Limitation Act 17अध्याय III · Computation of Period of Limitation
धारा 17 · धोखाधड़ी या गलती का परिणाम।
अक्षर आकार — स्तर 1, कुल 4 में से
(1) जहाँ, किसी ऐसे वाद या आवेदन के मामले में जिसके लिए इस अधिनियम द्वारा परिसीमा अवधि निर्धारित की गई है,—
(क) मुकदमा या आवेदन प्रतिवादी या उत्तरदाता या उसके एजेंट की धोखाधड़ी पर आधारित है; या
(ख) जिस अधिकार या हक पर कोई मुकदमा या आवेदन आधारित है, उसका ज्ञान उपर्युक्त किसी व्यक्ति के धोखे से छिपाया गया हो; या
(ग) मुकदमा या आवेदन किसी गलती के परिणामों से राहत पाने के लिए है; या
(घ) जहां वादी या आवेदक के अधिकार को स्थापित करने के लिए आवश्यक कोई दस्तावेज उससे कपटपूर्ण तरीके से छिपाया गया हो,
परिसीमा अवधि तब तक शुरू नहीं होगी जब तक वादी या आवेदक को धोखाधड़ी या गलती का पता नहीं चल जाता या उचित सावधानी बरतने पर इसका पता चल सकता था; या किसी छिपे हुए दस्तावेज़ के मामले में, तब तक जब तक वादी या आवेदक के पास पहले छिपे हुए दस्तावेज़ को प्रस्तुत करने या उसे प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने का साधन न हो।
बशर्ते कि इस धारा में कोई भी बात किसी ऐसी संपत्ति के विरुद्ध किसी प्रभार की वसूली या प्रवर्तन के लिए, या उसे प्रभावित करने वाले किसी लेन-देन को रद्द करने के लिए कोई मुकदमा दायर करने या आवेदन करने की अनुमति नहीं देगी, जो कि—
(i) धोखाधड़ी के मामले में, यदि किसी व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के बदले में कोई वस्तु खरीदी गई है जो धोखाधड़ी में भागीदार नहीं था और खरीद के समय उसे यह ज्ञात नहीं था, या यह मानने का कोई कारण नहीं था, कि कोई धोखाधड़ी की गई है, या
(ii) गलती होने की स्थिति में, यदि वह वस्तु उस लेन-देन के बाद, जिसमें गलती हुई थी, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के बदले खरीदी गई हो, जिसे यह ज्ञात न हो, या यह मानने का कोई कारण न हो, कि गलती हुई थी, या
(iii) किसी छिपे हुए दस्तावेज़ के मामले में, उसे किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के लिए खरीदा गया हो जो छिपाने में भागीदार नहीं था और खरीद के समय यह नहीं जानता था, या यह मानने का कोई कारण नहीं था कि दस्तावेज़ छिपाया गया था।
(2) यदि किसी निर्णय-देनदार ने कपट या बलपूर्वक परिसीमा अवधि के भीतर किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन को रोका है, तो न्यायालय उक्त अवधि की समाप्ति के बाद निर्णय-देनदार द्वारा किए गए आवेदन पर डिक्री या आदेश के निष्पादन की अवधि बढ़ा सकता है:
बशर्ते कि ऐसा आवेदन धोखाधड़ी का पता चलने की तारीख या बल के समाप्त होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर किया जाए, जैसा भी मामला हो।
(क) मुकदमा या आवेदन प्रतिवादी या उत्तरदाता या उसके एजेंट की धोखाधड़ी पर आधारित है; या
(ख) जिस अधिकार या हक पर कोई मुकदमा या आवेदन आधारित है, उसका ज्ञान उपर्युक्त किसी व्यक्ति के धोखे से छिपाया गया हो; या
(ग) मुकदमा या आवेदन किसी गलती के परिणामों से राहत पाने के लिए है; या
(घ) जहां वादी या आवेदक के अधिकार को स्थापित करने के लिए आवश्यक कोई दस्तावेज उससे कपटपूर्ण तरीके से छिपाया गया हो,
परिसीमा अवधि तब तक शुरू नहीं होगी जब तक वादी या आवेदक को धोखाधड़ी या गलती का पता नहीं चल जाता या उचित सावधानी बरतने पर इसका पता चल सकता था; या किसी छिपे हुए दस्तावेज़ के मामले में, तब तक जब तक वादी या आवेदक के पास पहले छिपे हुए दस्तावेज़ को प्रस्तुत करने या उसे प्रस्तुत करने के लिए बाध्य करने का साधन न हो।
बशर्ते कि इस धारा में कोई भी बात किसी ऐसी संपत्ति के विरुद्ध किसी प्रभार की वसूली या प्रवर्तन के लिए, या उसे प्रभावित करने वाले किसी लेन-देन को रद्द करने के लिए कोई मुकदमा दायर करने या आवेदन करने की अनुमति नहीं देगी, जो कि—
(i) धोखाधड़ी के मामले में, यदि किसी व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के बदले में कोई वस्तु खरीदी गई है जो धोखाधड़ी में भागीदार नहीं था और खरीद के समय उसे यह ज्ञात नहीं था, या यह मानने का कोई कारण नहीं था, कि कोई धोखाधड़ी की गई है, या
(ii) गलती होने की स्थिति में, यदि वह वस्तु उस लेन-देन के बाद, जिसमें गलती हुई थी, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के बदले खरीदी गई हो, जिसे यह ज्ञात न हो, या यह मानने का कोई कारण न हो, कि गलती हुई थी, या
(iii) किसी छिपे हुए दस्तावेज़ के मामले में, उसे किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा मूल्यवान प्रतिफल के लिए खरीदा गया हो जो छिपाने में भागीदार नहीं था और खरीद के समय यह नहीं जानता था, या यह मानने का कोई कारण नहीं था कि दस्तावेज़ छिपाया गया था।
(2) यदि किसी निर्णय-देनदार ने कपट या बलपूर्वक परिसीमा अवधि के भीतर किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन को रोका है, तो न्यायालय उक्त अवधि की समाप्ति के बाद निर्णय-देनदार द्वारा किए गए आवेदन पर डिक्री या आदेश के निष्पादन की अवधि बढ़ा सकता है:
बशर्ते कि ऐसा आवेदन धोखाधड़ी का पता चलने की तारीख या बल के समाप्त होने की तारीख से एक वर्ष के भीतर किया जाए, जैसा भी मामला हो।
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