पाठ लगभग अपरिवर्तित है
CrPC धारा 220 अब BNSS धारा 243 है
धारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
पुराना कानून
CrPC §220
धारा 220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
220. एक से अधिक अपराधों के लिए विचारण
(1) यदि आपस में इस प्रकार संसक्त कार्यों की, कि वे एक ही संव्यवहार बनते हैं, एक ही शृंखला में एक ही व्यक्ति द्वारा एक से अधिक अपराध किए जाते हैं, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(2) जब किसी व्यक्ति पर, जिस पर धारा 212 की उपधारा (2) में या धारा 219 की उपधारा (1) में यथा-उपबंधित आपराधिक न्यासभंग या संपत्ति के बेईमानी से दुर्विनियोग के एक या अधिक अपराधों का आरोप है, यह अभियोग है कि उसने उस अपराध या उन अपराधों के किए जाने को सुकर बनाने या छिपाने के प्रयोजन के लिए लेखाओं के मिथ्याकरण के एक या अधिक अपराध किए हैं, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(3) यदि अभिकथित कार्य तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी विधि की, जिसके द्वारा अपराध परिभाषित या दंडित किए जाते हैं, दो या अधिक पृथक् परिभाषाओं के अंतर्गत आने वाला अपराध बनते हैं, तो उनके लिए अभियुक्त व्यक्ति पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(4) यदि कई कार्य, जिनमें से एक या एक से अधिक स्वयं अपने आप में अपराध बनते हैं, संयुक्त होने पर कोई भिन्न अपराध बनते हैं, तो उनके लिए अभियुक्त व्यक्ति पर उस अपराध के लिए, जो ऐसे कार्यों के संयुक्त होने पर बनता है, और उस अपराध के लिए, जो ऐसे कार्यों में से किसी एक या अधिक से बनता है, आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(5) इस धारा की कोई बात भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 71 पर प्रभाव न डालेगी।
उपधारा (1) के दृष्टांत
(क) क, ख को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में है, छुड़ा लेता है और ऐसा करने में ग को, जो एक कांस्टेबल है और जिसकी अभिरक्षा में ख था, घोर उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 225 और धारा 333 के अधीन अपराधों का आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ख) क जारकर्म करने के आशय से दिन में गृहभेदन करता है और इस प्रकार प्रविष्ट गृह में ख की पत्नी के साथ जारकर्म करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 454 और धारा 497 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ग) क, ख के साथ, जो ग की पत्नी है, जारकर्म करने के आशय से उसे ग के पास से फुसलाकर ले जाता है और तब उसके साथ जारकर्म करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 498 और धारा 497 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(घ) क के कब्जे में कई मुद्राएं हैं और वह यह जानता है कि वे कूटकृत हैं और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 466 के अधीन दंडनीय कई कूटरचनाएं करने के प्रयोजन के लिए उनका उपयोग करने का आशय रखता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 473 के अधीन प्रत्येक मुद्रा के कब्जे के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उसके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ङ) क, ख को क्षति कारित करने के आशय से, यह जानते हुए कि ऐसी कार्यवाही के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, उसके विरुद्ध दांडिक कार्यवाही संस्थित करता है, और यह जानते हुए भी कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, ख पर मिथ्या रूप से अपराध करने का अभियोग लगाता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 211 के अधीन दो अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(च) क, ख को क्षति कारित करने के आशय से, यह जानते हुए कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, उस पर मिथ्या रूप से अपराध करने का अभियोग लगाता है। विचारण में क, ख के विरुद्ध मिथ्या साक्ष्य इस आशय से देता है कि तद्द्वारा ख मृत्युदंड से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध हो जाए। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 211 और धारा 194 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(छ) क, छह अन्य व्यक्तियों के साथ, बल्वा करने के, घोर उपहति कारित करने के और ऐसे लोक सेवक पर हमला करने के अपराध करता है जो बल्वे को दबाने के अपने कर्तव्य के निर्वहन में प्रयत्नशील है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 147, धारा 325 और धारा 152 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ज) क, ख, ग और घ को एक ही समय पर उनके शरीर को क्षति पहुंचाने की धमकी इस आशय से देता है कि उन्हें संत्रास कारित हो। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 506 के अधीन तीनों अपराधों में से प्रत्येक के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
दृष्टांत (क) से (ज) तक में क्रमशः निर्दिष्ट पृथक् आरोपों का विचारण एक ही समय पर किया जा सकेगा।
उपधारा (3) के दृष्टांत
(झ) क, ख को छड़ी से सदोष प्रहार करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 352 और धारा 323 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ञ) चुराए हुए अनाज के कई बोरे क और ख को, जो यह जानते हैं कि वे चुराई हुई संपत्ति हैं, उन्हें छिपाने के प्रयोजन के लिए दे दिए जाते हैं। क और ख तब स्वेच्छया एक-दूसरे की उन बोरों को अनाज के गड्ढे की तली में छिपाने में सहायता करते हैं। क और ख पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 411 और धारा 414 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वे दोषसिद्ध किए जा सकेंगे।
(ट) क अपने शिशु को यह जानते हुए परित्यक्त कर देती है कि तद्द्वारा उसकी मृत्यु कारित होना संभाव्य है। ऐसे परित्याग के परिणामस्वरूप शिशु की मृत्यु हो जाती है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 317 और धारा 304 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध की जा सकेगी।
(ठ) क, ख को, जो एक लोक सेवक है, भारतीय दंड संहिता की धारा 167 के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के लिए, कूटरचित दस्तावेज को असली साक्ष्य के रूप में बेईमानी से उपयोग में लाता है। क पर उसी संहिता (1860 का 45) की धारा 471 (धारा 466 के साथ पठित) और धारा 196 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
उपधारा (4) का दृष्टांत
(ड) क, ख की लूट करता है और ऐसा करने में उसे स्वेच्छया उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 323, धारा 392 और धारा 394 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
पूरा पढ़ें: CrPC §220(1) यदि आपस में इस प्रकार संसक्त कार्यों की, कि वे एक ही संव्यवहार बनते हैं, एक ही शृंखला में एक ही व्यक्ति द्वारा एक से अधिक अपराध किए जाते हैं, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(2) जब किसी व्यक्ति पर, जिस पर धारा 212 की उपधारा (2) में या धारा 219 की उपधारा (1) में यथा-उपबंधित आपराधिक न्यासभंग या संपत्ति के बेईमानी से दुर्विनियोग के एक या अधिक अपराधों का आरोप है, यह अभियोग है कि उसने उस अपराध या उन अपराधों के किए जाने को सुकर बनाने या छिपाने के प्रयोजन के लिए लेखाओं के मिथ्याकरण के एक या अधिक अपराध किए हैं, तब उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(3) यदि अभिकथित कार्य तत्समय प्रवृत्त किसी ऐसी विधि की, जिसके द्वारा अपराध परिभाषित या दंडित किए जाते हैं, दो या अधिक पृथक् परिभाषाओं के अंतर्गत आने वाला अपराध बनते हैं, तो उनके लिए अभियुक्त व्यक्ति पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(4) यदि कई कार्य, जिनमें से एक या एक से अधिक स्वयं अपने आप में अपराध बनते हैं, संयुक्त होने पर कोई भिन्न अपराध बनते हैं, तो उनके लिए अभियुक्त व्यक्ति पर उस अपराध के लिए, जो ऐसे कार्यों के संयुक्त होने पर बनता है, और उस अपराध के लिए, जो ऐसे कार्यों में से किसी एक या अधिक से बनता है, आरोप लगाया जा सकेगा और उनका विचारण एक ही विचारण में किया जा सकेगा।
(5) इस धारा की कोई बात भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 71 पर प्रभाव न डालेगी।
उपधारा (1) के दृष्टांत
(क) क, ख को, जो विधिपूर्ण अभिरक्षा में है, छुड़ा लेता है और ऐसा करने में ग को, जो एक कांस्टेबल है और जिसकी अभिरक्षा में ख था, घोर उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 225 और धारा 333 के अधीन अपराधों का आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ख) क जारकर्म करने के आशय से दिन में गृहभेदन करता है और इस प्रकार प्रविष्ट गृह में ख की पत्नी के साथ जारकर्म करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 454 और धारा 497 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ग) क, ख के साथ, जो ग की पत्नी है, जारकर्म करने के आशय से उसे ग के पास से फुसलाकर ले जाता है और तब उसके साथ जारकर्म करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 498 और धारा 497 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(घ) क के कब्जे में कई मुद्राएं हैं और वह यह जानता है कि वे कूटकृत हैं और भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 466 के अधीन दंडनीय कई कूटरचनाएं करने के प्रयोजन के लिए उनका उपयोग करने का आशय रखता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 473 के अधीन प्रत्येक मुद्रा के कब्जे के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उसके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ङ) क, ख को क्षति कारित करने के आशय से, यह जानते हुए कि ऐसी कार्यवाही के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, उसके विरुद्ध दांडिक कार्यवाही संस्थित करता है, और यह जानते हुए भी कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, ख पर मिथ्या रूप से अपराध करने का अभियोग लगाता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 211 के अधीन दो अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(च) क, ख को क्षति कारित करने के आशय से, यह जानते हुए कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या विधिपूर्ण आधार नहीं है, उस पर मिथ्या रूप से अपराध करने का अभियोग लगाता है। विचारण में क, ख के विरुद्ध मिथ्या साक्ष्य इस आशय से देता है कि तद्द्वारा ख मृत्युदंड से दंडनीय अपराध के लिए दोषसिद्ध हो जाए। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 211 और धारा 194 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(छ) क, छह अन्य व्यक्तियों के साथ, बल्वा करने के, घोर उपहति कारित करने के और ऐसे लोक सेवक पर हमला करने के अपराध करता है जो बल्वे को दबाने के अपने कर्तव्य के निर्वहन में प्रयत्नशील है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 147, धारा 325 और धारा 152 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ज) क, ख, ग और घ को एक ही समय पर उनके शरीर को क्षति पहुंचाने की धमकी इस आशय से देता है कि उन्हें संत्रास कारित हो। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 506 के अधीन तीनों अपराधों में से प्रत्येक के लिए पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
दृष्टांत (क) से (ज) तक में क्रमशः निर्दिष्ट पृथक् आरोपों का विचारण एक ही समय पर किया जा सकेगा।
उपधारा (3) के दृष्टांत
(झ) क, ख को छड़ी से सदोष प्रहार करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 352 और धारा 323 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
(ञ) चुराए हुए अनाज के कई बोरे क और ख को, जो यह जानते हैं कि वे चुराई हुई संपत्ति हैं, उन्हें छिपाने के प्रयोजन के लिए दे दिए जाते हैं। क और ख तब स्वेच्छया एक-दूसरे की उन बोरों को अनाज के गड्ढे की तली में छिपाने में सहायता करते हैं। क और ख पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 411 और धारा 414 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वे दोषसिद्ध किए जा सकेंगे।
(ट) क अपने शिशु को यह जानते हुए परित्यक्त कर देती है कि तद्द्वारा उसकी मृत्यु कारित होना संभाव्य है। ऐसे परित्याग के परिणामस्वरूप शिशु की मृत्यु हो जाती है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 317 और धारा 304 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध की जा सकेगी।
(ठ) क, ख को, जो एक लोक सेवक है, भारतीय दंड संहिता की धारा 167 के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध कराने के लिए, कूटरचित दस्तावेज को असली साक्ष्य के रूप में बेईमानी से उपयोग में लाता है। क पर उसी संहिता (1860 का 45) की धारा 471 (धारा 466 के साथ पठित) और धारा 196 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
उपधारा (4) का दृष्टांत
(ड) क, ख की लूट करता है और ऐसा करने में उसे स्वेच्छया उपहति कारित करता है। क पर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 323, धारा 392 और धारा 394 के अधीन अपराधों का पृथक्तः आरोप लगाया जा सकेगा और उनके लिए वह दोषसिद्ध किया जा सकेगा।
नया कानून
BNSS §243
एक से अधिक अपराधों के लिए मुकदमा।
(1) यदि एक ही लेन-देन बनाने के लिए आपस में जुड़े कृत्यों की एक श्रृंखला में एक से अधिक अपराध एक ही व्यक्ति द्वारा किए जाते हैं, तो उस पर प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में मुकदमा चलाया जा सकता है।
(2) जब किसी व्यक्ति पर धारा 235 की उपधारा (2) या धारा 242 की उपधारा (1) में दिए गए प्रावधान के अनुसार आपराधिक विश्वासघात या संपत्ति के बेईमानी से गबन के एक या एक से अधिक अपराधों का आरोप लगाया जाता है, और उस अपराध या उन अपराधों को सुगम बनाने या छुपाने के उद्देश्य से खातों में जालसाजी के एक या एक से अधिक अपराध करने का आरोप लगाया जाता है, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में मुकदमा चलाया जा सकता है।
(3) यदि आरोपित कृत्य किसी ऐसे अपराध का गठन करते हैं जो उस समय लागू किसी कानून की दो या दो से अधिक अलग-अलग परिभाषाओं के अंतर्गत आता है जिसके द्वारा अपराधों को परिभाषित या दंडित किया जाता है, तो उन पर आरोपित व्यक्ति पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही मुकदमे में आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(4) यदि अनेक कृत्य, जिनमें से एक या एक से अधिक स्वयं एक अपराध गठित करते हैं, संयुक्त रूप से एक भिन्न अपराध गठित करते हैं, तो उन कृत्यों के आरोपी व्यक्ति पर संयुक्त रूप से गठित अपराध तथा ऐसे कृत्यों में से किसी एक या एक से अधिक द्वारा गठित किसी भी अपराध के लिए एक ही मुकदमे में आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(5) इस धारा में निहित कोई भी बात भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 9 को प्रभावित नहीं करेगी।
उपधारा (1) के उदाहरण
(क) यदि अ, वैधानिक हिरासत में रखे गए व्यक्ति ब को छुड़ाता है और ऐसा करने में ब की हिरासत में रहे कांस्टेबल सी को गंभीर चोट पहुँचाता है, तो अ पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 121 की उपधारा (2) और धारा 263 के तहत अपराधों का आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(ख) ए दिनदहाड़े बलात्कार के इरादे से घर में सेंध लगाता है और उस घर में प्रवेश करके बी की पत्नी के साथ बलात्कार करता है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 और धारा 331 की उपधारा (3) के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(ग) ए के पास अनेक मुहरें हैं, जिन्हें वह जानता है कि वे जाली हैं और जिनका उपयोग वह भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 337 के तहत दंडनीय अनेक जालसाजी करने के उद्देश्य से करना चाहता है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 341 की उपधारा (2) के तहत प्रत्येक मुहर के कब्जे के लिए अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(घ) बी को चोट पहुँचाने के इरादे से, ए उसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू करता है, यह जानते हुए कि ऐसी कार्यवाही के लिए कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है, और बी पर झूठा आरोप भी लगाता है, यह जानते हुए कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 248 के तहत दो अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(ई) ए, बी को हानि पहुँचाने के इरादे से, उस पर झूठा आरोप लगाता है कि उसने कोई अपराध किया है, जबकि वह जानता है कि ऐसे आरोप का कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है। मुकदमे की सुनवाई में, ए बी के विरुद्ध झूठी गवाही देता है, जिससे बी को मृत्युदंड योग्य अपराध का दोषी ठहराया जा सके। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 230 और 248 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(f) ए, छह अन्य लोगों के साथ मिलकर, दंगा करने, गंभीर चोट पहुंचाने और अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए दंगे को दबाने का प्रयास कर रहे लोक सेवक पर हमला करने का अपराध करता है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 117 की उपधारा (2), धारा 191 की उपधारा (2) और धारा 195 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(g) A, B, C और D को एक ही समय में उनकी जान को चोट पहुँचाने की धमकी देता है, ताकि उन्हें भयभीत किया जा सके। A पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 351 की उपधारा (2) और (3) के तहत तीनों अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
दृष्टांत (क) से (जी) में उल्लिखित अलग-अलग आरोपों की सुनवाई एक ही समय में की जा सकती है।
उपधारा (3) के उदाहरण
(h) A गलत तरीके से B को बेंत से मारता है। A पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 131 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(i) चोरी किए गए अनाज के कई बोरे ए और बी को सौंप दिए जाते हैं, जो जानते हैं कि वे चोरी की संपत्ति हैं, ताकि उन्हें छिपाया जा सके। इसके बाद ए और बी स्वेच्छा से एक दूसरे की सहायता से बोरों को अनाज के गड्ढे के तल में छिपा देते हैं। ए और बी पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (2) और (5) के तहत अलग-अलग आरोप लगाए जा सकते हैं और उन्हें दोषी ठहराया जा सकता है।
(j) यदि कोई महिला अपने बच्चे को इस जानकारी के साथ छोड़ती है कि ऐसा करने से उसकी मृत्यु हो सकती है, तो बच्चे की मृत्यु हो जाती है। ऐसी स्थिति में, महिला पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 93 और 105 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(k) यदि कोई व्यक्ति बेईमानी से किसी जाली दस्तावेज़ को वास्तविक साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करके लोक सेवक बी को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 201 के तहत किसी अपराध के लिए दोषी ठहराता है, तो ए पर उस संहिता की धारा 233 और धारा 340 (धारा 337 के साथ पढ़ी जाने वाली) की उपधारा (2) के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
उपधारा (4) का दृष्टांत
(l) A, B पर डकैती करता है और ऐसा करते समय स्वेच्छा से उसे चोट पहुँचाता है। A पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 309 की उपधारा (2) और (4) के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
पूरा पढ़ें: BNSS §243(2) जब किसी व्यक्ति पर धारा 235 की उपधारा (2) या धारा 242 की उपधारा (1) में दिए गए प्रावधान के अनुसार आपराधिक विश्वासघात या संपत्ति के बेईमानी से गबन के एक या एक से अधिक अपराधों का आरोप लगाया जाता है, और उस अपराध या उन अपराधों को सुगम बनाने या छुपाने के उद्देश्य से खातों में जालसाजी के एक या एक से अधिक अपराध करने का आरोप लगाया जाता है, तो उस पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए आरोप लगाया जा सकता है और एक ही मुकदमे में मुकदमा चलाया जा सकता है।
(3) यदि आरोपित कृत्य किसी ऐसे अपराध का गठन करते हैं जो उस समय लागू किसी कानून की दो या दो से अधिक अलग-अलग परिभाषाओं के अंतर्गत आता है जिसके द्वारा अपराधों को परिभाषित या दंडित किया जाता है, तो उन पर आरोपित व्यक्ति पर ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए एक ही मुकदमे में आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(4) यदि अनेक कृत्य, जिनमें से एक या एक से अधिक स्वयं एक अपराध गठित करते हैं, संयुक्त रूप से एक भिन्न अपराध गठित करते हैं, तो उन कृत्यों के आरोपी व्यक्ति पर संयुक्त रूप से गठित अपराध तथा ऐसे कृत्यों में से किसी एक या एक से अधिक द्वारा गठित किसी भी अपराध के लिए एक ही मुकदमे में आरोप लगाया जा सकता है और मुकदमा चलाया जा सकता है।
(5) इस धारा में निहित कोई भी बात भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 9 को प्रभावित नहीं करेगी।
उपधारा (1) के उदाहरण
(क) यदि अ, वैधानिक हिरासत में रखे गए व्यक्ति ब को छुड़ाता है और ऐसा करने में ब की हिरासत में रहे कांस्टेबल सी को गंभीर चोट पहुँचाता है, तो अ पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 121 की उपधारा (2) और धारा 263 के तहत अपराधों का आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(ख) ए दिनदहाड़े बलात्कार के इरादे से घर में सेंध लगाता है और उस घर में प्रवेश करके बी की पत्नी के साथ बलात्कार करता है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64 और धारा 331 की उपधारा (3) के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(ग) ए के पास अनेक मुहरें हैं, जिन्हें वह जानता है कि वे जाली हैं और जिनका उपयोग वह भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 337 के तहत दंडनीय अनेक जालसाजी करने के उद्देश्य से करना चाहता है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 341 की उपधारा (2) के तहत प्रत्येक मुहर के कब्जे के लिए अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(घ) बी को चोट पहुँचाने के इरादे से, ए उसके विरुद्ध आपराधिक कार्यवाही शुरू करता है, यह जानते हुए कि ऐसी कार्यवाही के लिए कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है, और बी पर झूठा आरोप भी लगाता है, यह जानते हुए कि ऐसे आरोप के लिए कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 248 के तहत दो अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(ई) ए, बी को हानि पहुँचाने के इरादे से, उस पर झूठा आरोप लगाता है कि उसने कोई अपराध किया है, जबकि वह जानता है कि ऐसे आरोप का कोई न्यायसंगत या वैध आधार नहीं है। मुकदमे की सुनवाई में, ए बी के विरुद्ध झूठी गवाही देता है, जिससे बी को मृत्युदंड योग्य अपराध का दोषी ठहराया जा सके। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 230 और 248 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(f) ए, छह अन्य लोगों के साथ मिलकर, दंगा करने, गंभीर चोट पहुंचाने और अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हुए दंगे को दबाने का प्रयास कर रहे लोक सेवक पर हमला करने का अपराध करता है। ए पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 117 की उपधारा (2), धारा 191 की उपधारा (2) और धारा 195 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(g) A, B, C और D को एक ही समय में उनकी जान को चोट पहुँचाने की धमकी देता है, ताकि उन्हें भयभीत किया जा सके। A पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 351 की उपधारा (2) और (3) के तहत तीनों अपराधों के लिए अलग-अलग आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
दृष्टांत (क) से (जी) में उल्लिखित अलग-अलग आरोपों की सुनवाई एक ही समय में की जा सकती है।
उपधारा (3) के उदाहरण
(h) A गलत तरीके से B को बेंत से मारता है। A पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 131 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(i) चोरी किए गए अनाज के कई बोरे ए और बी को सौंप दिए जाते हैं, जो जानते हैं कि वे चोरी की संपत्ति हैं, ताकि उन्हें छिपाया जा सके। इसके बाद ए और बी स्वेच्छा से एक दूसरे की सहायता से बोरों को अनाज के गड्ढे के तल में छिपा देते हैं। ए और बी पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 317 की उपधारा (2) और (5) के तहत अलग-अलग आरोप लगाए जा सकते हैं और उन्हें दोषी ठहराया जा सकता है।
(j) यदि कोई महिला अपने बच्चे को इस जानकारी के साथ छोड़ती है कि ऐसा करने से उसकी मृत्यु हो सकती है, तो बच्चे की मृत्यु हो जाती है। ऐसी स्थिति में, महिला पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 93 और 105 के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
(k) यदि कोई व्यक्ति बेईमानी से किसी जाली दस्तावेज़ को वास्तविक साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल करके लोक सेवक बी को भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 201 के तहत किसी अपराध के लिए दोषी ठहराता है, तो ए पर उस संहिता की धारा 233 और धारा 340 (धारा 337 के साथ पढ़ी जाने वाली) की उपधारा (2) के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
उपधारा (4) का दृष्टांत
(l) A, B पर डकैती करता है और ऐसा करते समय स्वेच्छा से उसे चोट पहुँचाता है। A पर भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 115 की उपधारा (2) और धारा 309 की उपधारा (2) और (4) के तहत अलग से आरोप लगाया जा सकता है और उसे दोषी ठहराया जा सकता है।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
