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CrPC धारा 173 अब BNSS धारा 193 है
धारा 173. अन्वेषण पूरा होने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट
पुराना कानून
CrPC §173
धारा 173. अन्वेषण पूरा होने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट
173. अन्वेषण पूरा होने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट
(1) इस अध्याय के अधीन हर अन्वेषण अनावश्यक विलंब के बिना पूरा किया जाएगा।
(1क) किसी बालक के बलात्संग से संबंधित अन्वेषण उस तारीख से तीन मास के भीतर पूरा किया जा सकेगा जिसको पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा इत्तिला अभिलिखित की गई थी।
(2) (i) ज्यों ही अन्वेषण पूरा हो जाए, पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी ऐसे मजिस्ट्रेट को, जो पुलिस रिपोर्ट पर अपराध का संज्ञान करने के लिए सशक्त है, राज्य सरकार द्वारा विहित प्ररूप में एक रिपोर्ट भेजेगा, जिसमें यह कथित होगा—
(क) पक्षकारों के नाम;
(ख) इत्तिला की प्रकृति;
(ग) उन व्यक्तियों के नाम जो मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होते हैं;
(घ) क्या कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है और यदि हां, तो किसके द्वारा;
(ङ) क्या अभियुक्त गिरफ्तार कर लिया गया है;
(च) क्या वह अपने बंधपत्र पर छोड़ा गया है और यदि हां, तो प्रतिभुओं सहित या उनके बिना;
(छ) क्या वह धारा 170 के अधीन अभिरक्षा में भेजा गया है;
(ज) जहां अन्वेषण भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग या धारा 376घ के अधीन किसी अपराध से संबंधित है, वहां क्या स्त्री की चिकित्सीय परीक्षा की रिपोर्ट संलग्न की गई है।
(ii) वह अधिकारी उस व्यक्ति को, यदि कोई हो, जिसे अपराध किए जाने से संबंधित इत्तिला सर्वप्रथम दी गई थी, अपने द्वारा की गई कार्रवाई ऐसी रीति से संसूचित भी करेगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए।
(3) जहां धारा 158 के अधीन कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नियुक्त किया गया है, वहां रिपोर्ट, ऐसे किसी मामले में जिसमें राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश दे, उस अधिकारी के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी, और वह मजिस्ट्रेट के आदेशों के लंबित रहने तक पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को और अन्वेषण करने का निदेश दे सकेगा।
(4) जब कभी इस धारा के अधीन भेजी गई रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त अपने बंधपत्र पर छोड़ा गया है, तब मजिस्ट्रेट ऐसे बंधपत्र के उन्मोचन के लिए या अन्यथा ऐसा आदेश करेगा, जैसा वह ठीक समझे।
(5) जब ऐसी रिपोर्ट ऐसे मामले के बारे में है जिसको धारा 170 लागू होती है, तब पुलिस अधिकारी रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को यह भेजेगा—
(क) उन सब दस्तावेजों को या उनके सुसंगत उद्धरणों को, जिन पर अभियोजन निर्भर रहना चाहता है, उनसे भिन्न जो अन्वेषण के दौरान मजिस्ट्रेट को पहले ही भेजे जा चुके हैं;
(ख) उन सब व्यक्तियों के धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथनों को, जिनकी अभियोजन अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा कराना चाहता है।
(6) यदि पुलिस अधिकारी की यह राय है कि ऐसे किसी कथन का कोई भाग कार्यवाही की विषय-वस्तु से सुसंगत नहीं है, या अभियुक्त को उसका प्रकटीकरण न्याय के हित में आवश्यक नहीं है और लोकहित में अवांछनीय है, तो वह कथन के उस भाग को उपदर्शित करेगा और मजिस्ट्रेट से यह अनुरोध करते हुए एक टिप्पण संलग्न करेगा कि अभियुक्त को दी जाने वाली प्रतियों में से वह भाग अपवर्जित कर दिया जाए तथा ऐसा अनुरोध करने के अपने कारण कथित करेगा।
(7) जहां मामले का अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी ऐसा करना सुविधाजनक पाता है, वहां वह अभियुक्त को उपधारा (5) में निर्दिष्ट सब दस्तावेजों की या उनमें से किसी की प्रतियां दे सकेगा।
(8) इस धारा की कोई बात उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेजे जाने के पश्चात् किसी अपराध के बारे में और अन्वेषण का वर्जन करने वाली न समझी जाएगी, और जहां ऐसे अन्वेषण पर पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक या दस्तावेजी अतिरिक्त साक्ष्य प्राप्त होता है, वहां वह ऐसे साक्ष्य के बारे में विहित प्ररूप में एक या अधिक अतिरिक्त रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेजेगा; और उपधारा (2) से उपधारा (6) तक के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी रिपोर्ट या रिपोर्टों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे, जैसे वे उपधारा (2) के अधीन भेजी गई रिपोर्ट के संबंध में लागू होते हैं।
पूरा पढ़ें: CrPC §173(1) इस अध्याय के अधीन हर अन्वेषण अनावश्यक विलंब के बिना पूरा किया जाएगा।
(1क) किसी बालक के बलात्संग से संबंधित अन्वेषण उस तारीख से तीन मास के भीतर पूरा किया जा सकेगा जिसको पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा इत्तिला अभिलिखित की गई थी।
(2) (i) ज्यों ही अन्वेषण पूरा हो जाए, पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी ऐसे मजिस्ट्रेट को, जो पुलिस रिपोर्ट पर अपराध का संज्ञान करने के लिए सशक्त है, राज्य सरकार द्वारा विहित प्ररूप में एक रिपोर्ट भेजेगा, जिसमें यह कथित होगा—
(क) पक्षकारों के नाम;
(ख) इत्तिला की प्रकृति;
(ग) उन व्यक्तियों के नाम जो मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होते हैं;
(घ) क्या कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है और यदि हां, तो किसके द्वारा;
(ङ) क्या अभियुक्त गिरफ्तार कर लिया गया है;
(च) क्या वह अपने बंधपत्र पर छोड़ा गया है और यदि हां, तो प्रतिभुओं सहित या उनके बिना;
(छ) क्या वह धारा 170 के अधीन अभिरक्षा में भेजा गया है;
(ज) जहां अन्वेषण भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 376, धारा 376क, धारा 376ख, धारा 376ग या धारा 376घ के अधीन किसी अपराध से संबंधित है, वहां क्या स्त्री की चिकित्सीय परीक्षा की रिपोर्ट संलग्न की गई है।
(ii) वह अधिकारी उस व्यक्ति को, यदि कोई हो, जिसे अपराध किए जाने से संबंधित इत्तिला सर्वप्रथम दी गई थी, अपने द्वारा की गई कार्रवाई ऐसी रीति से संसूचित भी करेगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए।
(3) जहां धारा 158 के अधीन कोई वरिष्ठ पुलिस अधिकारी नियुक्त किया गया है, वहां रिपोर्ट, ऐसे किसी मामले में जिसमें राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश दे, उस अधिकारी के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी, और वह मजिस्ट्रेट के आदेशों के लंबित रहने तक पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को और अन्वेषण करने का निदेश दे सकेगा।
(4) जब कभी इस धारा के अधीन भेजी गई रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त अपने बंधपत्र पर छोड़ा गया है, तब मजिस्ट्रेट ऐसे बंधपत्र के उन्मोचन के लिए या अन्यथा ऐसा आदेश करेगा, जैसा वह ठीक समझे।
(5) जब ऐसी रिपोर्ट ऐसे मामले के बारे में है जिसको धारा 170 लागू होती है, तब पुलिस अधिकारी रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को यह भेजेगा—
(क) उन सब दस्तावेजों को या उनके सुसंगत उद्धरणों को, जिन पर अभियोजन निर्भर रहना चाहता है, उनसे भिन्न जो अन्वेषण के दौरान मजिस्ट्रेट को पहले ही भेजे जा चुके हैं;
(ख) उन सब व्यक्तियों के धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथनों को, जिनकी अभियोजन अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा कराना चाहता है।
(6) यदि पुलिस अधिकारी की यह राय है कि ऐसे किसी कथन का कोई भाग कार्यवाही की विषय-वस्तु से सुसंगत नहीं है, या अभियुक्त को उसका प्रकटीकरण न्याय के हित में आवश्यक नहीं है और लोकहित में अवांछनीय है, तो वह कथन के उस भाग को उपदर्शित करेगा और मजिस्ट्रेट से यह अनुरोध करते हुए एक टिप्पण संलग्न करेगा कि अभियुक्त को दी जाने वाली प्रतियों में से वह भाग अपवर्जित कर दिया जाए तथा ऐसा अनुरोध करने के अपने कारण कथित करेगा।
(7) जहां मामले का अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी ऐसा करना सुविधाजनक पाता है, वहां वह अभियुक्त को उपधारा (5) में निर्दिष्ट सब दस्तावेजों की या उनमें से किसी की प्रतियां दे सकेगा।
(8) इस धारा की कोई बात उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेजे जाने के पश्चात् किसी अपराध के बारे में और अन्वेषण का वर्जन करने वाली न समझी जाएगी, और जहां ऐसे अन्वेषण पर पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को मौखिक या दस्तावेजी अतिरिक्त साक्ष्य प्राप्त होता है, वहां वह ऐसे साक्ष्य के बारे में विहित प्ररूप में एक या अधिक अतिरिक्त रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेजेगा; और उपधारा (2) से उपधारा (6) तक के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी रिपोर्ट या रिपोर्टों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे, जैसे वे उपधारा (2) के अधीन भेजी गई रिपोर्ट के संबंध में लागू होते हैं।
नया कानून
BNSS §193
धारा 193: जांच पूरी होने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट
193. (1) इस अध्याय के तहत प्रत्येक जांच अनावश्यक देरी के बिना पूरी की जाएगी।
(2) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 66, 67, 68, 70, 71 के तहत या यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम की धारा 4, 6, 8 या धारा 10 के तहत अपराध के संबंध में जांच , 2012 उस तारीख से दो महीने के भीतर पूरा किया जाएगा जिस दिन पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज की गई थी।
(3) (i) जैसे ही जांच पूरी हो जाती है, पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी एक पुलिस रिपोर्ट पर अपराध का संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट को भेज देगा, एक रिपोर्ट राज्य सरकार के रूप में हो सकती है। नियमों द्वारा प्रदान करते हुए, बताते हुए—
(ए) पार्टियों के नाम;
(बी) जानकारी की प्रकृति;
(सी) उन व्यक्तियों के नाम जो मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होते हैं;
(डी) क्या ऐसा प्रतीत होता है कि कोई अपराध किया गया है और यदि हां, तो किसके द्वारा;
(ई) क्या आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है;
(च) क्या आरोपी को उसके बांड पर रिहा कर दिया गया है और यदि हां, तो क्या जमानत के साथ या उसके बिना;
(जी) क्या आरोपी को धारा 190 के तहत हिरासत में भेज दिया गया है;
(ज) क्या महिला की मेडिकल जांच की रिपोर्ट संलग्न की गई है जहां जांच भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 66, 67, 68 या धारा 70 के तहत अपराध से संबंधित है।
(ii) पुलिस अधिकारी, नब्बे दिनों की अवधि के भीतर, मुखबिर या पीड़ित को इलेक्ट्रॉनिक संचार सहित किसी भी माध्यम से जांच की प्रगति के बारे में सूचित करेगा।
(iii) अधिकारी अपने द्वारा की गई कार्रवाई के बारे में, यदि कोई हो, उस व्यक्ति को, जिसके द्वारा अपराध के घटित होने से संबंधित जानकारी सबसे पहले दी गई थी, उस तरीके से भी सूचित करेगा जैसा कि राज्य सरकार नियमों के अनुसार प्रदान कर सकती है। .
(4) जहां धारा 177 के तहत पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को नियुक्त किया गया है, रिपोर्ट, किसी भी मामले में, जिसमें राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निर्देश देती है, उस अधिकारी के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी, और वह आदेश लंबित रहने तक मजिस्ट्रेट, पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को आगे की जांच करने का निर्देश देते हैं।
(5) जब भी इस धारा के तहत अग्रेषित रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त को उसके बांड पर रिहा कर दिया गया है, तो मजिस्ट्रेट ऐसे बांड के निर्वहन के लिए ऐसा आदेश देगा या अन्यथा जो वह उचित समझे।
(6) जब ऐसी रिपोर्ट किसी ऐसे मामले के संबंध में हो जिस पर धारा 190 लागू होती है, तो पुलिस अधिकारी रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करेगा—
(ए) जांच के दौरान मजिस्ट्रेट को पहले से भेजे गए दस्तावेज़ों के अलावा अन्य सभी दस्तावेज़ या उनके प्रासंगिक उद्धरण जिन पर अभियोजन पक्ष भरोसा करने का प्रस्ताव करता है;
(बी) उन सभी व्यक्तियों के धारा 180 के तहत दर्ज किए गए बयान जिन्हें अभियोजन पक्ष अपने गवाहों के रूप में जांचने का प्रस्ताव करता है।
(7) यदि पुलिस अधिकारी की राय है कि ऐसे किसी भी बयान का कोई भी हिस्सा कार्यवाही की विषय-वस्तु से प्रासंगिक नहीं है या अभियुक्त के सामने इसका खुलासा न्याय के हित में आवश्यक नहीं है और सार्वजनिक हित में अनुचित है , वह बयान के उस हिस्से को इंगित करेगा और मजिस्ट्रेट से उस हिस्से को आरोपी को दी जाने वाली प्रतियों से बाहर करने का अनुरोध करते हुए एक नोट संलग्न करेगा और ऐसा अनुरोध करने के लिए अपने कारण बताएगा।
(8) उप-धारा (7) में निहित प्रावधानों के अधीन, मामले की जांच करने वाला पुलिस अधिकारी आरोपी को आपूर्ति के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट को विधिवत अनुक्रमित अन्य दस्तावेजों के साथ पुलिस रिपोर्ट की इतनी संख्या में प्रतियां भी प्रस्तुत करेगा। धारा 230 के तहत:
बशर्ते कि इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की आपूर्ति को विधिवत सेवा के रूप में माना जाएगा।
(9) उप-धारा (3) के तहत एक रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेजे जाने के बाद और जहां ऐसी जांच के बाद, पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को अपराध के संबंध में आगे की जांच करने से रोकने के लिए इस धारा में कुछ भी नहीं समझा जाएगा। अतिरिक्त साक्ष्य, मौखिक या दस्तावेजी प्राप्त करता है, तो वह मजिस्ट्रेट को ऐसे साक्ष्य के संबंध में एक और रिपोर्ट या रिपोर्ट उस रूप में अग्रेषित करेगा जैसा कि राज्य सरकार, नियमों द्वारा प्रदान कर सकती है; और उप-धारा (3) से (7) के प्रावधान, जहां तक संभव हो, ऐसी रिपोर्ट या रिपोर्ट के संबंध में लागू होंगे जैसे वे उप-धारा (3) के तहत अग्रेषित रिपोर्ट के संबंध में लागू होते हैं:
बशर्ते कि मुकदमे के दौरान आगे की जांच की अनुमति मामले की सुनवाई कर रहे न्यायालय की अनुमति से दी जा सकती है और इसे नब्बे दिनों की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा जिसे न्यायालय की अनुमति से बढ़ाया जा सकता है। 194. (1) जब किसी पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किसी अन्य पुलिस अधिकारी को यह जानकारी मिलती है कि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली है, या किसी अन्य द्वारा या किसी जानवर द्वारा या मशीनरी द्वारा मार दिया गया है या किसी दुर्घटना से, या उचित संदेह पैदा करने वाली परिस्थितियों में मृत्यु हो गई है कि किसी अन्य व्यक्ति ने अपराध किया है, तो वह तुरंत इसकी सूचना निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को देगा जो जांच करने के लिए सशक्त है, और, जब तक कि अन्यथा बनाए गए किसी नियम द्वारा निर्देशित न किया गया हो। राज्य सरकार, या जिला या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के किसी सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, उस स्थान पर जाएगी जहां ऐसे मृत व्यक्ति का शरीर है, और वहां, पड़ोस के दो या अधिक सम्मानित निवासियों की उपस्थिति में, जांच करें, और मृत्यु के स्पष्ट कारण की एक रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें शरीर पर पाए जाने वाले घावों, फ्रैक्चर, चोट और चोट के अन्य निशानों का वर्णन हो, और यह भी बताया जाए कि किस तरीके से, या किस हथियार या उपकरण से ( यदि कोई); ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे निशान लगाए गए हैं।
(2) रिपोर्ट पर ऐसे पुलिस अधिकारी और अन्य व्यक्तियों, या उनमें से जितने भी सहमत हों, द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे, और चौबीस घंटे के भीतर जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को भेज दिया जाएगा।
(3) जब—
(i) इस मामले में एक महिला द्वारा अपनी शादी के सात साल के भीतर आत्महत्या करना शामिल है; या
(ii) मामला किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर किसी भी परिस्थिति में मृत्यु से संबंधित है, जिससे यह उचित संदेह पैदा होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसी महिला के संबंध में अपराध किया है; या
(iii) मामला एक महिला की शादी के सात साल के भीतर मृत्यु से संबंधित है और महिला के किसी रिश्तेदार ने इस संबंध में अनुरोध किया है; या
(iv) मृत्यु के कारण के संबंध में कोई संदेह है; या
(v) पुलिस अधिकारी किसी अन्य कारण से ऐसा करना समीचीन समझता है, वह ऐसे नियमों के अधीन, जो राज्य सरकार इस संबंध में निर्धारित कर सकती है, शव को उसकी जांच के लिए निकटतम सिविल को अग्रेषित करेगा। सर्जन, या राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में नियुक्त अन्य योग्य चिकित्सा व्यक्ति, यदि मौसम की स्थिति और दूरी सड़क पर इस तरह के सड़न के जोखिम के बिना इस तरह से आगे बढ़ने की बात स्वीकार करती है जिससे ऐसी परीक्षा बेकार हो जाएगी।
(4) निम्नलिखित मजिस्ट्रेटों को जांच करने का अधिकार है, अर्थात्, कोई भी जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट और राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त कोई अन्य कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
पूरा पढ़ें: BNSS §193(2) भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 66, 67, 68, 70, 71 के तहत या यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण अधिनियम की धारा 4, 6, 8 या धारा 10 के तहत अपराध के संबंध में जांच , 2012 उस तारीख से दो महीने के भीतर पूरा किया जाएगा जिस दिन पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी द्वारा सूचना दर्ज की गई थी।
(3) (i) जैसे ही जांच पूरी हो जाती है, पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी एक पुलिस रिपोर्ट पर अपराध का संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट को भेज देगा, एक रिपोर्ट राज्य सरकार के रूप में हो सकती है। नियमों द्वारा प्रदान करते हुए, बताते हुए—
(ए) पार्टियों के नाम;
(बी) जानकारी की प्रकृति;
(सी) उन व्यक्तियों के नाम जो मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होते हैं;
(डी) क्या ऐसा प्रतीत होता है कि कोई अपराध किया गया है और यदि हां, तो किसके द्वारा;
(ई) क्या आरोपी को गिरफ्तार कर लिया गया है;
(च) क्या आरोपी को उसके बांड पर रिहा कर दिया गया है और यदि हां, तो क्या जमानत के साथ या उसके बिना;
(जी) क्या आरोपी को धारा 190 के तहत हिरासत में भेज दिया गया है;
(ज) क्या महिला की मेडिकल जांच की रिपोर्ट संलग्न की गई है जहां जांच भारतीय न्याय संहिता, 2023 की धारा 64, 66, 67, 68 या धारा 70 के तहत अपराध से संबंधित है।
(ii) पुलिस अधिकारी, नब्बे दिनों की अवधि के भीतर, मुखबिर या पीड़ित को इलेक्ट्रॉनिक संचार सहित किसी भी माध्यम से जांच की प्रगति के बारे में सूचित करेगा।
(iii) अधिकारी अपने द्वारा की गई कार्रवाई के बारे में, यदि कोई हो, उस व्यक्ति को, जिसके द्वारा अपराध के घटित होने से संबंधित जानकारी सबसे पहले दी गई थी, उस तरीके से भी सूचित करेगा जैसा कि राज्य सरकार नियमों के अनुसार प्रदान कर सकती है। .
(4) जहां धारा 177 के तहत पुलिस के एक वरिष्ठ अधिकारी को नियुक्त किया गया है, रिपोर्ट, किसी भी मामले में, जिसमें राज्य सरकार सामान्य या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निर्देश देती है, उस अधिकारी के माध्यम से प्रस्तुत की जाएगी, और वह आदेश लंबित रहने तक मजिस्ट्रेट, पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को आगे की जांच करने का निर्देश देते हैं।
(5) जब भी इस धारा के तहत अग्रेषित रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त को उसके बांड पर रिहा कर दिया गया है, तो मजिस्ट्रेट ऐसे बांड के निर्वहन के लिए ऐसा आदेश देगा या अन्यथा जो वह उचित समझे।
(6) जब ऐसी रिपोर्ट किसी ऐसे मामले के संबंध में हो जिस पर धारा 190 लागू होती है, तो पुलिस अधिकारी रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को अग्रेषित करेगा—
(ए) जांच के दौरान मजिस्ट्रेट को पहले से भेजे गए दस्तावेज़ों के अलावा अन्य सभी दस्तावेज़ या उनके प्रासंगिक उद्धरण जिन पर अभियोजन पक्ष भरोसा करने का प्रस्ताव करता है;
(बी) उन सभी व्यक्तियों के धारा 180 के तहत दर्ज किए गए बयान जिन्हें अभियोजन पक्ष अपने गवाहों के रूप में जांचने का प्रस्ताव करता है।
(7) यदि पुलिस अधिकारी की राय है कि ऐसे किसी भी बयान का कोई भी हिस्सा कार्यवाही की विषय-वस्तु से प्रासंगिक नहीं है या अभियुक्त के सामने इसका खुलासा न्याय के हित में आवश्यक नहीं है और सार्वजनिक हित में अनुचित है , वह बयान के उस हिस्से को इंगित करेगा और मजिस्ट्रेट से उस हिस्से को आरोपी को दी जाने वाली प्रतियों से बाहर करने का अनुरोध करते हुए एक नोट संलग्न करेगा और ऐसा अनुरोध करने के लिए अपने कारण बताएगा।
(8) उप-धारा (7) में निहित प्रावधानों के अधीन, मामले की जांच करने वाला पुलिस अधिकारी आरोपी को आपूर्ति के लिए न्यायिक मजिस्ट्रेट को विधिवत अनुक्रमित अन्य दस्तावेजों के साथ पुलिस रिपोर्ट की इतनी संख्या में प्रतियां भी प्रस्तुत करेगा। धारा 230 के तहत:
बशर्ते कि इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा रिपोर्ट और अन्य दस्तावेजों की आपूर्ति को विधिवत सेवा के रूप में माना जाएगा।
(9) उप-धारा (3) के तहत एक रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को भेजे जाने के बाद और जहां ऐसी जांच के बाद, पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी को अपराध के संबंध में आगे की जांच करने से रोकने के लिए इस धारा में कुछ भी नहीं समझा जाएगा। अतिरिक्त साक्ष्य, मौखिक या दस्तावेजी प्राप्त करता है, तो वह मजिस्ट्रेट को ऐसे साक्ष्य के संबंध में एक और रिपोर्ट या रिपोर्ट उस रूप में अग्रेषित करेगा जैसा कि राज्य सरकार, नियमों द्वारा प्रदान कर सकती है; और उप-धारा (3) से (7) के प्रावधान, जहां तक संभव हो, ऐसी रिपोर्ट या रिपोर्ट के संबंध में लागू होंगे जैसे वे उप-धारा (3) के तहत अग्रेषित रिपोर्ट के संबंध में लागू होते हैं:
बशर्ते कि मुकदमे के दौरान आगे की जांच की अनुमति मामले की सुनवाई कर रहे न्यायालय की अनुमति से दी जा सकती है और इसे नब्बे दिनों की अवधि के भीतर पूरा किया जाएगा जिसे न्यायालय की अनुमति से बढ़ाया जा सकता है। 194. (1) जब किसी पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त किसी अन्य पुलिस अधिकारी को यह जानकारी मिलती है कि किसी व्यक्ति ने आत्महत्या कर ली है, या किसी अन्य द्वारा या किसी जानवर द्वारा या मशीनरी द्वारा मार दिया गया है या किसी दुर्घटना से, या उचित संदेह पैदा करने वाली परिस्थितियों में मृत्यु हो गई है कि किसी अन्य व्यक्ति ने अपराध किया है, तो वह तुरंत इसकी सूचना निकटतम कार्यकारी मजिस्ट्रेट को देगा जो जांच करने के लिए सशक्त है, और, जब तक कि अन्यथा बनाए गए किसी नियम द्वारा निर्देशित न किया गया हो। राज्य सरकार, या जिला या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट के किसी सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, उस स्थान पर जाएगी जहां ऐसे मृत व्यक्ति का शरीर है, और वहां, पड़ोस के दो या अधिक सम्मानित निवासियों की उपस्थिति में, जांच करें, और मृत्यु के स्पष्ट कारण की एक रिपोर्ट तैयार करें, जिसमें शरीर पर पाए जाने वाले घावों, फ्रैक्चर, चोट और चोट के अन्य निशानों का वर्णन हो, और यह भी बताया जाए कि किस तरीके से, या किस हथियार या उपकरण से ( यदि कोई); ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसे निशान लगाए गए हैं।
(2) रिपोर्ट पर ऐसे पुलिस अधिकारी और अन्य व्यक्तियों, या उनमें से जितने भी सहमत हों, द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे, और चौबीस घंटे के भीतर जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट को भेज दिया जाएगा।
(3) जब—
(i) इस मामले में एक महिला द्वारा अपनी शादी के सात साल के भीतर आत्महत्या करना शामिल है; या
(ii) मामला किसी महिला की शादी के सात साल के भीतर किसी भी परिस्थिति में मृत्यु से संबंधित है, जिससे यह उचित संदेह पैदा होता है कि किसी अन्य व्यक्ति ने ऐसी महिला के संबंध में अपराध किया है; या
(iii) मामला एक महिला की शादी के सात साल के भीतर मृत्यु से संबंधित है और महिला के किसी रिश्तेदार ने इस संबंध में अनुरोध किया है; या
(iv) मृत्यु के कारण के संबंध में कोई संदेह है; या
(v) पुलिस अधिकारी किसी अन्य कारण से ऐसा करना समीचीन समझता है, वह ऐसे नियमों के अधीन, जो राज्य सरकार इस संबंध में निर्धारित कर सकती है, शव को उसकी जांच के लिए निकटतम सिविल को अग्रेषित करेगा। सर्जन, या राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में नियुक्त अन्य योग्य चिकित्सा व्यक्ति, यदि मौसम की स्थिति और दूरी सड़क पर इस तरह के सड़न के जोखिम के बिना इस तरह से आगे बढ़ने की बात स्वीकार करती है जिससे ऐसी परीक्षा बेकार हो जाएगी।
(4) निम्नलिखित मजिस्ट्रेटों को जांच करने का अधिकार है, अर्थात्, कोई भी जिला मजिस्ट्रेट या उप-विभागीय मजिस्ट्रेट और राज्य सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस संबंध में विशेष रूप से सशक्त कोई अन्य कार्यकारी मजिस्ट्रेट।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
