पाठ लगभग अपरिवर्तित है
BNS धारा 36 अब IPC धारा 98 है
मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति आदि के कृत्यों के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार।
पुराना कानून
BNS §36
मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति आदि के कृत्यों के विरुद्ध आत्मरक्षा का अधिकार।
जब कोई ऐसा कार्य, जो अन्यथा निश्चित रूप से अपराध होता, उस कार्य को करने वाले व्यक्ति की कम उम्र, अपरिपक्व बुद्धि, मानसिक अस्वस्थता या नशे की हालत के कारण, या उस व्यक्ति की किसी गलतफहमी के कारण, वह अपराध नहीं होता, तो प्रत्येक व्यक्ति को उस कार्य के विरुद्ध आत्मरक्षा का वही अधिकार होता है जो उसे तब होता जब वह कार्य अपराध होता।
चित्र।
(क) Z, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति है, A को जान से मारने का प्रयास करता है; Z किसी अपराध का दोषी नहीं है। लेकिन A को आत्मरक्षा का वही अधिकार है जो उसे तब होता जब Z स्वस्थ होता।
(ख) ए रात में एक ऐसे घर में प्रवेश करता है जिसमें प्रवेश करने का उसे कानूनी अधिकार है। जेड, सद्भावना से, ए को सेंधमार समझकर उस पर हमला करता है। यहाँ जेड, इस गलतफहमी के तहत ए पर हमला करके कोई अपराध नहीं करता है। लेकिन ए को जेड के विरुद्ध आत्मरक्षा का वही अधिकार है जो उसे तब होता जब जेड उस गलतफहमी के तहत कार्य नहीं कर रहा होता।
पूरा पढ़ें: BNS §36चित्र।
(क) Z, जो मानसिक रूप से अस्वस्थ व्यक्ति है, A को जान से मारने का प्रयास करता है; Z किसी अपराध का दोषी नहीं है। लेकिन A को आत्मरक्षा का वही अधिकार है जो उसे तब होता जब Z स्वस्थ होता।
(ख) ए रात में एक ऐसे घर में प्रवेश करता है जिसमें प्रवेश करने का उसे कानूनी अधिकार है। जेड, सद्भावना से, ए को सेंधमार समझकर उस पर हमला करता है। यहाँ जेड, इस गलतफहमी के तहत ए पर हमला करके कोई अपराध नहीं करता है। लेकिन ए को जेड के विरुद्ध आत्मरक्षा का वही अधिकार है जो उसे तब होता जब जेड उस गलतफहमी के तहत कार्य नहीं कर रहा होता।
नया कानून
IPC §98
धारा 98 - ऐसे व्यक्ति के कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकॄतचित्त आदि हो
ऐसे व्यक्ति के कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का अधिकार जो विकॄतचित्त आदि हो
जब कि कोई कार्य जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले कार्य के बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्तविकॄति या मत्तता के कारण, या उस कार्य के किसी भरम के कारण, वही अपराध नहीं है, तब हर कार्य उस कार्य के विरुदध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता ।
द्रष्टांत :
(क) य, पागलपन के असर में, क को जान से मारने का प्रयत्न कर्ता है । य किसी अपराध का दोषी नहीं है । किन्तु क को प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार है, जो वह य के स्वस्थचित्त होने की दशा में रखता ।
(ख) क रात्रि में एक ऐसे गॄह में प्रवेश कर्ता है जिसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है । य, सद्भावपूर्वक क को गॄह-भेदक समझकर, क पर आक्रमण कर्ता है । यहां य इस भ्रम के अधीन क पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं कर्ता किंतु क, य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह तब रखता, जब य उस भ्रम के अधीन कार्य न कर्ता ।
पूरा पढ़ें: IPC §98जब कि कोई कार्य जो अन्यथा कोई अपराध होता, उस कार्य को करने वाले कार्य के बालकपन, समझ की परिपक्वता के अभाव, चित्तविकॄति या मत्तता के कारण, या उस कार्य के किसी भरम के कारण, वही अपराध नहीं है, तब हर कार्य उस कार्य के विरुदध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह उस कार्य के वैसा अपराध होने की दशा में रखता ।
द्रष्टांत :
(क) य, पागलपन के असर में, क को जान से मारने का प्रयत्न कर्ता है । य किसी अपराध का दोषी नहीं है । किन्तु क को प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार है, जो वह य के स्वस्थचित्त होने की दशा में रखता ।
(ख) क रात्रि में एक ऐसे गॄह में प्रवेश कर्ता है जिसमें प्रवेश करने के लिए वह वैध रूप से हकदार है । य, सद्भावपूर्वक क को गॄह-भेदक समझकर, क पर आक्रमण कर्ता है । यहां य इस भ्रम के अधीन क पर आक्रमण करके कोई अपराध नहीं कर्ता किंतु क, य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का वही अधिकार रखता है, जो वह तब रखता, जब य उस भ्रम के अधीन कार्य न कर्ता ।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
