पाठ लगभग अपरिवर्तित है
CrPC धारा 436A अब BNSS धारा 479 है
धारा 436A. वह अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन बंदी निरुद्ध रखा जा सकेगा
पुराना कानून
CrPC §436A
धारा 436A. वह अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन बंदी निरुद्ध रखा जा सकेगा
436A. वह अधिकतम अवधि जिसके लिए विचाराधीन बंदी निरुद्ध रखा जा सकेगा
जहां किसी व्यक्ति ने, किसी विधि के अधीन किसी अपराध के (ऐसे अपराध से भिन्न जिसके लिए उस विधि के अधीन दंडों में से एक के रूप में मृत्यु दंड विनिर्दिष्ट किया गया है) इस संहिता के अधीन अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान, उस विधि के अधीन उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि के आधे तक की अवधि के लिए निरोध भोग लिया है, वहां वह न्यायालय द्वारा उसके स्वयं के बंधपत्र पर, प्रतिभुओं सहित या उनके बिना, छोड़ दिया जाएगा:
परन्तु न्यायालय, लोक अभियोजक को सुनने के पश्चात् और लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, ऐसे व्यक्ति के उक्त अवधि के आधे से अधिक अवधि के लिए निरोध जारी रखने का आदेश दे सकेगा, अथवा उसे स्वयं के बंधपत्र के बजाय जमानत पर, प्रतिभुओं सहित या उनके बिना, छोड़ सकेगा:
परन्तु यह और कि ऐसा कोई व्यक्ति किसी भी दशा में अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान उस विधि के अधीन उक्त अपराध के लिए उपबंधित कारावास की अधिकतम अवधि से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध न रखा जाएगा।
स्पष्टीकरण—जमानत मंजूर करने के लिए इस धारा के अधीन निरोध की अवधि की संगणना करने में, अभियुक्त द्वारा कारित कार्यवाही में विलंब के कारण हुए निरोध की अवधि अपवर्जित की जाएगी।
पूरा पढ़ें: CrPC §436Aजहां किसी व्यक्ति ने, किसी विधि के अधीन किसी अपराध के (ऐसे अपराध से भिन्न जिसके लिए उस विधि के अधीन दंडों में से एक के रूप में मृत्यु दंड विनिर्दिष्ट किया गया है) इस संहिता के अधीन अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान, उस विधि के अधीन उस अपराध के लिए विनिर्दिष्ट कारावास की अधिकतम अवधि के आधे तक की अवधि के लिए निरोध भोग लिया है, वहां वह न्यायालय द्वारा उसके स्वयं के बंधपत्र पर, प्रतिभुओं सहित या उनके बिना, छोड़ दिया जाएगा:
परन्तु न्यायालय, लोक अभियोजक को सुनने के पश्चात् और लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, ऐसे व्यक्ति के उक्त अवधि के आधे से अधिक अवधि के लिए निरोध जारी रखने का आदेश दे सकेगा, अथवा उसे स्वयं के बंधपत्र के बजाय जमानत पर, प्रतिभुओं सहित या उनके बिना, छोड़ सकेगा:
परन्तु यह और कि ऐसा कोई व्यक्ति किसी भी दशा में अन्वेषण, जांच या विचारण की अवधि के दौरान उस विधि के अधीन उक्त अपराध के लिए उपबंधित कारावास की अधिकतम अवधि से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध न रखा जाएगा।
स्पष्टीकरण—जमानत मंजूर करने के लिए इस धारा के अधीन निरोध की अवधि की संगणना करने में, अभियुक्त द्वारा कारित कार्यवाही में विलंब के कारण हुए निरोध की अवधि अपवर्जित की जाएगी।
नया कानून
BNSS §479
विचाराधीन कैदी को अधिकतम कितने समय तक हिरासत में रखा जा सकता है।
(1) यदि कोई व्यक्ति किसी कानून के तहत किसी अपराध की इस संहिता के अंतर्गत जांच, पूछताछ या मुकदमे की अवधि के दौरान (ऐसा अपराध न हो जिसके लिए उस कानून के तहत मृत्युदंड या आजीवन कारावास का प्रावधान हो) उस कानून के तहत उस अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास अवधि के आधे तक की अवधि के लिए हिरासत में रहा हो, तो उसे न्यायालय द्वारा जमानत पर रिहा किया जाएगा:
बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति पहली बार अपराध कर रहा है (जिसे अतीत में कभी किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है), तो उसे न्यायालय द्वारा जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, यदि उसने उस कानून के तहत ऐसे अपराध के लिए निर्दिष्ट अधिकतम कारावास अवधि के एक तिहाई तक की अवधि के लिए हिरासत में रखा हो।
इसके अलावा, न्यायालय लोक अभियोजक की सुनवाई के बाद और लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर, उक्त अवधि के आधे से अधिक समय तक ऐसे व्यक्ति को निरंतर हिरासत में रखने का आदेश दे सकता है या उसे उसके जमानत बांड के स्थान पर जमानत बांड पर रिहा कर सकता है।
इसके अलावा, यह भी प्रावधान है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को जांच, पूछताछ या मुकदमे की अवधि के दौरान उस कानून के तहत उक्त अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
स्पष्टीकरण। —इस धारा के तहत जमानत देने हेतु हिरासत की अवधि की गणना करते समय, अभियुक्त द्वारा कार्यवाही में देरी के कारण व्यतीत हिरासत की अवधि को शामिल नहीं किया जाएगा।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, तथा उसके तीसरे परंतुक के अधीन रहते हुए, यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक अपराधों में या अनेक मामलों में जाँच, पूछताछ या मुकदमा लंबित हो, तो न्यायालय द्वारा उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा।
(3) जिस जेल में अभियुक्त व्यक्ति को हिरासत में रखा गया है, वहां का जेल अधीक्षक, उपधारा (1) में उल्लिखित अवधि के आधे या एक तिहाई भाग के पूरा होने पर, जैसा भी मामला हो, न्यायालय को धारा (1) के तहत कार्यवाही करने हेतु लिखित में आवेदन करेगा ताकि ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जा सके।
पूरा पढ़ें: BNSS §479बशर्ते कि यदि ऐसा व्यक्ति पहली बार अपराध कर रहा है (जिसे अतीत में कभी किसी अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया गया है), तो उसे न्यायालय द्वारा जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा, यदि उसने उस कानून के तहत ऐसे अपराध के लिए निर्दिष्ट अधिकतम कारावास अवधि के एक तिहाई तक की अवधि के लिए हिरासत में रखा हो।
इसके अलावा, न्यायालय लोक अभियोजक की सुनवाई के बाद और लिखित रूप में दर्ज किए जाने वाले कारणों के आधार पर, उक्त अवधि के आधे से अधिक समय तक ऐसे व्यक्ति को निरंतर हिरासत में रखने का आदेश दे सकता है या उसे उसके जमानत बांड के स्थान पर जमानत बांड पर रिहा कर सकता है।
इसके अलावा, यह भी प्रावधान है कि किसी भी ऐसे व्यक्ति को जांच, पूछताछ या मुकदमे की अवधि के दौरान उस कानून के तहत उक्त अपराध के लिए निर्धारित अधिकतम कारावास अवधि से अधिक समय तक हिरासत में नहीं रखा जाएगा।
स्पष्टीकरण। —इस धारा के तहत जमानत देने हेतु हिरासत की अवधि की गणना करते समय, अभियुक्त द्वारा कार्यवाही में देरी के कारण व्यतीत हिरासत की अवधि को शामिल नहीं किया जाएगा।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, तथा उसके तीसरे परंतुक के अधीन रहते हुए, यदि किसी व्यक्ति के विरुद्ध एक से अधिक अपराधों में या अनेक मामलों में जाँच, पूछताछ या मुकदमा लंबित हो, तो न्यायालय द्वारा उसे जमानत पर रिहा नहीं किया जाएगा।
(3) जिस जेल में अभियुक्त व्यक्ति को हिरासत में रखा गया है, वहां का जेल अधीक्षक, उपधारा (1) में उल्लिखित अवधि के आधे या एक तिहाई भाग के पूरा होने पर, जैसा भी मामला हो, न्यायालय को धारा (1) के तहत कार्यवाही करने हेतु लिखित में आवेदन करेगा ताकि ऐसे व्यक्ति को जमानत पर रिहा किया जा सके।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
