पाठ लगभग अपरिवर्तित है
CrPC धारा 195 अब BNSS धारा 215 है
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
पुराना कानून
CrPC §195
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में दिए गए दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा--
(क) (i) भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की धारा 172 से 188 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का, या
(ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में, या
(iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का,
सिवाय इसके कि संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य लोक सेवक, जिसके वह प्रशासनिक रूप से अधीन है, की लिखित शिकायत हो;
(ख) (i) भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की निम्नलिखित धाराओं में से किसी के तहत दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, अर्थात् धारा 193 से 196 (दोनों सहित), 199, 200, 205 से 211 (दोनों सहित) और 228, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया हो, या
(ii) उक्त संहिता की धारा 463 में वर्णित किसी अपराध या धारा 471, धारा 475 या धारा 476 के तहत दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में कार्यवाही में प्रस्तुत या साक्ष्य के रूप में दिए गए किसी दस्तावेज के संबंध में किया गया हो, या
(iii) उप-खंड (i) या उप-खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी अपराध को करने, करने का प्रयास करने, या ऐसे किसी अपराध के लिए उकसाने की आपराधिक साजिश का।
1 [उस न्यायालय की लिखित शिकायत पर या उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा, जिसे वह न्यायालय इस संबंध में लिखित रूप में अधिकृत करे, या किसी अन्य न्यायालय द्वारा, जिसके अधीन वह न्यायालय है, को छोड़कर।]
(2) जहां उपधारा (1) के खंड (क) के अंतर्गत किसी लोक सेवक द्वारा शिकायत की गई हो, वहां कोई प्राधिकारी जिसके अधीन वह प्रशासनिक रूप से है, शिकायत वापस लेने का आदेश दे सकता है और ऐसे आदेश की एक प्रति न्यायालय को भेज सकता है; और न्यायालय द्वारा इसकी प्राप्ति पर, शिकायत पर आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
बशर्ते कि यदि प्रथम न्यायालय में मुकदमा समाप्त हो चुका हो तो इस प्रकार की कोई वापसी का आदेश नहीं दिया जाएगा।
(3) उपधारा (1) के खंड (ख) में, "न्यायालय" शब्द का अर्थ सिविल, राजस्व या आपराधिक न्यायालय है, और इसमें केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन गठित न्यायाधिकरण शामिल है, यदि उस अधिनियम द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए न्यायालय घोषित किया गया हो।
(4) उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए, न्यायालय को उस न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा जिसमें ऐसे पूर्ववर्ती न्यायालय के अपीलीय निर्णयों या निर्णयों से सामान्यतः अपीलें होती हैं, या ऐसे सिविल न्यायालय के मामले में जिसके निर्णयों से सामान्यतः कोई अपील नहीं होती है, उस प्रधान न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार में ऐसा सिविल न्यायालय स्थित है।
उसे उपलब्ध कराया--
(क) जहां एक से अधिक न्यायालयों में अपील की जा सकती है, वहां निचली अदालती अधिकार क्षेत्र का अपीलीय न्यायालय वह न्यायालय होगा जिसके अधीन ऐसे न्यायालय को माना जाएगा;
(ख) जहां अपीलें सिविल न्यायालय और राजस्व न्यायालय दोनों में दायर की जाती हैं, वहां ऐसे न्यायालय को मामले या कार्यवाही की प्रकृति के अनुसार सिविल या राजस्व न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा, जिसके संबंध में अपराध किए जाने का आरोप है।
पूरा पढ़ें: CrPC §195(क) (i) भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की धारा 172 से 188 (दोनों सहित) के तहत दंडनीय किसी अपराध का, या
(ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में, या
(iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का,
सिवाय इसके कि संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य लोक सेवक, जिसके वह प्रशासनिक रूप से अधीन है, की लिखित शिकायत हो;
(ख) (i) भारतीय दंड संहिता (45 ऑफ 1860) की निम्नलिखित धाराओं में से किसी के तहत दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, अर्थात् धारा 193 से 196 (दोनों सहित), 199, 200, 205 से 211 (दोनों सहित) और 228, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया हो, या
(ii) उक्त संहिता की धारा 463 में वर्णित किसी अपराध या धारा 471, धारा 475 या धारा 476 के तहत दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में कार्यवाही में प्रस्तुत या साक्ष्य के रूप में दिए गए किसी दस्तावेज के संबंध में किया गया हो, या
(iii) उप-खंड (i) या उप-खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी अपराध को करने, करने का प्रयास करने, या ऐसे किसी अपराध के लिए उकसाने की आपराधिक साजिश का।
1 [उस न्यायालय की लिखित शिकायत पर या उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा, जिसे वह न्यायालय इस संबंध में लिखित रूप में अधिकृत करे, या किसी अन्य न्यायालय द्वारा, जिसके अधीन वह न्यायालय है, को छोड़कर।]
(2) जहां उपधारा (1) के खंड (क) के अंतर्गत किसी लोक सेवक द्वारा शिकायत की गई हो, वहां कोई प्राधिकारी जिसके अधीन वह प्रशासनिक रूप से है, शिकायत वापस लेने का आदेश दे सकता है और ऐसे आदेश की एक प्रति न्यायालय को भेज सकता है; और न्यायालय द्वारा इसकी प्राप्ति पर, शिकायत पर आगे कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी।
बशर्ते कि यदि प्रथम न्यायालय में मुकदमा समाप्त हो चुका हो तो इस प्रकार की कोई वापसी का आदेश नहीं दिया जाएगा।
(3) उपधारा (1) के खंड (ख) में, "न्यायालय" शब्द का अर्थ सिविल, राजस्व या आपराधिक न्यायालय है, और इसमें केंद्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम द्वारा या उसके अधीन गठित न्यायाधिकरण शामिल है, यदि उस अधिनियम द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए न्यायालय घोषित किया गया हो।
(4) उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए, न्यायालय को उस न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा जिसमें ऐसे पूर्ववर्ती न्यायालय के अपीलीय निर्णयों या निर्णयों से सामान्यतः अपीलें होती हैं, या ऐसे सिविल न्यायालय के मामले में जिसके निर्णयों से सामान्यतः कोई अपील नहीं होती है, उस प्रधान न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा जिसके स्थानीय क्षेत्राधिकार में ऐसा सिविल न्यायालय स्थित है।
उसे उपलब्ध कराया--
(क) जहां एक से अधिक न्यायालयों में अपील की जा सकती है, वहां निचली अदालती अधिकार क्षेत्र का अपीलीय न्यायालय वह न्यायालय होगा जिसके अधीन ऐसे न्यायालय को माना जाएगा;
(ख) जहां अपीलें सिविल न्यायालय और राजस्व न्यायालय दोनों में दायर की जाती हैं, वहां ऐसे न्यायालय को मामले या कार्यवाही की प्रकृति के अनुसार सिविल या राजस्व न्यायालय के अधीनस्थ माना जाएगा, जिसके संबंध में अपराध किए जाने का आरोप है।
नया कानून
BNSS §215
लोक सेवकों के वैधानिक अधिकार की अवमानना, सार्वजनिक न्याय के विरुद्ध अपराध और साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत दस्तावेजों से संबंधित अपराधों के लिए अभियोजन।
(1) कोई न्यायालय संज्ञान नहीं लेगा—
(क) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से 223 (दोनों सहित, लेकिन धारा 209 को छोड़कर) के तहत दंडनीय किसी अपराध का; या
(ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में; या
(iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का,
सिवाय इसके कि संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य लोक सेवक, जिसके वह प्रशासनिक रूप से अधीनस्थ है, या किसी अन्य लोक सेवक, जिसे संबंधित लोक सेवक द्वारा ऐसा करने के लिए अधिकृत किया गया है, की लिखित शिकायत हो;
(ख) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की निम्नलिखित धाराओं में से किसी के तहत दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, अर्थात् धारा 229 से 233 (दोनों सहित), 236, 237, 242 से 248 (दोनों सहित) और 267, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया हो; या
(ii) धारा 336 की उपधारा (1) में वर्णित किसी अपराध के लिए, या उक्त संहिता की धारा 340 की उपधारा (2) या धारा 342 के तहत दंडनीय किसी अपराध के लिए, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में कार्यवाही में प्रस्तुत या साक्ष्य के रूप में दिए गए किसी दस्तावेज के संबंध में किया गया हो; या
(iii) उप-खंड (i) या उप-खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी अपराध को करने, करने का प्रयास करने, या ऐसे किसी अपराध के लिए उकसाने की आपराधिक साजिश का।
सिवाय उस न्यायालय की लिखित शिकायत पर, या उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा जिसे वह न्यायालय इस संबंध में लिखित रूप में अधिकृत करे, या किसी अन्य न्यायालय द्वारा जिसके अधीन वह न्यायालय है।
पूरा पढ़ें: BNSS §215(क) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 206 से 223 (दोनों सहित, लेकिन धारा 209 को छोड़कर) के तहत दंडनीय किसी अपराध का; या
(ii) ऐसे अपराध के लिए उकसाने या उसे करने का प्रयास करने के संबंध में; या
(iii) ऐसे अपराध को अंजाम देने के लिए किसी आपराधिक षड्यंत्र का,
सिवाय इसके कि संबंधित लोक सेवक या किसी अन्य लोक सेवक, जिसके वह प्रशासनिक रूप से अधीनस्थ है, या किसी अन्य लोक सेवक, जिसे संबंधित लोक सेवक द्वारा ऐसा करने के लिए अधिकृत किया गया है, की लिखित शिकायत हो;
(ख) (i) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की निम्नलिखित धाराओं में से किसी के तहत दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, अर्थात् धारा 229 से 233 (दोनों सहित), 236, 237, 242 से 248 (दोनों सहित) और 267, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में किसी कार्यवाही में या उसके संबंध में किया गया हो; या
(ii) धारा 336 की उपधारा (1) में वर्णित किसी अपराध के लिए, या उक्त संहिता की धारा 340 की उपधारा (2) या धारा 342 के तहत दंडनीय किसी अपराध के लिए, जब ऐसा अपराध किसी न्यायालय में कार्यवाही में प्रस्तुत या साक्ष्य के रूप में दिए गए किसी दस्तावेज के संबंध में किया गया हो; या
(iii) उप-खंड (i) या उप-खंड (ii) में निर्दिष्ट किसी अपराध को करने, करने का प्रयास करने, या ऐसे किसी अपराध के लिए उकसाने की आपराधिक साजिश का।
सिवाय उस न्यायालय की लिखित शिकायत पर, या उस न्यायालय के ऐसे अधिकारी द्वारा जिसे वह न्यायालय इस संबंध में लिखित रूप में अधिकृत करे, या किसी अन्य न्यायालय द्वारा जिसके अधीन वह न्यायालय है।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
