेट, जिसके पास इस धारा के अधीन अभियुक्त व्यक्ति भेजा जाता है, चाहे उसे मामले का विचारण करने की अधिकारिता हो या न हो, समय-समय पर, अभियुक्त को ऐसी अभिरक्षा में, जैसी वह मजिस्ट्रेट ठीक समझे, कुल मिलाकर पंद्रह दिन से अनधिक अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा; और यदि उसे मामले का विचारण करने या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है और वह अग्रतर निरोध को अनावश्यक समझता है, तो वह अभियुक्त को ऐसी अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजे जाने का आदेश दे सकेगा:
परन्तु—
(क) मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा में पंद्रह दिन की अवधि से अधिक निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त आधार विद्यमान हैं, किंतु कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को इस पैरा के अधीन अभिरक्षा में निम्नलिखित से अधिक की कुल अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार नहीं देगा—
(i) नब्बे दिन, जहां अन्वेषण ऐसे अपराध से संबंधित है, जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अन्यून की अवधि के कारावास से दंडनीय है;
(ii) साठ दिन, जहां अन्वेषण किसी अन्य अपराध से संबंधित है,
और, यथास्थिति, उक्त नब्बे दिन या साठ दिन की अवधि की समाप्ति पर, अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, यदि वह जमानत देने के लिए तैयार है और जमानत देता है, और इस उपधारा के अधीन जमानत पर छोड़ा गया प्रत्येक व्यक्ति अध्याय 33 के प्रयोजनों के लिए उस अध्याय के उपबंधों के अधीन छोड़ा गया समझा जाएगा;
(ख) कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त को इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा में निरुद्ध रखने का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त पहली बार और तत्पश्चात् हर बार, जब तक अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में रहता है, उसके समक्ष स्वयं पेश न किया जाए, किंतु मजिस्ट्रेट न्यायिक अभिरक्षा में अग्रतर निरोध, अभियुक्त के या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किए जाने पर, बढ़ा सकेगा;
(ग) द्वितीय वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, जो उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त नहीं किया गया है, पुलिस की अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार नहीं देगा।
स्पष्टीकरण 1—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि पैरा (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के होते हुए भी, अभियुक्त तब तक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाएगा, जब तक वह जमानत नहीं देता।
स्पष्टीकरण 2—यदि यह कोई प्रश्न उठता है कि क्या अभियुक्त व्यक्ति खंड (ख) के अधीन यथाअपेक्षित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, तो अभियुक्त व्यक्ति का पेश किया जाना, यथास्थिति, निरोध का प्राधिकार देने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से अभियुक्त व्यक्ति के पेश किए जाने के बारे में मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित आदेश द्वारा साबित किया जा सकेगा।
परन्तु यह और कि अठारह वर्ष से कम आयु की स्त्री की दशा में, निरोध किसी सुधार गृह या मान्यताप्राप्त सामाजिक संस्था की अभिरक्षा में किए जाने का प्राधिकार दिया जाएगा।
(2क) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी, यदि वह उपनिरीक्षक की पंक्ति से अनिम्न है, जहां न्यायिक मजिस्ट्रेट उपलब्ध नहीं है, वहां निकटतम कार्यपालक मजिस्ट्रेट को, जिस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदत्त की गई हैं, मामले से संबंधित उस प्रविष्टि की एक प्रति, जो इसमें इसके पश्चात् विहित डायरी में है, भेज सकेगा और साथ ही अभियुक्त को ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा, और तब ऐसा कार्यपालक मजिस्ट्रेट, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, अभियुक्त व्यक्ति को ऐसी अभिरक्षा में, जैसी वह ठीक समझे, कुल मिलाकर सात दिन से अनधिक अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा; और इस प्रकार प्राधिकृत निरोध की अवधि की समाप्ति पर अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, सिवाय उस दशा के जहां अभियुक्त व्यक्ति के अग्रतर निरोध के लिए ऐसा आदेश करने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश किया गया है; और जहां ऐसे अग्रतर निरोध के लिए आदेश किया जाता है, वहां वह अवधि, जिसके दौरान अभियुक्त व्यक्ति इस उपधारा के अधीन कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए आदेशों के अधीन अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया था, उपधारा (2) के परन्तुक के पैरा (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की संगणना करने में हिसाब में ली जाएगी:
परन्तु पूर्वोक्त अवधि की समाप्ति के पूर्व कार्यपालक मजिस्ट्रेट, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को मामले के अभिलेख, मामले से संबंधित डायरी की उन प्रविष्टियों की प्रति सहित, जो उसे, यथास्थिति, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा भेजी गई थीं, भेजेगा।
(3) इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार देने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करने के अपने कारण लेखबद्ध करेगा।
(4) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई मजिस्ट्रेट, जो ऐसा आदेश करता है, अपने आदेश की एक प्रति, उसे करने के अपने कारणों सहित, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
(5) यदि मजिस्ट्रेट द्वारा समन-मामले के रूप में विचारणीय किसी मामले में, उस तारीख से, जिसको अभियुक्त गिरफ्तार किया गया था, छह मास की अवधि के भीतर अन्वेषण समाप्त नहीं होता है, तो मजिस्ट्रेट उस अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का आदेश करेगा, जब तक कि अन्वेषण करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट का यह समाधान न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में छह मास की अवधि से आगे अन्वेषण का चालू रहना आवश्यक है।
(6) जहां उपधारा (5) के अधीन किसी अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का कोई आदेश किया गया है, वहां सेशन न्यायाधीश, यदि उसे अपने समक्ष किए गए आवेदन पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि उस अपराध का अग्रतर अन्वेषण किया जाना चाहिए, तो उपधारा (5) के अधीन किए गए आदेश को विखंडित कर सकेगा और उस अपराध का अग्रतर अन्वेषण किए जाने का निदेश, जमानत और अन्य विषयों के बारे में ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए, जो वह विनिर्दिष्ट करे, दे सकेगा।
राज्य संशोधन
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप
धारा 167 में,—
(i) उपधारा (1) में, 'निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट' शब्दों के पश्चात् 'या, यदि किसी द्वीप में कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट नहीं है तो उस द्वीप में कृत्य कर रहे किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को' शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
'(1क) जहां डायरी की प्रविष्टियों की प्रति किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को भेजी जाती है, वहां धारा 167 में मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश का अर्थ ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश लगाया जाएगा;'
(iii) उपधारा (3) में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:—
'परन्तु जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जब तक कि वह राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो, पुलिस की अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार नहीं देगा।'
(iv) उपधारा (4) में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:—
'परन्तु जहां ऐसा आदेश किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है, वहां आदेश करने वाला मजिस्ट्रेट उस आदेश की एक प्रति, उसे करने के अपने कारणों सहित, उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट को भेजेगा जिसके वह अव्यवहित रूप से अधीनस्थ है।'
आंध्र प्रदेश
आंध्र प्रदेश राज्य को इसके लागू होने में, धारा 167 की उपधारा (2) में,—
(i) खंड (ख) के अंत में निम्नलिखित जोड़ा जाए, अर्थात्:—
'या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से;'
(ii) उसके नीचे दिए गए स्पष्टीकरण 2 में, 'कोई अभियुक्त व्यक्ति पेश किया गया था' शब्दों के स्थान पर 'कोई अभियुक्त व्यक्ति स्वयं या यथास्थिति इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किया गया था' रखा जाए।
[आंध्र प्रदेश अधिनियम 1997 का 31]
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ राज्य को इसके लागू होने में, धारा 167 में,—
(1) उपधारा (2) में, खंड (ख) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाए, अर्थात्:—
'(खख) कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा में निरुद्ध रखने का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त उसके समक्ष या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश न किया जाए और न्यायालय में प्लीडर द्वारा उसका प्रतिनिधित्व न किया जाए।'
(2) स्पष्टीकरण 2 में, 'पेश किया गया था' शब्दों के पश्चात् 'पुलिस अभिरक्षा से' शब्द जोड़े जाएं।
(3) स्पष्टीकरण 2 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाए, अर्थात्:—
स्पष्टीकरण 3—यदि यह कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई अभियुक्त व्यक्ति पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा से, पैरा (खख) के अधीन यथाअपेक्षित मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वयं या यथास्थिति इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किया गया था, तो अभियुक्त व्यक्ति का पेश किया जाना, निरोध का प्राधिकार देने वाले आदेश पर उसके या उसके प्लीडर के हस्ताक्षर द्वारा साबित किया जा सकेगा।
दिल्ली
दिल्ली राज्यक्षेत्र को इसके लागू होने में, धारा 167 की उपधारा (2) में,—
(i) खंड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाए, अर्थात्:—
'(ख) कोई मजिस्ट्रेट इस धारा के अधीन किसी भी अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त उसके समक्ष या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश न किया जाए:
परन्तु यदि अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में है, तो कोई मजिस्ट्रेट उसके किसी भी अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त उसके समक्ष स्वयं पेश न किया जाए।'
(ii) उसके नीचे दिए गए स्पष्टीकरण 2 के स्थान पर निम्नलिखित स्पष्टीकरण रखा जाए, अर्थात्:—
स्पष्टीकरण 2—यदि यह कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई अभियुक्त व्यक्ति पैरा (ख) के अधीन यथाअपेक्षित मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वयं या यथास्थिति इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किया गया था, तो अभियुक्त व्यक्ति का पेश किया जाना, यथास्थिति, उसके निरोध का प्राधिकार देने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या कार्यवाहियों की वीडियो रिकार्डिंग द्वारा साबित किया जा सकेगा।
[दिल्ली अधिनियम 2004 का 4]
गुजरात
धारा 167 की उपधारा (2) के परन्तुक में,—
(i) पैरा (क) के स्थान पर निम्नलिखित पैरा रखा जाएगा, अर्थात्:—
'(क) मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा में पंद्रह दिन की अवधि से अधिक निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त आधार विद्यमान हैं, किंतु कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को इस धारा के अधीन अभिरक्षा में निम्नलिखित से अधिक की कुल अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार नहीं देगा—
(i) एक सौ बीस दिन, जहां अन्वेषण ऐसे अपराध से संबंधित है, जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अन्यून की अवधि के कारावास से दंडनीय है,
(ii) साठ दिन, जहां अन्वेषण किसी अपराध से संबंधित है;
और, यथास्थिति, उक्त एक सौ बीस दिन या साठ दिन की अवधि की समाप्ति पर, अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, यदि वह जमानत देने के लिए तैयार है और जमानत देता है, और इस धारा के अधीन जमानत पर छोड़ा गया प्रत्येक व्यक्ति अध्याय 33 के प्रयोजनों के लिए उस अध्याय के उपबंधों के अधीन छोड़ा गया समझा जाएगा;'
(ii) पैरा (ख) में, 'कोई मजिस्ट्रेट नहीं' शब्दों के स्थान पर 'कोई मजिस्ट्रेट, ऐसे कारणों के सिवाय जो लेखबद्ध किए जाएं, नहीं' शब्द रखे जाएंगे;
(iii) स्पष्टीकरण को स्पष्टीकरण 2 के रूप में संख्यांकित किया जाएगा, और इस प्रकार पुनःसंख्यांकित स्पष्टीकरण 2 के पूर्व निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:—
स्पष्टीकरण 1—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि पैरा (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के होते हुए भी, अभियुक्त व्यक्ति तब तक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाएगा, जब तक वह जमानत नहीं देता।
लंबित अन्वेषण को संशोधन का लागू होना—दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 167 के उपबंध, जैसा कि इस अधिनियम द्वारा संशोधित हैं, इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व लंबित प्रत्येक अन्वेषण को लागू होंगे, यदि उस धारा के अधीन प्राधिकृत, पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभियुक्त व्यक्ति के निरोध की अवधि, ऐसे प्रारंभ पर, साठ दिन से अधिक न हुई हो।
हरियाणा
धारा 167 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाए, अर्थात्:—
'167क. मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी पर प्रक्रिया—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि धारा 167 के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसे किसी व्यक्ति के संबंध में भी लागू होंगे, जो किसी मजिस्ट्रेट द्वारा, चाहे वह कार्यपालक हो या न्यायिक, या उसके किसी आदेश या निदेश के अधीन गिरफ्तार किया गया है।'
ओडिशा
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 167 में, उपधारा (2) के परन्तुक के पैरा (क) में,—
(i) 'इस पैरा के अधीन' शब्दों के स्थान पर 'इस धारा के अधीन' शब्द रखे जाएंगे; और
(ii) 'नब्बे दिन' शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, 'एक सौ बीस दिन' शब्द रखे जाएंगे।
[उड़ीसा अधिनियम 1997 का 11, धारा 2 (20-10-1997 से प्रभावी)]
पंजाब
धारा 167 की उपधारा (2) में, 'पंद्रह दिन' शब्दों के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, 'तीस दिन' शब्द रखे जाएंगे।
[राष्ट्रपति अधिनियम 1984 का 1, धारा 2 (23-6-1984 से प्रभावी)]
त्रिपुरा
धारा 167 की उपधारा (2) के परन्तुक के पैरा (क) में,—
(क) 'नब्बे दिन' शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, 'एक सौ अस्सी दिन' शब्द रखे जाएंगे;
(ख) 'साठ दिन' शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, 'एक सौ बीस दिन' शब्द रखे जाएंगे।
[त्रिपुरा अधिनियम 1992 का 6, धारा 2 (29-7-1992 से प्रभावी)]
उत्तर प्रदेश
धारा 167 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाए, अर्थात्:—
'167क. मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी पर प्रक्रिया—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि धारा 167 के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसे किसी व्यक्ति के संबंध में भी लागू होंगे, जो किसी मजिस्ट्रेट द्वारा, चाहे वह कार्यपालक हो या न्यायिक, या उसके किसी आदेश या निदेश के अधीन गिरफ्तार किया गया है।'
[उत्तर प्रदेश अधिनियम 1978 का 18]
पश्चिमी बंगाल
धारा 167 में,—
(क) उपधारा (5) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी:—
'(5) यदि,—
(i) मजिस्ट्रेट द्वारा समन-मामले के रूप में विचारणीय किसी मामले में, अन्वेषण छह मास की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है, या
(ii) सेशन न्यायालय द्वारा अनन्य रूप से विचारणीय किसी मामले में या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 18 के अधीन किसी मामले में, अन्वेषण तीन वर्ष की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है, या
(iii) खंड (i) और खंड (ii) में उल्लिखित मामलों से भिन्न किसी मामले में, अन्वेषण उस तारीख से, जिसको अभियुक्त गिरफ्तार किया गया था या उसने हाजिरी दी थी, दो वर्ष की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है,
तो मजिस्ट्रेट उस अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का आदेश करेगा और अभियुक्त को उन्मोचित करेगा, जब तक कि अन्वेषण करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट का यह समाधान न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में इस उपधारा में उल्लिखित अवधियों से आगे अन्वेषण का चालू रहना आवश्यक है।'
(ख) उपधारा (6) में, 'किसी अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का कोई आदेश किया गया है' शब्दों के पश्चात् 'और अभियुक्त उन्मोचित कर दिया गया है' शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे।
[पश्चिमी बंगाल अधिनियम 1988 का 24, धारा 4]
पूरा पढ़ें: CrPC §167(1) जब कभी कोई व्यक्ति गिरफ्तार किया जाता है और अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाता है और यह प्रतीत होता है कि अन्वेषण धारा 57 द्वारा नियत चौबीस घंटे की अवधि के भीतर पूरा नहीं किया जा सकता, और यह विश्वास करने के आधार हैं कि अभियोग या इत्तिला सुसंगत है, तो पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी, यदि वह उपनिरीक्षक की पंक्ति से अनिम्न है, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को मामले से संबंधित उन प्रविष्टियों की एक प्रति, जो इसमें इसके पश्चात् विहित डायरी में हैं, तुरंत भेजेगा और साथ ही अभियुक्त को भी ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
(2) वह मजिस्ट्रेट, जिसके पास इस धारा के अधीन अभियुक्त व्यक्ति भेजा जाता है, चाहे उसे मामले का विचारण करने की अधिकारिता हो या न हो, समय-समय पर, अभियुक्त को ऐसी अभिरक्षा में, जैसी वह मजिस्ट्रेट ठीक समझे, कुल मिलाकर पंद्रह दिन से अनधिक अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा; और यदि उसे मामले का विचारण करने या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने की अधिकारिता नहीं है और वह अग्रतर निरोध को अनावश्यक समझता है, तो वह अभियुक्त को ऐसी अधिकारिता रखने वाले मजिस्ट्रेट के पास भेजे जाने का आदेश दे सकेगा:
परन्तु—
(क) मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा में पंद्रह दिन की अवधि से अधिक निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त आधार विद्यमान हैं, किंतु कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को इस पैरा के अधीन अभिरक्षा में निम्नलिखित से अधिक की कुल अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार नहीं देगा—
(i) नब्बे दिन, जहां अन्वेषण ऐसे अपराध से संबंधित है, जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अन्यून की अवधि के कारावास से दंडनीय है;
(ii) साठ दिन, जहां अन्वेषण किसी अन्य अपराध से संबंधित है,
और, यथास्थिति, उक्त नब्बे दिन या साठ दिन की अवधि की समाप्ति पर, अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, यदि वह जमानत देने के लिए तैयार है और जमानत देता है, और इस उपधारा के अधीन जमानत पर छोड़ा गया प्रत्येक व्यक्ति अध्याय 33 के प्रयोजनों के लिए उस अध्याय के उपबंधों के अधीन छोड़ा गया समझा जाएगा;
(ख) कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त को इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा में निरुद्ध रखने का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त पहली बार और तत्पश्चात् हर बार, जब तक अभियुक्त पुलिस की अभिरक्षा में रहता है, उसके समक्ष स्वयं पेश न किया जाए, किंतु मजिस्ट्रेट न्यायिक अभिरक्षा में अग्रतर निरोध, अभियुक्त के या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किए जाने पर, बढ़ा सकेगा;
(ग) द्वितीय वर्ग का कोई मजिस्ट्रेट, जो उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त नहीं किया गया है, पुलिस की अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार नहीं देगा।
स्पष्टीकरण 1—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि पैरा (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के होते हुए भी, अभियुक्त तब तक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाएगा, जब तक वह जमानत नहीं देता।
स्पष्टीकरण 2—यदि यह कोई प्रश्न उठता है कि क्या अभियुक्त व्यक्ति खंड (ख) के अधीन यथाअपेक्षित मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, तो अभियुक्त व्यक्ति का पेश किया जाना, यथास्थिति, निरोध का प्राधिकार देने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से अभियुक्त व्यक्ति के पेश किए जाने के बारे में मजिस्ट्रेट द्वारा प्रमाणित आदेश द्वारा साबित किया जा सकेगा।
परन्तु यह और कि अठारह वर्ष से कम आयु की स्त्री की दशा में, निरोध किसी सुधार गृह या मान्यताप्राप्त सामाजिक संस्था की अभिरक्षा में किए जाने का प्राधिकार दिया जाएगा।
(2क) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी, यदि वह उपनिरीक्षक की पंक्ति से अनिम्न है, जहां न्यायिक मजिस्ट्रेट उपलब्ध नहीं है, वहां निकटतम कार्यपालक मजिस्ट्रेट को, जिस पर न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदत्त की गई हैं, मामले से संबंधित उस प्रविष्टि की एक प्रति, जो इसमें इसके पश्चात् विहित डायरी में है, भेज सकेगा और साथ ही अभियुक्त को ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा, और तब ऐसा कार्यपालक मजिस्ट्रेट, ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, अभियुक्त व्यक्ति को ऐसी अभिरक्षा में, जैसी वह ठीक समझे, कुल मिलाकर सात दिन से अनधिक अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा; और इस प्रकार प्राधिकृत निरोध की अवधि की समाप्ति पर अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, सिवाय उस दशा के जहां अभियुक्त व्यक्ति के अग्रतर निरोध के लिए ऐसा आदेश करने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आदेश किया गया है; और जहां ऐसे अग्रतर निरोध के लिए आदेश किया जाता है, वहां वह अवधि, जिसके दौरान अभियुक्त व्यक्ति इस उपधारा के अधीन कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किए गए आदेशों के अधीन अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया था, उपधारा (2) के परन्तुक के पैरा (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की संगणना करने में हिसाब में ली जाएगी:
परन्तु पूर्वोक्त अवधि की समाप्ति के पूर्व कार्यपालक मजिस्ट्रेट, निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को मामले के अभिलेख, मामले से संबंधित डायरी की उन प्रविष्टियों की प्रति सहित, जो उसे, यथास्थिति, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी या अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा भेजी गई थीं, भेजेगा।
(3) इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार देने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करने के अपने कारण लेखबद्ध करेगा।
(4) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई मजिस्ट्रेट, जो ऐसा आदेश करता है, अपने आदेश की एक प्रति, उसे करने के अपने कारणों सहित, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
(5) यदि मजिस्ट्रेट द्वारा समन-मामले के रूप में विचारणीय किसी मामले में, उस तारीख से, जिसको अभियुक्त गिरफ्तार किया गया था, छह मास की अवधि के भीतर अन्वेषण समाप्त नहीं होता है, तो मजिस्ट्रेट उस अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का आदेश करेगा, जब तक कि अन्वेषण करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट का यह समाधान न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में छह मास की अवधि से आगे अन्वेषण का चालू रहना आवश्यक है।
(6) जहां उपधारा (5) के अधीन किसी अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का कोई आदेश किया गया है, वहां सेशन न्यायाधीश, यदि उसे अपने समक्ष किए गए आवेदन पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि उस अपराध का अग्रतर अन्वेषण किया जाना चाहिए, तो उपधारा (5) के अधीन किए गए आदेश को विखंडित कर सकेगा और उस अपराध का अग्रतर अन्वेषण किए जाने का निदेश, जमानत और अन्य विषयों के बारे में ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए, जो वह विनिर्दिष्ट करे, दे सकेगा।
राज्य संशोधन
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तथा लक्षद्वीप
धारा 167 में,—
(i) उपधारा (1) में, 'निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट' शब्दों के पश्चात् 'या, यदि किसी द्वीप में कोई न्यायिक मजिस्ट्रेट नहीं है तो उस द्वीप में कृत्य कर रहे किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को' शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे;
(ii) उपधारा (1) के पश्चात् निम्नलिखित उपधारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
'(1क) जहां डायरी की प्रविष्टियों की प्रति किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को भेजी जाती है, वहां धारा 167 में मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश का अर्थ ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देश लगाया जाएगा;'
(iii) उपधारा (3) में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:—
'परन्तु जिला मजिस्ट्रेट या उपखंड मजिस्ट्रेट से भिन्न कोई कार्यपालक मजिस्ट्रेट, जब तक कि वह राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो, पुलिस की अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार नहीं देगा।'
(iv) उपधारा (4) में निम्नलिखित परन्तुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:—
'परन्तु जहां ऐसा आदेश किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाता है, वहां आदेश करने वाला मजिस्ट्रेट उस आदेश की एक प्रति, उसे करने के अपने कारणों सहित, उस कार्यपालक मजिस्ट्रेट को भेजेगा जिसके वह अव्यवहित रूप से अधीनस्थ है।'
आंध्र प्रदेश
आंध्र प्रदेश राज्य को इसके लागू होने में, धारा 167 की उपधारा (2) में,—
(i) खंड (ख) के अंत में निम्नलिखित जोड़ा जाए, अर्थात्:—
'या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से;'
(ii) उसके नीचे दिए गए स्पष्टीकरण 2 में, 'कोई अभियुक्त व्यक्ति पेश किया गया था' शब्दों के स्थान पर 'कोई अभियुक्त व्यक्ति स्वयं या यथास्थिति इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किया गया था' रखा जाए।
[आंध्र प्रदेश अधिनियम 1997 का 31]
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़ राज्य को इसके लागू होने में, धारा 167 में,—
(1) उपधारा (2) में, खंड (ख) के पश्चात् निम्नलिखित खंड अंतःस्थापित किया जाए, अर्थात्:—
'(खख) कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को इस धारा के अधीन पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा में निरुद्ध रखने का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त उसके समक्ष या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश न किया जाए और न्यायालय में प्लीडर द्वारा उसका प्रतिनिधित्व न किया जाए।'
(2) स्पष्टीकरण 2 में, 'पेश किया गया था' शब्दों के पश्चात् 'पुलिस अभिरक्षा से' शब्द जोड़े जाएं।
(3) स्पष्टीकरण 2 के पश्चात् निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाए, अर्थात्:—
स्पष्टीकरण 3—यदि यह कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई अभियुक्त व्यक्ति पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा से, पैरा (खख) के अधीन यथाअपेक्षित मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वयं या यथास्थिति इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किया गया था, तो अभियुक्त व्यक्ति का पेश किया जाना, निरोध का प्राधिकार देने वाले आदेश पर उसके या उसके प्लीडर के हस्ताक्षर द्वारा साबित किया जा सकेगा।
दिल्ली
दिल्ली राज्यक्षेत्र को इसके लागू होने में, धारा 167 की उपधारा (2) में,—
(i) खंड (ख) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाए, अर्थात्:—
'(ख) कोई मजिस्ट्रेट इस धारा के अधीन किसी भी अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त उसके समक्ष या तो स्वयं या इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश न किया जाए:
परन्तु यदि अभियुक्त पुलिस अभिरक्षा में है, तो कोई मजिस्ट्रेट उसके किसी भी अभिरक्षा में निरोध का प्राधिकार तब तक नहीं देगा, जब तक कि अभियुक्त उसके समक्ष स्वयं पेश न किया जाए।'
(ii) उसके नीचे दिए गए स्पष्टीकरण 2 के स्थान पर निम्नलिखित स्पष्टीकरण रखा जाए, अर्थात्:—
स्पष्टीकरण 2—यदि यह कोई प्रश्न उठता है कि क्या कोई अभियुक्त व्यक्ति पैरा (ख) के अधीन यथाअपेक्षित मजिस्ट्रेट के समक्ष स्वयं या यथास्थिति इलेक्ट्रानिक वीडियो लिंकेज के माध्यम से पेश किया गया था, तो अभियुक्त व्यक्ति का पेश किया जाना, यथास्थिति, उसके निरोध का प्राधिकार देने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या कार्यवाहियों की वीडियो रिकार्डिंग द्वारा साबित किया जा सकेगा।
[दिल्ली अधिनियम 2004 का 4]
गुजरात
धारा 167 की उपधारा (2) के परन्तुक में,—
(i) पैरा (क) के स्थान पर निम्नलिखित पैरा रखा जाएगा, अर्थात्:—
'(क) मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभिरक्षा में पंद्रह दिन की अवधि से अधिक निरुद्ध रखने का प्राधिकार दे सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करने के लिए पर्याप्त आधार विद्यमान हैं, किंतु कोई मजिस्ट्रेट अभियुक्त व्यक्ति को इस धारा के अधीन अभिरक्षा में निम्नलिखित से अधिक की कुल अवधि के लिए निरुद्ध रखने का प्राधिकार नहीं देगा—
(i) एक सौ बीस दिन, जहां अन्वेषण ऐसे अपराध से संबंधित है, जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दस वर्ष से अन्यून की अवधि के कारावास से दंडनीय है,
(ii) साठ दिन, जहां अन्वेषण किसी अपराध से संबंधित है;
और, यथास्थिति, उक्त एक सौ बीस दिन या साठ दिन की अवधि की समाप्ति पर, अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर छोड़ दिया जाएगा, यदि वह जमानत देने के लिए तैयार है और जमानत देता है, और इस धारा के अधीन जमानत पर छोड़ा गया प्रत्येक व्यक्ति अध्याय 33 के प्रयोजनों के लिए उस अध्याय के उपबंधों के अधीन छोड़ा गया समझा जाएगा;'
(ii) पैरा (ख) में, 'कोई मजिस्ट्रेट नहीं' शब्दों के स्थान पर 'कोई मजिस्ट्रेट, ऐसे कारणों के सिवाय जो लेखबद्ध किए जाएं, नहीं' शब्द रखे जाएंगे;
(iii) स्पष्टीकरण को स्पष्टीकरण 2 के रूप में संख्यांकित किया जाएगा, और इस प्रकार पुनःसंख्यांकित स्पष्टीकरण 2 के पूर्व निम्नलिखित स्पष्टीकरण अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात्:—
स्पष्टीकरण 1—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि पैरा (क) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के होते हुए भी, अभियुक्त व्यक्ति तब तक अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाएगा, जब तक वह जमानत नहीं देता।
लंबित अन्वेषण को संशोधन का लागू होना—दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 167 के उपबंध, जैसा कि इस अधिनियम द्वारा संशोधित हैं, इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पूर्व लंबित प्रत्येक अन्वेषण को लागू होंगे, यदि उस धारा के अधीन प्राधिकृत, पुलिस की अभिरक्षा से भिन्न अभियुक्त व्यक्ति के निरोध की अवधि, ऐसे प्रारंभ पर, साठ दिन से अधिक न हुई हो।
हरियाणा
धारा 167 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाए, अर्थात्:—
'167क. मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी पर प्रक्रिया—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि धारा 167 के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसे किसी व्यक्ति के संबंध में भी लागू होंगे, जो किसी मजिस्ट्रेट द्वारा, चाहे वह कार्यपालक हो या न्यायिक, या उसके किसी आदेश या निदेश के अधीन गिरफ्तार किया गया है।'
ओडिशा
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 167 में, उपधारा (2) के परन्तुक के पैरा (क) में,—
(i) 'इस पैरा के अधीन' शब्दों के स्थान पर 'इस धारा के अधीन' शब्द रखे जाएंगे; और
(ii) 'नब्बे दिन' शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, 'एक सौ बीस दिन' शब्द रखे जाएंगे।
[उड़ीसा अधिनियम 1997 का 11, धारा 2 (20-10-1997 से प्रभावी)]
पंजाब
धारा 167 की उपधारा (2) में, 'पंद्रह दिन' शब्दों के स्थान पर, दोनों स्थानों पर जहां वे आते हैं, 'तीस दिन' शब्द रखे जाएंगे।
[राष्ट्रपति अधिनियम 1984 का 1, धारा 2 (23-6-1984 से प्रभावी)]
त्रिपुरा
धारा 167 की उपधारा (2) के परन्तुक के पैरा (क) में,—
(क) 'नब्बे दिन' शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, 'एक सौ अस्सी दिन' शब्द रखे जाएंगे;
(ख) 'साठ दिन' शब्दों के स्थान पर, जहां कहीं वे आते हैं, 'एक सौ बीस दिन' शब्द रखे जाएंगे।
[त्रिपुरा अधिनियम 1992 का 6, धारा 2 (29-7-1992 से प्रभावी)]
उत्तर प्रदेश
धारा 167 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाए, अर्थात्:—
'167क. मजिस्ट्रेट द्वारा गिरफ्तारी पर प्रक्रिया—संदेह के निवारण के लिए इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि धारा 167 के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसे किसी व्यक्ति के संबंध में भी लागू होंगे, जो किसी मजिस्ट्रेट द्वारा, चाहे वह कार्यपालक हो या न्यायिक, या उसके किसी आदेश या निदेश के अधीन गिरफ्तार किया गया है।'
[उत्तर प्रदेश अधिनियम 1978 का 18]
पश्चिमी बंगाल
धारा 167 में,—
(क) उपधारा (5) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी:—
'(5) यदि,—
(i) मजिस्ट्रेट द्वारा समन-मामले के रूप में विचारणीय किसी मामले में, अन्वेषण छह मास की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है, या
(ii) सेशन न्यायालय द्वारा अनन्य रूप से विचारणीय किसी मामले में या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 18 के अधीन किसी मामले में, अन्वेषण तीन वर्ष की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है, या
(iii) खंड (i) और खंड (ii) में उल्लिखित मामलों से भिन्न किसी मामले में, अन्वेषण उस तारीख से, जिसको अभियुक्त गिरफ्तार किया गया था या उसने हाजिरी दी थी, दो वर्ष की अवधि के भीतर समाप्त नहीं होता है,
तो मजिस्ट्रेट उस अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का आदेश करेगा और अभियुक्त को उन्मोचित करेगा, जब तक कि अन्वेषण करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट का यह समाधान न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में इस उपधारा में उल्लिखित अवधियों से आगे अन्वेषण का चालू रहना आवश्यक है।'
(ख) उपधारा (6) में, 'किसी अपराध के अग्रतर अन्वेषण को रोकने का कोई आदेश किया गया है' शब्दों के पश्चात् 'और अभियुक्त उन्मोचित कर दिया गया है' शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे।
[पश्चिमी बंगाल अधिनियम 1988 का 24, धारा 4]
नया कानून
BNSS §187
जब जांच चौबीस घंटे में पूरी न हो सके तो अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
(1) जब भी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करके हिरासत में लिया जाता है, और यह प्रतीत होता है कि धारा 58 द्वारा निर्धारित चौबीस घंटे की अवधि के भीतर जांच पूरी नहीं की जा सकती है, और यह मानने के आधार हैं कि आरोप या सूचना सही है, तो पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाला पुलिस अधिकारी, यदि वह उप-निरीक्षक के पद से नीचे का नहीं है, तो मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति तुरंत निकटतम मजिस्ट्रेट को भेजेगा, और साथ ही आरोपी को ऐसे मजिस्ट्रेट के पास भेजेगा।
(2) जिस मजिस्ट्रेट को इस धारा के अधीन कोई अभियुक्त भेजा जाता है, वह मामले की सुनवाई करने का अधिकार रखता हो या न रखता हो, इस बात पर विचार करने के बाद कि क्या ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा नहीं किया गया है या उसकी जमानत रद्द कर दी गई है, समय-समय पर अभियुक्त को ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे, कुल मिलाकर पंद्रह दिनों से अधिक की अवधि के लिए, या आंशिक रूप से, उपधारा (3) में दिए गए प्रावधान के अनुसार साठ दिनों या नब्बे दिनों की हिरासत अवधि में से प्रारंभिक चालीस दिनों या साठ दिनों के दौरान किसी भी समय। और यदि उसे मामले की सुनवाई करने या उसे परीक्षण के लिए भेजने का अधिकार नहीं है, और वह आगे की हिरासत को अनावश्यक समझता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को भेजने का आदेश दे सकता है।
(3) मजिस्ट्रेट, यदि पर्याप्त आधारों से संतुष्ट हो, तो आरोपी व्यक्ति को पंद्रह दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, परन्तु कोई भी मजिस्ट्रेट इस उपधारा के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति को कुल मिलाकर इससे अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा—
(i) नब्बे दिन, जहाँ जाँच किसी ऐसे अपराध से संबंधित हो जिसके लिए मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दस वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास की सजा दी जा सकती है;
(ii) साठ दिन, जहाँ जाँच किसी अन्य अपराध से संबंधित हो, और उक्त नब्बे दिनों या साठ दिनों की अवधि की समाप्ति पर, जैसा भी मामला हो, यदि अभियुक्त जमानत देने के लिए तैयार हो और जमानत दे दे, तो उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, और इस उपधारा के तहत जमानत पर रिहा किए गए प्रत्येक व्यक्ति को उस अध्याय के प्रयोजनों के लिए अध्याय XXXV के प्रावधानों के तहत रिहा किया गया माना जाएगा।
(4) कोई मजिस्ट्रेट इस धारा के तहत पुलिस हिरासत में अभियुक्त को तब तक हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा जब तक कि अभियुक्त को पहली बार और उसके बाद हर बार पुलिस हिरासत में रहने तक स्वयं उसके समक्ष पेश न किया जाए, लेकिन मजिस्ट्रेट अभियुक्त को स्वयं या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से पेश करने पर न्यायिक हिरासत में आगे की हिरासत बढ़ा सकता है।
(5) द्वितीय श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो, पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा।
स्पष्टीकरण 1. — संदेह से बचने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के बावजूद, आरोपी को तब तक हिरासत में रखा जाएगा जब तक वह जमानत प्रस्तुत नहीं करता।
स्पष्टीकरण II.— यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या किसी आरोपी व्यक्ति को उपधारा (4) के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, तो आरोपी व्यक्ति की पेशी को हिरासत अधिकृत करने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या मजिस्ट्रेट द्वारा ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आरोपी व्यक्ति की पेशी के संबंध में प्रमाणित आदेश द्वारा सिद्ध किया जा सकता है, जैसा भी मामला हो:
बशर्ते कि अठारह वर्ष से कम आयु की महिला के मामले में, उसे किसी सुधार गृह या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था की हिरासत में रखने की अनुमति दी जाएगी:
इसके अलावा, किसी भी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में पुलिस स्टेशन में या न्यायिक हिरासत में जेल में या केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा जेल घोषित स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
(6) उपधारा (1) से उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, यदि पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाला पुलिस अधिकारी उप-निरीक्षक के पद से नीचे का न हो, तो मजिस्ट्रेट की अनुपलब्धता की स्थिति में, निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को, जिसे मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की गई हैं, मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टि की एक प्रति भेज सकता है, और उसी समय, आरोपी को ऐसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है, और इसके बाद ऐसा कार्यकारी मजिस्ट्रेट, लिखित रूप में कारण दर्ज करते हुए, आरोपी व्यक्ति को अधिकतम सात दिनों की अवधि के लिए ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जैसा वह उचित समझे; और इस प्रकार अधिकृत हिरासत की अवधि समाप्त होने पर, आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, सिवाय इसके कि जहां ऐसे आदेश देने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी व्यक्ति की आगे की हिरासत का आदेश दिया गया हो; और, जहां इस प्रकार की आगे की हिरासत का आदेश दिया जाता है, तो इस उपधारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेशों के तहत जिस अवधि के दौरान आरोपी व्यक्ति को हिरासत में रखा गया था, उसे उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की गणना में ध्यान में रखा जाएगा।
बशर्ते कि उपर्युक्त अवधि की समाप्ति से पहले, कार्यपालिका मजिस्ट्रेट मामले के अभिलेखों के साथ-साथ मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा, जो उसे पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा भेजी गई हो।
(7) इस धारा के तहत पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति देने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करने के अपने कारण दर्ज करेगा।
(8) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अलावा कोई अन्य मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश देते समय अपने आदेश की एक प्रति, उसे देने के कारणों सहित, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
(9) यदि किसी मामले में, जिस पर मजिस्ट्रेट द्वारा समन के रूप में विचारण किया जा सकता है, जांच आरोपी की गिरफ्तारी की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर पूरी नहीं होती है, तो मजिस्ट्रेट अपराध की आगे की जांच रोकने का आदेश देगा, जब तक कि जांच करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट को संतुष्ट न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में छह महीने की अवधि के बाद जांच जारी रखना आवश्यक है।
(10) जहाँ उपधारा (9) के अधीन किसी अपराध की आगे की जाँच रोकने का कोई आदेश दिया गया हो, तो सत्र न्यायाधीश, यदि वह अपने समक्ष किए गए आवेदन पर या अन्यथा संतुष्ट हो कि अपराध की आगे की जाँच की जानी चाहिए, तो उपधारा (9) के अधीन दिए गए आदेश को रद्द कर सकता है और जमानत और अन्य मामलों के संबंध में ऐसे निर्देश देने के अधीन अपराध की आगे की जाँच करने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह निर्दिष्ट करे।
पूरा पढ़ें: BNSS §187(2) जिस मजिस्ट्रेट को इस धारा के अधीन कोई अभियुक्त भेजा जाता है, वह मामले की सुनवाई करने का अधिकार रखता हो या न रखता हो, इस बात पर विचार करने के बाद कि क्या ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा नहीं किया गया है या उसकी जमानत रद्द कर दी गई है, समय-समय पर अभियुक्त को ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जिसे मजिस्ट्रेट उचित समझे, कुल मिलाकर पंद्रह दिनों से अधिक की अवधि के लिए, या आंशिक रूप से, उपधारा (3) में दिए गए प्रावधान के अनुसार साठ दिनों या नब्बे दिनों की हिरासत अवधि में से प्रारंभिक चालीस दिनों या साठ दिनों के दौरान किसी भी समय। और यदि उसे मामले की सुनवाई करने या उसे परीक्षण के लिए भेजने का अधिकार नहीं है, और वह आगे की हिरासत को अनावश्यक समझता है, तो वह अभियुक्त को ऐसे अधिकार क्षेत्र वाले मजिस्ट्रेट को भेजने का आदेश दे सकता है।
(3) मजिस्ट्रेट, यदि पर्याप्त आधारों से संतुष्ट हो, तो आरोपी व्यक्ति को पंद्रह दिनों से अधिक समय तक हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, परन्तु कोई भी मजिस्ट्रेट इस उपधारा के अंतर्गत आरोपी व्यक्ति को कुल मिलाकर इससे अधिक अवधि के लिए हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा—
(i) नब्बे दिन, जहाँ जाँच किसी ऐसे अपराध से संबंधित हो जिसके लिए मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दस वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास की सजा दी जा सकती है;
(ii) साठ दिन, जहाँ जाँच किसी अन्य अपराध से संबंधित हो, और उक्त नब्बे दिनों या साठ दिनों की अवधि की समाप्ति पर, जैसा भी मामला हो, यदि अभियुक्त जमानत देने के लिए तैयार हो और जमानत दे दे, तो उसे जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, और इस उपधारा के तहत जमानत पर रिहा किए गए प्रत्येक व्यक्ति को उस अध्याय के प्रयोजनों के लिए अध्याय XXXV के प्रावधानों के तहत रिहा किया गया माना जाएगा।
(4) कोई मजिस्ट्रेट इस धारा के तहत पुलिस हिरासत में अभियुक्त को तब तक हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा जब तक कि अभियुक्त को पहली बार और उसके बाद हर बार पुलिस हिरासत में रहने तक स्वयं उसके समक्ष पेश न किया जाए, लेकिन मजिस्ट्रेट अभियुक्त को स्वयं या ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से पेश करने पर न्यायिक हिरासत में आगे की हिरासत बढ़ा सकता है।
(5) द्वितीय श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट, जिसे उच्च न्यायालय द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त न किया गया हो, पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति नहीं देगा।
स्पष्टीकरण 1. — संदेह से बचने के लिए, यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के बावजूद, आरोपी को तब तक हिरासत में रखा जाएगा जब तक वह जमानत प्रस्तुत नहीं करता।
स्पष्टीकरण II.— यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या किसी आरोपी व्यक्ति को उपधारा (4) के अनुसार मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश किया गया था, तो आरोपी व्यक्ति की पेशी को हिरासत अधिकृत करने वाले आदेश पर उसके हस्ताक्षर द्वारा या मजिस्ट्रेट द्वारा ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से आरोपी व्यक्ति की पेशी के संबंध में प्रमाणित आदेश द्वारा सिद्ध किया जा सकता है, जैसा भी मामला हो:
बशर्ते कि अठारह वर्ष से कम आयु की महिला के मामले में, उसे किसी सुधार गृह या मान्यता प्राप्त सामाजिक संस्था की हिरासत में रखने की अनुमति दी जाएगी:
इसके अलावा, किसी भी व्यक्ति को पुलिस हिरासत में पुलिस स्टेशन में या न्यायिक हिरासत में जेल में या केंद्र सरकार या राज्य सरकार द्वारा जेल घोषित स्थान के अलावा किसी अन्य स्थान पर हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
(6) उपधारा (1) से उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, यदि पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाला पुलिस अधिकारी उप-निरीक्षक के पद से नीचे का न हो, तो मजिस्ट्रेट की अनुपलब्धता की स्थिति में, निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को, जिसे मजिस्ट्रेट की शक्तियां प्रदान की गई हैं, मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टि की एक प्रति भेज सकता है, और उसी समय, आरोपी को ऐसे कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है, और इसके बाद ऐसा कार्यकारी मजिस्ट्रेट, लिखित रूप में कारण दर्ज करते हुए, आरोपी व्यक्ति को अधिकतम सात दिनों की अवधि के लिए ऐसी हिरासत में रखने की अनुमति दे सकता है, जैसा वह उचित समझे; और इस प्रकार अधिकृत हिरासत की अवधि समाप्त होने पर, आरोपी व्यक्ति को जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, सिवाय इसके कि जहां ऐसे आदेश देने के लिए सक्षम मजिस्ट्रेट द्वारा आरोपी व्यक्ति की आगे की हिरासत का आदेश दिया गया हो; और, जहां इस प्रकार की आगे की हिरासत का आदेश दिया जाता है, तो इस उपधारा के तहत कार्यकारी मजिस्ट्रेट द्वारा दिए गए आदेशों के तहत जिस अवधि के दौरान आरोपी व्यक्ति को हिरासत में रखा गया था, उसे उपधारा (3) में निर्दिष्ट अवधि की गणना में ध्यान में रखा जाएगा।
बशर्ते कि उपर्युक्त अवधि की समाप्ति से पहले, कार्यपालिका मजिस्ट्रेट मामले के अभिलेखों के साथ-साथ मामले से संबंधित डायरी में दर्ज प्रविष्टियों की एक प्रति निकटतम न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेज देगा, जो उसे पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या जांच करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा भेजी गई हो।
(7) इस धारा के तहत पुलिस की हिरासत में रखने की अनुमति देने वाला मजिस्ट्रेट ऐसा करने के अपने कारण दर्ज करेगा।
(8) मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के अलावा कोई अन्य मजिस्ट्रेट ऐसा आदेश देते समय अपने आदेश की एक प्रति, उसे देने के कारणों सहित, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को भेजेगा।
(9) यदि किसी मामले में, जिस पर मजिस्ट्रेट द्वारा समन के रूप में विचारण किया जा सकता है, जांच आरोपी की गिरफ्तारी की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर पूरी नहीं होती है, तो मजिस्ट्रेट अपराध की आगे की जांच रोकने का आदेश देगा, जब तक कि जांच करने वाला अधिकारी मजिस्ट्रेट को संतुष्ट न कर दे कि विशेष कारणों से और न्याय के हित में छह महीने की अवधि के बाद जांच जारी रखना आवश्यक है।
(10) जहाँ उपधारा (9) के अधीन किसी अपराध की आगे की जाँच रोकने का कोई आदेश दिया गया हो, तो सत्र न्यायाधीश, यदि वह अपने समक्ष किए गए आवेदन पर या अन्यथा संतुष्ट हो कि अपराध की आगे की जाँच की जानी चाहिए, तो उपधारा (9) के अधीन दिए गए आदेश को रद्द कर सकता है और जमानत और अन्य मामलों के संबंध में ऐसे निर्देश देने के अधीन अपराध की आगे की जाँच करने का निर्देश दे सकता है, जैसा वह निर्दिष्ट करे।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
