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CrPC धारा 197 अब BNSS धारा 218 है
धारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
पुराना कानून
CrPC §197
धारा 197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
197. न्यायाधीशों और लोक सेवकों का अभियोजन
(1) जब कोई व्यक्ति, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट है या रह चुका है, या ऐसा लोक सेवक है, जो सरकार द्वारा या सरकार की मंजूरी से ही अपने पद से हटाया जा सकता है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किया गया है, तब कोई न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान निम्नलिखित की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा—
(क) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो संघ के कार्यकलाप के संबंध में नियोजित है या, यथास्थिति, अभिकथित अपराध किए जाने के समय नियोजित था, केंद्रीय सरकार की;
(ख) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी राज्य के कार्यकलाप के संबंध में नियोजित है या, यथास्थिति, अभिकथित अपराध किए जाने के समय नियोजित था, राज्य सरकार की:
परन्तु जहां अभिकथित अपराध खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा उस अवधि के दौरान किया गया था, जब संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा किसी राज्य में प्रवृत्त थी, वहां खंड (ख) इस प्रकार लागू होगा मानो उसमें आने वाली अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" रख दी गई हो।
(2) कोई न्यायालय संघ के सशस्त्र बलों के किसी सदस्य द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किए गए किसी अभिकथित अपराध का संज्ञान केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा।
(3) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि उपधारा (2) के उपबंध लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक बलों के सदस्यों के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग को, जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए, चाहे वे कहीं भी सेवा कर रहे हों, लागू होंगे, और तब उस उपधारा के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो उसमें आने वाली अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" रख दी गई हो।
(3क) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय किसी राज्य में लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक बलों के किसी सदस्य द्वारा, उस अवधि के दौरान जब संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा वहां प्रवृत्त थी, अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किए गए किसी अभिकथित अपराध का संज्ञान केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा।
(3ख) इस संहिता या किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, यह एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि 20 अगस्त, 1991 को आरंभ होने वाली और उस तारीख से ठीक पहले की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान, जिस तारीख को दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1991 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, ऐसे अपराध के संबंध में, जिसके उस अवधि के दौरान किए जाने का अभिकथन है जब संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा उस राज्य में प्रवृत्त थी, राज्य सरकार द्वारा दी गई कोई मंजूरी या ऐसी मंजूरी पर किसी न्यायालय द्वारा लिया गया कोई संज्ञान अविधिमान्य होगा, और ऐसे मामले में मंजूरी देना केंद्रीय सरकार के लिए और उस पर संज्ञान करना न्यायालय के लिए सक्षम होगा।
(4) यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार यह अवधारित कर सकेगी कि ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक का अभियोजन किस व्यक्ति द्वारा, किस रीति से और किस अपराध या किन अपराधों के लिए चलाया जाएगा, और वह न्यायालय विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसके समक्ष विचारण किया जाना है।
राज्य संशोधन
असम:
धारा 197 की उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्:—
"(3) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि उपधारा (2) के उपबंध—
(क) लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक बलों के सदस्यों के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग को, या
(ख) लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक अन्य लोक सेवकों के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग को [जो ऐसे व्यक्ति न हों, जिन्हें उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंध लागू होते हैं],
जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, चाहे वे कहीं भी सेवा कर रहे हों, लागू होंगे, और तब उपधारा (2) के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो उसमें आने वाली अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" रख दी गई हो।"
महाराष्ट्र:
धारा 197 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
"197क. सिविल न्यायालय द्वारा नियुक्त कमिश्नर या रिसीवर का अभियोजन।—जब कोई व्यक्ति, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के उपबंधों के अधीन किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त कमिश्नर या रिसीवर है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा कमिश्नर या रिसीवर के रूप में अपने कृत्यों के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किया गया है, तब कोई न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान उस न्यायालय की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा, जिसने, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति को कमिश्नर या रिसीवर नियुक्त किया था।"
[महाराष्ट्र अधिनियम 1981 का 60, धारा 2 द्वारा (5-10-1981 से प्रभावी)]
पूरा पढ़ें: CrPC §197(1) जब कोई व्यक्ति, जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट है या रह चुका है, या ऐसा लोक सेवक है, जो सरकार द्वारा या सरकार की मंजूरी से ही अपने पद से हटाया जा सकता है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किया गया है, तब कोई न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान निम्नलिखित की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा—
(क) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो संघ के कार्यकलाप के संबंध में नियोजित है या, यथास्थिति, अभिकथित अपराध किए जाने के समय नियोजित था, केंद्रीय सरकार की;
(ख) ऐसे व्यक्ति की दशा में, जो किसी राज्य के कार्यकलाप के संबंध में नियोजित है या, यथास्थिति, अभिकथित अपराध किए जाने के समय नियोजित था, राज्य सरकार की:
परन्तु जहां अभिकथित अपराध खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा उस अवधि के दौरान किया गया था, जब संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा किसी राज्य में प्रवृत्त थी, वहां खंड (ख) इस प्रकार लागू होगा मानो उसमें आने वाली अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" रख दी गई हो।
(2) कोई न्यायालय संघ के सशस्त्र बलों के किसी सदस्य द्वारा अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किए गए किसी अभिकथित अपराध का संज्ञान केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा।
(3) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि उपधारा (2) के उपबंध लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक बलों के सदस्यों के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग को, जो उसमें विनिर्दिष्ट किया जाए, चाहे वे कहीं भी सेवा कर रहे हों, लागू होंगे, और तब उस उपधारा के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो उसमें आने वाली अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" रख दी गई हो।
(3क) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय किसी राज्य में लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक बलों के किसी सदस्य द्वारा, उस अवधि के दौरान जब संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा वहां प्रवृत्त थी, अपने पदीय कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किए गए किसी अभिकथित अपराध का संज्ञान केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा।
(3ख) इस संहिता या किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, यह एतद्द्वारा घोषित किया जाता है कि 20 अगस्त, 1991 को आरंभ होने वाली और उस तारीख से ठीक पहले की तारीख को समाप्त होने वाली अवधि के दौरान, जिस तारीख को दंड प्रक्रिया संहिता (संशोधन) अधिनियम, 1991 को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है, ऐसे अपराध के संबंध में, जिसके उस अवधि के दौरान किए जाने का अभिकथन है जब संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के अधीन जारी की गई उद्घोषणा उस राज्य में प्रवृत्त थी, राज्य सरकार द्वारा दी गई कोई मंजूरी या ऐसी मंजूरी पर किसी न्यायालय द्वारा लिया गया कोई संज्ञान अविधिमान्य होगा, और ऐसे मामले में मंजूरी देना केंद्रीय सरकार के लिए और उस पर संज्ञान करना न्यायालय के लिए सक्षम होगा।
(4) यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार यह अवधारित कर सकेगी कि ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक का अभियोजन किस व्यक्ति द्वारा, किस रीति से और किस अपराध या किन अपराधों के लिए चलाया जाएगा, और वह न्यायालय विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिसके समक्ष विचारण किया जाना है।
राज्य संशोधन
असम:
धारा 197 की उपधारा (3) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्:—
"(3) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि उपधारा (2) के उपबंध—
(क) लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक बलों के सदस्यों के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग को, या
(ख) लोक व्यवस्था बनाए रखने के भारसाधक अन्य लोक सेवकों के ऐसे वर्ग या प्रवर्ग को [जो ऐसे व्यक्ति न हों, जिन्हें उपधारा (1) या उपधारा (2) के उपबंध लागू होते हैं],
जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, चाहे वे कहीं भी सेवा कर रहे हों, लागू होंगे, और तब उपधारा (2) के उपबंध इस प्रकार लागू होंगे मानो उसमें आने वाली अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" रख दी गई हो।"
महाराष्ट्र:
धारा 197 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात्:—
"197क. सिविल न्यायालय द्वारा नियुक्त कमिश्नर या रिसीवर का अभियोजन।—जब कोई व्यक्ति, जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के उपबंधों के अधीन किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त कमिश्नर या रिसीवर है, किसी ऐसे अपराध का अभियुक्त है, जिसके बारे में यह अभिकथन है कि वह उसके द्वारा कमिश्नर या रिसीवर के रूप में अपने कृत्यों के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का तात्पर्य रखते हुए किया गया है, तब कोई न्यायालय ऐसे अपराध का संज्ञान उस न्यायालय की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा, जिसने, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति को कमिश्नर या रिसीवर नियुक्त किया था।"
[महाराष्ट्र अधिनियम 1981 का 60, धारा 2 द्वारा (5-10-1981 से प्रभावी)]
नया कानून
BNSS §218
न्यायाधीशों और लोक सेवकों पर मुकदमा चलाना।
(1) जब कोई व्यक्ति जो न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट या लोक सेवक है या रहा है, जिसे सरकार की स्वीकृति के बिना उसके पद से हटाया नहीं जा सकता, पर किसी ऐसे अपराध का आरोप लगाया जाता है जो उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए किया हो, तो कोई भी न्यायालय लोकपाल और लोकायुक्त अधिनियम, 2013 (1 ऑफ 2014) में अन्यथा प्रावधान किए जाने के अलावा, पूर्व स्वीकृति के बिना ऐसे अपराध का संज्ञान नहीं लेगा।
(क) ऐसे व्यक्ति के मामले में जो संघ के मामलों के संबंध में केंद्रीय सरकार में कार्यरत है या, जैसा भी मामला हो, कथित अपराध के घटित होने के समय कार्यरत था;
(ख) ऐसे व्यक्ति के मामले में जो किसी राज्य के मामलों के संबंध में राज्य सरकार के अधीन कार्यरत है या, जैसा भी मामला हो, कथित अपराध के घटित होने के समय राज्य सरकार के अधीन कार्यरत था:
बशर्ते कि यदि किसी राज्य में संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा लागू रहने की अवधि के दौरान खंड (ख) में निर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा कथित अपराध किया गया हो, तो खंड (ख) इस प्रकार लागू होगा मानो उसमें प्रयुक्त अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" प्रतिस्थापित की गई हो।
इसके अलावा, यह भी प्रावधान है कि ऐसी सरकार स्वीकृति के अनुरोध की प्राप्ति तिथि से एक सौ बीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय लेगी और यदि वह ऐसा करने में विफल रहती है, तो स्वीकृति ऐसी सरकार द्वारा प्रदान की गई मानी जाएगी।
इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, धारा 143, धारा 199 या धारा 200 के तहत कथित रूप से किए गए किसी भी अपराध के आरोपी लोक सेवक के मामले में किसी भी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
(2) कोई भी न्यायालय संघ के सशस्त्र बलों के किसी सदस्य द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने का दावा करते समय कथित रूप से किए गए किसी अपराध का संज्ञान केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं लेगा।
(3) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकती है कि उपधारा (2) के प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार बलों के ऐसे वर्ग या श्रेणी के सदस्यों पर लागू होंगे, जैसा कि उसमें निर्दिष्ट किया गया हो, चाहे वे कहीं भी सेवारत हों, और इसके बाद उस उपधारा के प्रावधान इस प्रकार लागू होंगे मानो उसमें प्रयुक्त अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" प्रतिस्थापित कर दी गई हो।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय किसी राज्य में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त बलों के किसी सदस्य द्वारा, संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत जारी की गई उद्घोषणा के लागू रहने की अवधि के दौरान, अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए, किसी अपराध का संज्ञान केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं लेगा।
(5) केंद्र सरकार या राज्य सरकार, उस व्यक्ति को निर्धारित कर सकती है जिसके द्वारा, जिस तरीके से और जिस अपराध या अपराधों के लिए ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक पर मुकदमा चलाया जाना है, और उस न्यायालय को निर्दिष्ट कर सकती है जिसके समक्ष मुकदमा चलाया जाना है।
पूरा पढ़ें: BNSS §218(क) ऐसे व्यक्ति के मामले में जो संघ के मामलों के संबंध में केंद्रीय सरकार में कार्यरत है या, जैसा भी मामला हो, कथित अपराध के घटित होने के समय कार्यरत था;
(ख) ऐसे व्यक्ति के मामले में जो किसी राज्य के मामलों के संबंध में राज्य सरकार के अधीन कार्यरत है या, जैसा भी मामला हो, कथित अपराध के घटित होने के समय राज्य सरकार के अधीन कार्यरत था:
बशर्ते कि यदि किसी राज्य में संविधान के अनुच्छेद 356 के खंड (1) के तहत जारी की गई उद्घोषणा लागू रहने की अवधि के दौरान खंड (ख) में निर्दिष्ट व्यक्ति द्वारा कथित अपराध किया गया हो, तो खंड (ख) इस प्रकार लागू होगा मानो उसमें प्रयुक्त अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" प्रतिस्थापित की गई हो।
इसके अलावा, यह भी प्रावधान है कि ऐसी सरकार स्वीकृति के अनुरोध की प्राप्ति तिथि से एक सौ बीस दिनों की अवधि के भीतर निर्णय लेगी और यदि वह ऐसा करने में विफल रहती है, तो स्वीकृति ऐसी सरकार द्वारा प्रदान की गई मानी जाएगी।
इसके अलावा, भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, धारा 65, धारा 66, धारा 68, धारा 69, धारा 70, धारा 71, धारा 74, धारा 75, धारा 76, धारा 77, धारा 78, धारा 79, धारा 143, धारा 199 या धारा 200 के तहत कथित रूप से किए गए किसी भी अपराध के आरोपी लोक सेवक के मामले में किसी भी मंजूरी की आवश्यकता नहीं होगी।
(2) कोई भी न्यायालय संघ के सशस्त्र बलों के किसी सदस्य द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते समय या कार्य करने का दावा करते समय कथित रूप से किए गए किसी अपराध का संज्ञान केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं लेगा।
(3) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा यह निर्देश दे सकती है कि उपधारा (2) के प्रावधान सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए जिम्मेदार बलों के ऐसे वर्ग या श्रेणी के सदस्यों पर लागू होंगे, जैसा कि उसमें निर्दिष्ट किया गया हो, चाहे वे कहीं भी सेवारत हों, और इसके बाद उस उपधारा के प्रावधान इस प्रकार लागू होंगे मानो उसमें प्रयुक्त अभिव्यक्ति "केंद्रीय सरकार" के स्थान पर अभिव्यक्ति "राज्य सरकार" प्रतिस्थापित कर दी गई हो।
(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय किसी राज्य में सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियुक्त बलों के किसी सदस्य द्वारा, संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत जारी की गई उद्घोषणा के लागू रहने की अवधि के दौरान, अपने आधिकारिक कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का आशय रखते हुए, किसी अपराध का संज्ञान केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं लेगा।
(5) केंद्र सरकार या राज्य सरकार, उस व्यक्ति को निर्धारित कर सकती है जिसके द्वारा, जिस तरीके से और जिस अपराध या अपराधों के लिए ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या लोक सेवक पर मुकदमा चलाया जाना है, और उस न्यायालय को निर्दिष्ट कर सकती है जिसके समक्ष मुकदमा चलाया जाना है।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
