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CrPC धारा 329 अब BNSS धारा 368 है
धारा 329. न्यायालय के समक्ष विचारित विकृतचित्त व्यक्ति के मामले में प्रक्रिया
पुराना कानून
CrPC §329
धारा 329. न्यायालय के समक्ष विचारित विकृतचित्त व्यक्ति के मामले में प्रक्रिया
329. न्यायालय के समक्ष विचारित विकृतचित्त व्यक्ति के मामले में प्रक्रिया
(1) यदि किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के विचारण में मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि ऐसा व्यक्ति विकृतचित्त है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय प्रथमतः ऐसी विकृतचित्तता और असमर्थता के तथ्य का विचारण करेगा, और यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय, ऐसे चिकित्सीय और अन्य साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् जो उसके समक्ष पेश किया जाए, उस तथ्य से समाधान हो जाता है, तो वह उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और मामले में आगे की कार्यवाहियां मुल्तवी कर देगा।
(1क) यदि विचारण के दौरान मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय अभियुक्त को विकृतचित्त पाता है, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखरेख और उपचार के लिए किसी मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास निर्दिष्ट करेगा, और यथास्थिति, मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह रिपोर्ट देगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से ग्रस्त है या नहीं :
परन्तु यदि अभियुक्त, यथास्थिति, मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से व्यथित है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोचिकित्सा एकक का प्रमुख; और
(ख) निकटतम मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा का एक संकाय सदस्य।
(2) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे यह अवधारित करेगा कि क्या चित्त-विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा तथा अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात्, किन्तु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह विचारण को मुल्तवी करने के बजाय अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके साथ धारा 330 के अधीन उपबंधित रीति से कार्यवाही करेगा :
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह पाता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध, जिसके बारे में विकृतचित्तता का निष्कर्ष निकाला गया है, प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है, तो वह विचारण को इतनी अवधि के लिए मुल्तवी कर देगा जितनी मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है।
(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है और वह मानसिक मंदता के कारण प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तो वह विचारण नहीं करेगा और यह आदेश देगा कि अभियुक्त के साथ धारा 330 के अनुसार कार्यवाही की जाए।
पूरा पढ़ें: CrPC §329(1) यदि किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के विचारण में मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि ऐसा व्यक्ति विकृतचित्त है और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय प्रथमतः ऐसी विकृतचित्तता और असमर्थता के तथ्य का विचारण करेगा, और यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय, ऐसे चिकित्सीय और अन्य साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् जो उसके समक्ष पेश किया जाए, उस तथ्य से समाधान हो जाता है, तो वह उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और मामले में आगे की कार्यवाहियां मुल्तवी कर देगा।
(1क) यदि विचारण के दौरान मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय अभियुक्त को विकृतचित्त पाता है, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखरेख और उपचार के लिए किसी मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास निर्दिष्ट करेगा, और यथास्थिति, मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह रिपोर्ट देगा कि अभियुक्त चित्त-विकृति से ग्रस्त है या नहीं :
परन्तु यदि अभियुक्त, यथास्थिति, मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से व्यथित है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोचिकित्सा एकक का प्रमुख; और
(ख) निकटतम मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा का एक संकाय सदस्य।
(2) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह सूचित किया जाता है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे यह अवधारित करेगा कि क्या चित्त-विकृति अभियुक्त को प्रतिरक्षा करने में असमर्थ बनाती है, और यदि अभियुक्त ऐसा असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा पेश किए गए साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा तथा अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के पश्चात्, किन्तु अभियुक्त से प्रश्न किए बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बनता है, तो वह विचारण को मुल्तवी करने के बजाय अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके साथ धारा 330 के अधीन उपबंधित रीति से कार्यवाही करेगा :
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह पाता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध, जिसके बारे में विकृतचित्तता का निष्कर्ष निकाला गया है, प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है, तो वह विचारण को इतनी अवधि के लिए मुल्तवी कर देगा जितनी मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है।
(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय यह पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्ट्या मामला बनता है और वह मानसिक मंदता के कारण प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है, तो वह विचारण नहीं करेगा और यह आदेश देगा कि अभियुक्त के साथ धारा 330 के अनुसार कार्यवाही की जाए।
नया कानून
BNSS §368
न्यायालय के समक्ष अस्वास्थ्यकर व्यक्ति के मामले में मुकदमा चलाने की प्रक्रिया।
(1) यदि किसी मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है और फलस्वरूप अपना बचाव करने में असमर्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय सर्वप्रथम मानसिक अस्वस्थता और असमर्थता की पुष्टि करेगा, और यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय, उसके समक्ष प्रस्तुत चिकित्सा एवं अन्य साक्ष्यों पर विचार करने के बाद, इस तथ्य से संतुष्ट हो जाता है, तो वह इस आशय का निर्णय दर्ज करेगा तथा मामले की आगे की कार्यवाही स्थगित कर देगा।
(2) यदि मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय को अभियुक्त मानसिक रूप से अस्वस्थ लगे, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास भेजेगा, और मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक, जैसा भी मामला हो, मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित है या नहीं।
बशर्ते कि यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से असंतुष्ट है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे:
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोरोग इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग का कोई संकाय सदस्य।
(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या मानसिक अस्वस्थता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस आशय का निष्कर्ष दर्ज करेगा और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की जांच करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के बाद, परंतु अभियुक्त से पूछताछ किए बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो वह मुकदमे को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को बरी कर देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से उसके साथ व्यवहार करेगा।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि जिस अभियुक्त के संबंध में मानसिक अस्वस्थता का निष्कर्ष निकाला गया है, उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए आवश्यक अवधि के लिए मुकदमे को स्थगित कर देगा।
(4) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है तथा वह बौद्धिक अक्षमता के कारण बचाव करने में असमर्थ है, तो वह मुकदमा नहीं चलाएगा और अभियुक्त के साथ धारा 369 के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देगा।
पूरा पढ़ें: BNSS §368(2) यदि मुकदमे के दौरान मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय को अभियुक्त मानसिक रूप से अस्वस्थ लगे, तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक के पास भेजेगा, और मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक, जैसा भी मामला हो, मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त मानसिक अस्वस्थता से पीड़ित है या नहीं।
बशर्ते कि यदि अभियुक्त मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई जानकारी से असंतुष्ट है, तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकता है, जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे:
(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनोरोग इकाई का प्रमुख; और
(ख) निकटतम सरकारी मेडिकल कॉलेज में मनोचिकित्सा विभाग का कोई संकाय सदस्य।
(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचित किया जाता है कि उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति मानसिक रूप से अस्वस्थ है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे यह निर्धारित करेगा कि क्या मानसिक अस्वस्थता के कारण अभियुक्त बचाव करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त असमर्थ पाया जाता है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस आशय का निष्कर्ष दर्ज करेगा और अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की जांच करेगा और अभियुक्त के अधिवक्ता को सुनने के बाद, परंतु अभियुक्त से पूछताछ किए बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय पाता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया कोई मामला नहीं बनता है, तो वह मुकदमे को स्थगित करने के बजाय, अभियुक्त को बरी कर देगा और धारा 369 के तहत निर्धारित तरीके से उसके साथ व्यवहार करेगा।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि जिस अभियुक्त के संबंध में मानसिक अस्वस्थता का निष्कर्ष निकाला गया है, उसके विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है, तो वह मनोचिकित्सक या नैदानिक मनोवैज्ञानिक की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए आवश्यक अवधि के लिए मुकदमे को स्थगित कर देगा।
(4) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथम दृष्टया मामला बनता है तथा वह बौद्धिक अक्षमता के कारण बचाव करने में असमर्थ है, तो वह मुकदमा नहीं चलाएगा और अभियुक्त के साथ धारा 369 के अनुसार व्यवहार करने का आदेश देगा।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
