पुराना कानून
CrPC §357
मुआवजा देने का आदेश।
(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (मृत्युदंड सहित) सुनाता है जिसमें जुर्माना एक हिस्सा होता है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भाग राशि को लागू करने का आदेश दे सकता है---
(क) अभियोजन में विधिवत रूप से किए गए व्ययों की पूर्ति में;
(ख) किसी अपराध के कारण हुई किसी हानि या चोट के लिए किसी व्यक्ति को मुआवजे का भुगतान करने में, जब न्यायालय की राय में मुआवजा ऐसे व्यक्ति द्वारा दीवानी न्यायालय में वसूल किया जा सकता है;
(ग) जब किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने या ऐसे अपराध को अंजाम देने में सहायता करने के लिए किसी अपराध का दोषी ठहराया जाता है, तो उन व्यक्तियों को मुआवजा देने में, जो घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 (13 ऑफ 1855) के तहत, ऐसे मृत्यु से होने वाली हानि के लिए सजा पाए व्यक्ति से हर्जाना वसूलने के हकदार हैं;
(घ) जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है जिसमें चोरी, आपराधिक गबन, आपराधिक विश्वासघात, या धोखाधड़ी शामिल है, या बेईमानी से चोरी की संपत्ति प्राप्त करने या उसे अपने पास रखने का, या स्वेच्छा से चोरी की संपत्ति को बेचने में सहायता करने का, यह जानते हुए या यह मानने का कारण रखते हुए कि वह चोरी की संपत्ति है, तो ऐसी संपत्ति के किसी वास्तविक खरीदार को उसके नुकसान की भरपाई करने में, यदि ऐसी संपत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे में वापस कर दी जाती है।
(2) यदि जुर्माना किसी ऐसे मामले में लगाया जाता है जो अपील के अधीन है, तो अपील प्रस्तुत करने के लिए अनुमत अवधि समाप्त होने से पहले, या यदि अपील प्रस्तुत की जाती है, तो अपील के निर्णय से पहले ऐसा कोई भुगतान नहीं किया जाएगा।
(3) जब कोई न्यायालय ऐसी सजा सुनाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकता है, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुंची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा सुनाई गई है।
(4) इस धारा के अंतर्गत आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है।
(5) उसी मामले से संबंधित किसी भी अनुवर्ती दीवानी मुकदमे में मुआवजा प्रदान करते समय, न्यायालय
इस धारा के तहत मुआवजे के रूप में भुगतान की गई या वसूल की गई किसी भी राशि को ध्यान में रखा जाएगा।
राज्य संशोधन
कर्नाटक
धारा 357 में संशोधन।
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (केंद्रीय अधिनियम 2 ऑफ 1974) की धारा 357 में--
(1) धारा 357 की उपधारा (1) में, "न्यायालय कर सकता है" शब्दों के बाद, कोष्ठक, अंक और शब्द "और जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और अभियुक्त व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है, तो न्यायालय करेगा" प्रतिस्थापित किए जाएंगे:
(2) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब कोई न्यायालय ऐसा दंड देता है जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और जहाँ जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध किया गया है वह संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और अभियुक्त व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है, तो न्यायालय, निर्णय देते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट हुई है जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार दंडित किया गया है।
[कर्नाटक अधिनियम 27, 1987, धारा 2 देखें]।
मध्य प्रदेश
धारा 357 का संशोधन.-- मूल अधिनियम की धारा 357 में, --
(i) उपधारा (1) में, कोष्ठक, अंक और शब्द "(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (मृत्युदंड सहित) लगाता है जिसमें जुर्माना एक भाग है, तो न्यायालय निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भाग को लागू करने का आदेश दे सकता है" के स्थान पर कोष्ठक, अंक और शब्द "(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (मृत्युदंड सहित) लगाता है जिसमें जुर्माना एक भाग है, तो न्यायालय, और जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, सिवाय इसके कि जब आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों ऐसी जाति या जनजाति से संबंधित हों, तो न्यायालय निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भाग को लागू करने का आदेश देगा--" प्रतिस्थापित किया जाएगा; और
(ii) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब न्यायालय कोई ऐसा दंड लगाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और जहाँ किसी अपराध के विरुद्ध अपराध किया गया व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, तो न्यायालय निर्णय देते समय अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुँची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार दंड दिया गया है:
"बशर्ते कि न्यायालय आरोपी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में कोई राशि अदा करने का आदेश नहीं देगा यदि आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों।"
[मध्य प्रदेश अधिनियम 29, 1978, धारा 3 देखें ।]
पश्चिम बंगाल
मूल अधिनियम की धारा 357 में,--
(क) उपधारा (1) में, "जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (जिसमें मृत्युदंड भी शामिल हो) लगाता है जिसमें जुर्माना एक हिस्सा हो, तो न्यायालय निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भी राशि को लागू करने का आदेश दे सकता है--" शब्दों और कोष्ठकों के स्थान पर "जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (जिसमें मृत्युदंड भी शामिल हो) लगाता है जिसमें जुर्माना एक हिस्सा हो, तो न्यायालय, और जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का हो, सिवाय इसके कि जब आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के हों, निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भी राशि को लागू करने का आदेश देगा--" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब कोई न्यायालय ऐसी सजा सुनाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और यदि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का है, तो निर्णय सुनाते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुंची है जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा सुनाई गई है।
परंतु न्यायालय अभियुक्त व्यक्ति को मुआवजे के रूप में कोई राशि अदा करने का आदेश नहीं देगा, यदि अभियुक्त व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों।
(ग) उपधारा (5) के बाद, निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाएगा:--
स्पष्टीकरण.-- इस धारा के प्रयोजनों के लिए "अनुसूचित जाति" और "अनुसूचित जनजाति" अभिव्यक्ति का वही अर्थ होगा जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में क्रमशः उन्हें दिया गया है।
[पश्चिम बंगाल अधिनियम 33, 1985, धारा 3 देखें ।]
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना
केंद्रीय अधिनियम 2 ऑफ 1974 की धारा 357 का संशोधन।-- दंड प्रक्रिया संहिता, 1974 में आंध्र प्रदेश राज्य पर लागू होने के संबंध में धारा 357 में,--
(i) उपधारा (1) में, "न्यायालय कर सकता है" शब्दों के बाद, "और जहां कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, सिवाय इसके कि जब आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, दोनों ऐसी जातियों या जनजातियों से संबंधित हों, तो न्यायालय," अभिव्यक्ति जोड़ी जाएगी और
(ii) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब कोई न्यायालय ऐसा दंड लगाता है जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और जहाँ अपराध करने वाला व्यक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, तो न्यायालय निर्णय देते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुँची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार दंड दिया गया है:
इस शर्त के साथ कि न्यायालय आरोपी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में कोई राशि अदा करने का आदेश नहीं देगा, यदि आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों।
[आंध्र प्रदेश अधिनियम 21, 1993, धारा 2 देखें ]
उतार प्रदेश।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357 में,
(क) उपधारा (1) में खंड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:--
बशर्ते कि यदि खंड (ख), (ग) और (घ) के तहत मुआवजा प्राप्त करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है और सजा पाने वाला व्यक्ति ऐसी जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है, तो न्यायालय वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भी राशि को ऐसे मुआवजे के भुगतान में लगाने का आदेश देगा।
[उत्तर प्रदेश अधिनियम 17, 1992, धारा 2 देखें ]
बिहार
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम द्वितीय, 1974) की धारा 357 का संशोधन। -- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम द्वितीय, 1974) की धारा 357 की उपधारा (1) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्: --
बशर्ते कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध किया गया है वह संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25) के तहत परिभाषित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित हो, तो न्यायालय निर्णय के समय यह आदेश पारित करेगा कि वसूल की गई जुर्माने की पूरी राशि या उसका कोई भाग मुआवजे के रूप में ऐसे व्यक्ति के लाभ के लिए उपयोग किया जाएगा।
[बिहार अधिनियम 9, 1985, धारा 2 देखें ]
पूरा पढ़ें: CrPC §357(क) अभियोजन में विधिवत रूप से किए गए व्ययों की पूर्ति में;
(ख) किसी अपराध के कारण हुई किसी हानि या चोट के लिए किसी व्यक्ति को मुआवजे का भुगतान करने में, जब न्यायालय की राय में मुआवजा ऐसे व्यक्ति द्वारा दीवानी न्यायालय में वसूल किया जा सकता है;
(ग) जब किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने या ऐसे अपराध को अंजाम देने में सहायता करने के लिए किसी अपराध का दोषी ठहराया जाता है, तो उन व्यक्तियों को मुआवजा देने में, जो घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 (13 ऑफ 1855) के तहत, ऐसे मृत्यु से होने वाली हानि के लिए सजा पाए व्यक्ति से हर्जाना वसूलने के हकदार हैं;
(घ) जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है जिसमें चोरी, आपराधिक गबन, आपराधिक विश्वासघात, या धोखाधड़ी शामिल है, या बेईमानी से चोरी की संपत्ति प्राप्त करने या उसे अपने पास रखने का, या स्वेच्छा से चोरी की संपत्ति को बेचने में सहायता करने का, यह जानते हुए या यह मानने का कारण रखते हुए कि वह चोरी की संपत्ति है, तो ऐसी संपत्ति के किसी वास्तविक खरीदार को उसके नुकसान की भरपाई करने में, यदि ऐसी संपत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे में वापस कर दी जाती है।
(2) यदि जुर्माना किसी ऐसे मामले में लगाया जाता है जो अपील के अधीन है, तो अपील प्रस्तुत करने के लिए अनुमत अवधि समाप्त होने से पहले, या यदि अपील प्रस्तुत की जाती है, तो अपील के निर्णय से पहले ऐसा कोई भुगतान नहीं किया जाएगा।
(3) जब कोई न्यायालय ऐसी सजा सुनाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकता है, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुंची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा सुनाई गई है।
(4) इस धारा के अंतर्गत आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है।
(5) उसी मामले से संबंधित किसी भी अनुवर्ती दीवानी मुकदमे में मुआवजा प्रदान करते समय, न्यायालय
इस धारा के तहत मुआवजे के रूप में भुगतान की गई या वसूल की गई किसी भी राशि को ध्यान में रखा जाएगा।
राज्य संशोधन
कर्नाटक
धारा 357 में संशोधन।
दंड प्रक्रिया संहिता 1973 (केंद्रीय अधिनियम 2 ऑफ 1974) की धारा 357 में--
(1) धारा 357 की उपधारा (1) में, "न्यायालय कर सकता है" शब्दों के बाद, कोष्ठक, अंक और शब्द "और जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और अभियुक्त व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है, तो न्यायालय करेगा" प्रतिस्थापित किए जाएंगे:
(2) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब कोई न्यायालय ऐसा दंड देता है जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और जहाँ जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध किया गया है वह संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है और अभियुक्त व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित नहीं है, तो न्यायालय, निर्णय देते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट हुई है जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार दंडित किया गया है।
[कर्नाटक अधिनियम 27, 1987, धारा 2 देखें]।
मध्य प्रदेश
धारा 357 का संशोधन.-- मूल अधिनियम की धारा 357 में, --
(i) उपधारा (1) में, कोष्ठक, अंक और शब्द "(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (मृत्युदंड सहित) लगाता है जिसमें जुर्माना एक भाग है, तो न्यायालय निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भाग को लागू करने का आदेश दे सकता है" के स्थान पर कोष्ठक, अंक और शब्द "(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (मृत्युदंड सहित) लगाता है जिसमें जुर्माना एक भाग है, तो न्यायालय, और जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, सिवाय इसके कि जब आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों ऐसी जाति या जनजाति से संबंधित हों, तो न्यायालय निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भाग को लागू करने का आदेश देगा--" प्रतिस्थापित किया जाएगा; और
(ii) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब न्यायालय कोई ऐसा दंड लगाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और जहाँ किसी अपराध के विरुद्ध अपराध किया गया व्यक्ति संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, तो न्यायालय निर्णय देते समय अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुँची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार दंड दिया गया है:
"बशर्ते कि न्यायालय आरोपी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में कोई राशि अदा करने का आदेश नहीं देगा यदि आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों।"
[मध्य प्रदेश अधिनियम 29, 1978, धारा 3 देखें ।]
पश्चिम बंगाल
मूल अधिनियम की धारा 357 में,--
(क) उपधारा (1) में, "जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (जिसमें मृत्युदंड भी शामिल हो) लगाता है जिसमें जुर्माना एक हिस्सा हो, तो न्यायालय निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भी राशि को लागू करने का आदेश दे सकता है--" शब्दों और कोष्ठकों के स्थान पर "जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (जिसमें मृत्युदंड भी शामिल हो) लगाता है जिसमें जुर्माना एक हिस्सा हो, तो न्यायालय, और जहां वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का हो, सिवाय इसके कि जब आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के हों, निर्णय देते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भी राशि को लागू करने का आदेश देगा--" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे;
(ख) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब कोई न्यायालय ऐसी सजा सुनाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और यदि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का है, तो निर्णय सुनाते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुंची है जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा सुनाई गई है।
परंतु न्यायालय अभियुक्त व्यक्ति को मुआवजे के रूप में कोई राशि अदा करने का आदेश नहीं देगा, यदि अभियुक्त व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों।
(ग) उपधारा (5) के बाद, निम्नलिखित स्पष्टीकरण जोड़ा जाएगा:--
स्पष्टीकरण.-- इस धारा के प्रयोजनों के लिए "अनुसूचित जाति" और "अनुसूचित जनजाति" अभिव्यक्ति का वही अर्थ होगा जो भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में क्रमशः उन्हें दिया गया है।
[पश्चिम बंगाल अधिनियम 33, 1985, धारा 3 देखें ।]
आंध्र प्रदेश और तेलंगाना
केंद्रीय अधिनियम 2 ऑफ 1974 की धारा 357 का संशोधन।-- दंड प्रक्रिया संहिता, 1974 में आंध्र प्रदेश राज्य पर लागू होने के संबंध में धारा 357 में,--
(i) उपधारा (1) में, "न्यायालय कर सकता है" शब्दों के बाद, "और जहां कोई व्यक्ति जिसके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, सिवाय इसके कि जब आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध कोई अपराध किया गया है, दोनों ऐसी जातियों या जनजातियों से संबंधित हों, तो न्यायालय," अभिव्यक्ति जोड़ी जाएगी और
(ii) उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा प्रतिस्थापित की जाएगी, अर्थात्:--
(3) जब कोई न्यायालय ऐसा दंड लगाता है जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय, और जहाँ अपराध करने वाला व्यक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और (25) में परिभाषित अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित है, तो न्यायालय निर्णय देते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में भुगतान करने का आदेश देगा, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुँची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को इस प्रकार दंड दिया गया है:
इस शर्त के साथ कि न्यायालय आरोपी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में कोई राशि अदा करने का आदेश नहीं देगा, यदि आरोपी व्यक्ति और वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध अपराध किया गया है, दोनों अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति से संबंधित हों।
[आंध्र प्रदेश अधिनियम 21, 1993, धारा 2 देखें ]
उतार प्रदेश।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 357 में,
(क) उपधारा (1) में खंड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्:--
बशर्ते कि यदि खंड (ख), (ग) और (घ) के तहत मुआवजा प्राप्त करने वाला व्यक्ति अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति का सदस्य है और सजा पाने वाला व्यक्ति ऐसी जाति या जनजाति का सदस्य नहीं है, तो न्यायालय वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भी राशि को ऐसे मुआवजे के भुगतान में लगाने का आदेश देगा।
[उत्तर प्रदेश अधिनियम 17, 1992, धारा 2 देखें ]
बिहार
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम द्वितीय, 1974) की धारा 357 का संशोधन। -- दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (अधिनियम द्वितीय, 1974) की धारा 357 की उपधारा (1) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात्: --
बशर्ते कि जिस व्यक्ति के विरुद्ध अपराध किया गया है वह संविधान के अनुच्छेद 366 के खंड (24) और खंड (25) के तहत परिभाषित अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबंधित हो, तो न्यायालय निर्णय के समय यह आदेश पारित करेगा कि वसूल की गई जुर्माने की पूरी राशि या उसका कोई भाग मुआवजे के रूप में ऐसे व्यक्ति के लाभ के लिए उपयोग किया जाएगा।
[बिहार अधिनियम 9, 1985, धारा 2 देखें ]
नया कानून
BNSS §395
मुआवजा देने का आदेश।
(1) जब कोई न्यायालय जुर्माने की सजा या ऐसी सजा (मृत्युदंड सहित) सुनाता है जिसमें जुर्माना एक हिस्सा होता है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय, वसूल किए गए जुर्माने की पूरी या किसी भाग राशि को लागू करने का आदेश दे सकता है---
(क) अभियोजन में विधिवत रूप से किए गए खर्चों की पूर्ति में;
(ख) किसी अपराध के कारण हुई किसी हानि या चोट के लिए किसी व्यक्ति को मुआवजे का भुगतान करने में, जब न्यायालय की राय में मुआवजा ऐसे व्यक्ति द्वारा दीवानी न्यायालय में वसूल किया जा सकता है;
(ग) जब किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने या ऐसे अपराध को अंजाम देने में सहायता करने के लिए किसी अपराध का दोषी ठहराया जाता है, तो उन व्यक्तियों को मुआवजा देने में, जो घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 (13 ऑफ 1855) के तहत, ऐसे मृत्यु से होने वाली हानि के लिए सजा पाए व्यक्ति से हर्जाना वसूलने के हकदार हैं;
(घ) जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है जिसमें चोरी, आपराधिक गबन, आपराधिक विश्वासघात, या धोखाधड़ी शामिल है, या बेईमानी से चोरी की संपत्ति प्राप्त करने या उसे अपने पास रखने का, या स्वेच्छा से चोरी की संपत्ति को बेचने में सहायता करने का, यह जानते हुए या यह मानने का कारण रखते हुए कि वह चोरी की संपत्ति है, तो ऐसी संपत्ति के किसी वास्तविक खरीदार को उसके नुकसान की भरपाई करने में, यदि ऐसी संपत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे में वापस कर दी जाती है।
(2) यदि जुर्माना किसी ऐसे मामले में लगाया जाता है जो अपील के अधीन है, तो अपील प्रस्तुत करने के लिए अनुमत अवधि समाप्त होने से पहले, या यदि अपील प्रस्तुत की जाती है, तो अपील के निर्णय से पहले ऐसा कोई भुगतान नहीं किया जाएगा।
(3) जब कोई न्यायालय ऐसी सजा सुनाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकता है, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुंची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा सुनाई गई है।
(4) इस धारा के अंतर्गत आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है।
(5) उसी मामले से संबंधित किसी भी अनुवर्ती दीवानी मुकदमे में मुआवजा देते समय न्यायालय इस धारा के तहत मुआवजे के रूप में भुगतान की गई या वसूल की गई किसी भी राशि को ध्यान में रखेगा।
पूरा पढ़ें: BNSS §395(क) अभियोजन में विधिवत रूप से किए गए खर्चों की पूर्ति में;
(ख) किसी अपराध के कारण हुई किसी हानि या चोट के लिए किसी व्यक्ति को मुआवजे का भुगतान करने में, जब न्यायालय की राय में मुआवजा ऐसे व्यक्ति द्वारा दीवानी न्यायालय में वसूल किया जा सकता है;
(ग) जब किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनने या ऐसे अपराध को अंजाम देने में सहायता करने के लिए किसी अपराध का दोषी ठहराया जाता है, तो उन व्यक्तियों को मुआवजा देने में, जो घातक दुर्घटना अधिनियम, 1855 (13 ऑफ 1855) के तहत, ऐसे मृत्यु से होने वाली हानि के लिए सजा पाए व्यक्ति से हर्जाना वसूलने के हकदार हैं;
(घ) जब कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपराध का दोषी पाया जाता है जिसमें चोरी, आपराधिक गबन, आपराधिक विश्वासघात, या धोखाधड़ी शामिल है, या बेईमानी से चोरी की संपत्ति प्राप्त करने या उसे अपने पास रखने का, या स्वेच्छा से चोरी की संपत्ति को बेचने में सहायता करने का, यह जानते हुए या यह मानने का कारण रखते हुए कि वह चोरी की संपत्ति है, तो ऐसी संपत्ति के किसी वास्तविक खरीदार को उसके नुकसान की भरपाई करने में, यदि ऐसी संपत्ति उसके हकदार व्यक्ति के कब्जे में वापस कर दी जाती है।
(2) यदि जुर्माना किसी ऐसे मामले में लगाया जाता है जो अपील के अधीन है, तो अपील प्रस्तुत करने के लिए अनुमत अवधि समाप्त होने से पहले, या यदि अपील प्रस्तुत की जाती है, तो अपील के निर्णय से पहले ऐसा कोई भुगतान नहीं किया जाएगा।
(3) जब कोई न्यायालय ऐसी सजा सुनाता है, जिसमें जुर्माना शामिल नहीं है, तो न्यायालय निर्णय सुनाते समय, अभियुक्त व्यक्ति को आदेश में निर्दिष्ट राशि उस व्यक्ति को मुआवजे के रूप में देने का आदेश दे सकता है, जिसे उस कृत्य के कारण कोई हानि या चोट पहुंची हो जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति को सजा सुनाई गई है।
(4) इस धारा के अंतर्गत आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है।
(5) उसी मामले से संबंधित किसी भी अनुवर्ती दीवानी मुकदमे में मुआवजा देते समय न्यायालय इस धारा के तहत मुआवजे के रूप में भुगतान की गई या वसूल की गई किसी भी राशि को ध्यान में रखेगा।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
