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CrPC धारा 145 अब BNSS धारा 164 है
धारा 145. जहां भूमि या जल संबंधी विवाद से परिशांति भंग होना संभाव्य है वहां प्रक्रिया
पुराना कानून
CrPC §145
धारा 145. जहां भूमि या जल संबंधी विवाद से परिशांति भंग होना संभाव्य है वहां प्रक्रिया
145. जहां भूमि या जल संबंधी विवाद से परिशांति भंग होना संभाव्य है वहां प्रक्रिया
(1) जब कभी किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट का, किसी पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट से या अन्य इत्तिला पर, यह समाधान हो जाता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर किसी भूमि या जल या उसकी सीमाओं के संबंध में ऐसा विवाद विद्यमान है, जिससे परिशांति भंग होना संभाव्य है, तब वह ऐसा लिखित आदेश करेगा, जिसमें उसके इस प्रकार समाधान हो जाने के आधार कथित होंगे और जिसके द्वारा ऐसे विवाद से संबंधित पक्षकारों से यह अपेक्षा की जाएगी कि वे विनिर्दिष्ट तारीख और समय पर स्वयं या प्लीडर द्वारा उसके न्यायालय में हाजिर हों और विवादग्रस्त विषय के वास्तविक कब्जे के तथ्य के बारे में अपने-अपने दावों के लिखित कथन पेश करें।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "भूमि या जल" पद के अंतर्गत भवन, बाजार, मत्स्यक्षेत्र, फसलें या भूमि की अन्य उपज और ऐसी किसी संपत्ति के भाटक या लाभ भी हैं।
(3) उस आदेश की एक प्रति ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों पर, जिन्हें मजिस्ट्रेट निदिष्ट करे, उस रीति से तामील की जाएगी, जो समन की तामील के लिए इस संहिता द्वारा उपबंधित है, और कम से कम एक प्रति विवादग्रस्त विषय पर या उसके निकट किसी सहजदृश्य स्थान पर चिपकाकर प्रकाशित की जाएगी।
(4) तब मजिस्ट्रेट, विवादग्रस्त विषय को कब्जे में रखने के अधिकार के बारे में किसी भी पक्षकार के दावों के गुणागुण के प्रति निर्देश किए बिना, इस प्रकार पेश किए गए कथनों का परिशीलन करेगा, पक्षकारों को सुनेगा, ऐसा समस्त साक्ष्य लेगा, जो उनके द्वारा पेश किया जाए, ऐसा और साक्ष्य, यदि कोई हो, लेगा, जो वह आवश्यक समझे, और, यदि संभव हो तो, यह विनिश्चय करेगा कि उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा किए गए आदेश की तारीख को क्या पक्षकारों में से कोई और कौन-सा पक्षकार विवादग्रस्त विषय के कब्जे में था:
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि किसी पक्षकार को उस तारीख से, जिसको किसी पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य इत्तिला मजिस्ट्रेट को प्राप्त हुई थी, ठीक पूर्ववर्ती दो मास के भीतर, या उस तारीख के पश्चात् और उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख से पूर्व, बलपूर्वक और सदोष रूप से कब्जे से बेदखल किया गया है, तो वह इस प्रकार बेदखल किए गए पक्षकार के साथ ऐसा बरताव कर सकेगा, मानो वह पक्षकार उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख को कब्जे में रहा हो।
(5) इस धारा की कोई बात इस प्रकार हाजिर होने के लिए अपेक्षित किसी पक्षकार को, या किसी अन्य हितबद्ध व्यक्ति को, यह दर्शित करने से प्रवारित नहीं करेगी कि पूर्वोक्त रूप का कोई विवाद विद्यमान नहीं है या विद्यमान नहीं रहा है; और ऐसी दशा में मजिस्ट्रेट अपना उक्त आदेश रद्द कर देगा और उस पर की सभी अगली कार्यवाहियां रोक दी जाएंगी, किंतु ऐसे रद्दकरण के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) के अधीन मजिस्ट्रेट का आदेश अंतिम होगा।
(6) (क) यदि मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि पक्षकारों में से एक उक्त विषय के ऐसे कब्जे में था, या उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन ऐसे कब्जे में रहा हुआ माना जाना चाहिए, तो वह ऐसा आदेश जारी करेगा, जिसमें यह घोषित किया जाएगा कि ऐसा पक्षकार विधि के सम्यक् अनुक्रम में उससे बेदखल किए जाने तक उसके कब्जे का हकदार है, और जिसमें ऐसी बेदखली तक ऐसे कब्जे में सब प्रकार के विघ्न का प्रतिषेध किया जाएगा; और जब वह उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन कार्यवाही करता है, तब वह उस पक्षकार को, जिसे बलपूर्वक और सदोष रूप से बेदखल किया गया था, कब्जे में प्रत्यावर्तित कर सकेगा।
(ख) इस उपधारा के अधीन किया गया आदेश उस रीति से तामील और प्रकाशित किया जाएगा, जो उपधारा (3) में अधिकथित है।
(7) जब ऐसी किसी कार्यवाही का कोई पक्षकार मर जाता है, तब मजिस्ट्रेट मृत पक्षकार के विधिक प्रतिनिधि को उस कार्यवाही का पक्षकार बनाया जाना कारित कर सकेगा और तब जांच चालू रखेगा; और यदि इस बारे में कोई प्रश्न उठता है कि ऐसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए मृत पक्षकार का विधिक प्रतिनिधि कौन है, तो वे सब व्यक्ति, जो मृत पक्षकार के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, उसके पक्षकार बनाए जाएंगे।
(8) यदि मजिस्ट्रेट की यह राय है कि उस संपत्ति की, जो इस धारा के अधीन उसके समक्ष लंबित किसी कार्यवाही में विवादग्रस्त विषय है, कोई फसल या अन्य उपज शीघ्र और प्राकृतिक क्षय के अधीन है, तो वह ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा या उसके विक्रय के लिए आदेश कर सकेगा और जांच के पूरा होने पर ऐसी संपत्ति के या उसके विक्रय-आगमों के व्ययन के लिए ऐसा आदेश करेगा, जैसा वह ठीक समझे।
(9) मजिस्ट्रेट, यदि वह ठीक समझे तो, इस धारा के अधीन कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर, किसी पक्षकार के आवेदन पर, किसी साक्षी के नाम ऐसा समन जारी कर सकेगा, जिसमें उसे हाजिर होने या कोई दस्तावेज या चीज पेश करने का निदेश दिया जाए।
(10) इस धारा की कोई बात धारा 107 के अधीन कार्यवाही करने की मजिस्ट्रेट की शक्तियों का अल्पीकरण करने वाली नहीं समझी जाएगी।
राज्य संशोधन
महाराष्ट्र—
धारा 145 में,—
(क) उपधारा (1) में, "जब कभी किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर "जब कभी बृहत्तर बंबई में किसी महानगर मजिस्ट्रेट का और राज्य में अन्यत्र किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द रखे जाएंगे;
(ख) उपधारा (10) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्:—
"(10) इस धारा के अधीन कार्रवाई करने वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट की दशा में, इस धारा की कोई बात धारा 107 के अधीन कार्यवाही करने की उसकी शक्ति का अल्पीकरण करने वाली नहीं समझी जाएगी। इस धारा के अधीन कार्रवाई करने वाले महानगर मजिस्ट्रेट की दशा में, यदि कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर उसकी यह राय है कि वह विवाद धारा 107 के अधीन कार्रवाई की अपेक्षा करता है, तो वह अपने कारण अभिलिखित करने के पश्चात्, अधिकारिता रखने वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट को आवश्यक इत्तिला भेजेगा, जिससे कि वह उस धारा के अधीन कार्यवाही कर सके।"
[महाराष्ट्र अधिनियम 1978 का 1 द्वारा (15-4-1978 से प्रभावी)।]
पूरा पढ़ें: CrPC §145(1) जब कभी किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट का, किसी पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट से या अन्य इत्तिला पर, यह समाधान हो जाता है कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर किसी भूमि या जल या उसकी सीमाओं के संबंध में ऐसा विवाद विद्यमान है, जिससे परिशांति भंग होना संभाव्य है, तब वह ऐसा लिखित आदेश करेगा, जिसमें उसके इस प्रकार समाधान हो जाने के आधार कथित होंगे और जिसके द्वारा ऐसे विवाद से संबंधित पक्षकारों से यह अपेक्षा की जाएगी कि वे विनिर्दिष्ट तारीख और समय पर स्वयं या प्लीडर द्वारा उसके न्यायालय में हाजिर हों और विवादग्रस्त विषय के वास्तविक कब्जे के तथ्य के बारे में अपने-अपने दावों के लिखित कथन पेश करें।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "भूमि या जल" पद के अंतर्गत भवन, बाजार, मत्स्यक्षेत्र, फसलें या भूमि की अन्य उपज और ऐसी किसी संपत्ति के भाटक या लाभ भी हैं।
(3) उस आदेश की एक प्रति ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों पर, जिन्हें मजिस्ट्रेट निदिष्ट करे, उस रीति से तामील की जाएगी, जो समन की तामील के लिए इस संहिता द्वारा उपबंधित है, और कम से कम एक प्रति विवादग्रस्त विषय पर या उसके निकट किसी सहजदृश्य स्थान पर चिपकाकर प्रकाशित की जाएगी।
(4) तब मजिस्ट्रेट, विवादग्रस्त विषय को कब्जे में रखने के अधिकार के बारे में किसी भी पक्षकार के दावों के गुणागुण के प्रति निर्देश किए बिना, इस प्रकार पेश किए गए कथनों का परिशीलन करेगा, पक्षकारों को सुनेगा, ऐसा समस्त साक्ष्य लेगा, जो उनके द्वारा पेश किया जाए, ऐसा और साक्ष्य, यदि कोई हो, लेगा, जो वह आवश्यक समझे, और, यदि संभव हो तो, यह विनिश्चय करेगा कि उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा किए गए आदेश की तारीख को क्या पक्षकारों में से कोई और कौन-सा पक्षकार विवादग्रस्त विषय के कब्जे में था:
परन्तु यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि किसी पक्षकार को उस तारीख से, जिसको किसी पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य इत्तिला मजिस्ट्रेट को प्राप्त हुई थी, ठीक पूर्ववर्ती दो मास के भीतर, या उस तारीख के पश्चात् और उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख से पूर्व, बलपूर्वक और सदोष रूप से कब्जे से बेदखल किया गया है, तो वह इस प्रकार बेदखल किए गए पक्षकार के साथ ऐसा बरताव कर सकेगा, मानो वह पक्षकार उपधारा (1) के अधीन उसके आदेश की तारीख को कब्जे में रहा हो।
(5) इस धारा की कोई बात इस प्रकार हाजिर होने के लिए अपेक्षित किसी पक्षकार को, या किसी अन्य हितबद्ध व्यक्ति को, यह दर्शित करने से प्रवारित नहीं करेगी कि पूर्वोक्त रूप का कोई विवाद विद्यमान नहीं है या विद्यमान नहीं रहा है; और ऐसी दशा में मजिस्ट्रेट अपना उक्त आदेश रद्द कर देगा और उस पर की सभी अगली कार्यवाहियां रोक दी जाएंगी, किंतु ऐसे रद्दकरण के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) के अधीन मजिस्ट्रेट का आदेश अंतिम होगा।
(6) (क) यदि मजिस्ट्रेट यह विनिश्चय करता है कि पक्षकारों में से एक उक्त विषय के ऐसे कब्जे में था, या उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन ऐसे कब्जे में रहा हुआ माना जाना चाहिए, तो वह ऐसा आदेश जारी करेगा, जिसमें यह घोषित किया जाएगा कि ऐसा पक्षकार विधि के सम्यक् अनुक्रम में उससे बेदखल किए जाने तक उसके कब्जे का हकदार है, और जिसमें ऐसी बेदखली तक ऐसे कब्जे में सब प्रकार के विघ्न का प्रतिषेध किया जाएगा; और जब वह उपधारा (4) के परन्तुक के अधीन कार्यवाही करता है, तब वह उस पक्षकार को, जिसे बलपूर्वक और सदोष रूप से बेदखल किया गया था, कब्जे में प्रत्यावर्तित कर सकेगा।
(ख) इस उपधारा के अधीन किया गया आदेश उस रीति से तामील और प्रकाशित किया जाएगा, जो उपधारा (3) में अधिकथित है।
(7) जब ऐसी किसी कार्यवाही का कोई पक्षकार मर जाता है, तब मजिस्ट्रेट मृत पक्षकार के विधिक प्रतिनिधि को उस कार्यवाही का पक्षकार बनाया जाना कारित कर सकेगा और तब जांच चालू रखेगा; और यदि इस बारे में कोई प्रश्न उठता है कि ऐसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए मृत पक्षकार का विधिक प्रतिनिधि कौन है, तो वे सब व्यक्ति, जो मृत पक्षकार के प्रतिनिधि होने का दावा करते हैं, उसके पक्षकार बनाए जाएंगे।
(8) यदि मजिस्ट्रेट की यह राय है कि उस संपत्ति की, जो इस धारा के अधीन उसके समक्ष लंबित किसी कार्यवाही में विवादग्रस्त विषय है, कोई फसल या अन्य उपज शीघ्र और प्राकृतिक क्षय के अधीन है, तो वह ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा या उसके विक्रय के लिए आदेश कर सकेगा और जांच के पूरा होने पर ऐसी संपत्ति के या उसके विक्रय-आगमों के व्ययन के लिए ऐसा आदेश करेगा, जैसा वह ठीक समझे।
(9) मजिस्ट्रेट, यदि वह ठीक समझे तो, इस धारा के अधीन कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर, किसी पक्षकार के आवेदन पर, किसी साक्षी के नाम ऐसा समन जारी कर सकेगा, जिसमें उसे हाजिर होने या कोई दस्तावेज या चीज पेश करने का निदेश दिया जाए।
(10) इस धारा की कोई बात धारा 107 के अधीन कार्यवाही करने की मजिस्ट्रेट की शक्तियों का अल्पीकरण करने वाली नहीं समझी जाएगी।
राज्य संशोधन
महाराष्ट्र—
धारा 145 में,—
(क) उपधारा (1) में, "जब कभी किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्दों के स्थान पर "जब कभी बृहत्तर बंबई में किसी महानगर मजिस्ट्रेट का और राज्य में अन्यत्र किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट" शब्द रखे जाएंगे;
(ख) उपधारा (10) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात्:—
"(10) इस धारा के अधीन कार्रवाई करने वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट की दशा में, इस धारा की कोई बात धारा 107 के अधीन कार्यवाही करने की उसकी शक्ति का अल्पीकरण करने वाली नहीं समझी जाएगी। इस धारा के अधीन कार्रवाई करने वाले महानगर मजिस्ट्रेट की दशा में, यदि कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर उसकी यह राय है कि वह विवाद धारा 107 के अधीन कार्रवाई की अपेक्षा करता है, तो वह अपने कारण अभिलिखित करने के पश्चात्, अधिकारिता रखने वाले कार्यपालक मजिस्ट्रेट को आवश्यक इत्तिला भेजेगा, जिससे कि वह उस धारा के अधीन कार्यवाही कर सके।"
[महाराष्ट्र अधिनियम 1978 का 1 द्वारा (15-4-1978 से प्रभावी)।]
नया कानून
BNSS §164
भूमि या जल से संबंधित विवाद की स्थिति में शांति भंग होने की आशंका होने पर अपनाई जाने वाली प्रक्रिया।
(1) जब भी कोई कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य सूचना से संतुष्ट हो जाता है कि उसके स्थानीय अधिकार क्षेत्र के भीतर किसी भूमि या जल या उसकी सीमाओं के संबंध में कोई विवाद मौजूद है जिससे शांति भंग होने की संभावना है, तो वह लिखित में एक आदेश जारी करेगा, जिसमें उसकी इस प्रकार संतुष्टि के आधार बताए जाएंगे और विवाद से संबंधित पक्षों को निर्दिष्ट तिथि और समय पर स्वयं या किसी अधिवक्ता के माध्यम से उसके न्यायालय में उपस्थित होने और विवादित विषय पर वास्तविक कब्जे के संबंध में अपने-अपने दावों के लिखित बयान प्रस्तुत करने का निर्देश दिया जाएगा।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "भूमि या जल" अभिव्यक्ति में भवन, बाजार, मत्स्य पालन, फसलें या भूमि के अन्य उत्पाद तथा ऐसी किसी संपत्ति का किराया या लाभ शामिल है।
(3) इस संहिता में समन तामील करने के लिए निर्धारित तरीके से आदेश की एक प्रति मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित व्यक्ति या व्यक्तियों को तामील की जाएगी, और कम से कम एक प्रति विवाद के विषय के पास या उसके आसपास किसी प्रमुख स्थान पर चिपकाकर प्रकाशित की जाएगी।
(4) मजिस्ट्रेट, विवादित विषय पर कब्जे के अधिकार के संबंध में किसी भी पक्षकार के दावों या गुणों पर विचार किए बिना, प्रस्तुत किए गए कथनों का अवलोकन करेगा, पक्षकारों की सुनवाई करेगा, उनके द्वारा प्रस्तुत सभी साक्ष्यों को ग्रहण करेगा, यदि आवश्यक समझे तो ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य लेगा, और यदि संभव हो तो यह निर्णय करेगा कि उपधारा (1) के तहत उसके द्वारा दिए गए आदेश की तिथि को विवादित विषय पर किस पक्षकार का कब्जा था।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि किसी पक्ष को पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य सूचना प्राप्त होने की तिथि से दो महीने पहले या उस तिथि के बाद और उपधारा (1) के तहत उसके आदेश की तिथि से पहले बलपूर्वक और गलत तरीके से बेदखल किया गया है, तो वह बेदखल किए गए पक्ष को ऐसा मान सकता है मानो वह पक्ष उपधारा (1) के तहत उसके आदेश की तिथि को कब्जे में था।
(5) इस धारा में ऐसी कोई बात नहीं है जो किसी पक्षकार को, जिसे उपस्थित होने के लिए कहा गया हो, या किसी अन्य हितधारक को, यह साबित करने से रोके कि उपर्युक्त विवाद का कोई अस्तित्व नहीं है या कभी नहीं रहा है; और ऐसे मामले में मजिस्ट्रेट अपना उक्त आदेश रद्द कर देगा, और उस पर आगे की सभी कार्यवाही स्थगित कर दी जाएगी, लेकिन, ऐसे रद्द करने के अधीन, उपधारा (1) के तहत मजिस्ट्रेट का आदेश अंतिम होगा।
(6) (क) यदि मजिस्ट्रेट यह निर्णय करे कि विवादित विषय पर किसी पक्ष का कब्जा था, या उपधारा (4) के परंतुक के अनुसार विवाद के उक्त विषय पर कब्जे में माना जाना चाहिए, तो वह ऐसा आदेश जारी करेगा जिसमें ऐसे पक्ष को विधिवत बेदखल किए जाने तक उस विषय पर कब्जे का हकदार घोषित किया जाएगा, और बेदखली होने तक ऐसे कब्जे में किसी भी प्रकार की बाधा डालने से मना किया जाएगा; और जब वह उपधारा (4) के परंतुक के तहत कार्यवाही करे, तो वह बलपूर्वक और गलत तरीके से बेदखल किए गए पक्ष को कब्जे में वापस ला सकता है;
(ख) इस उपधारा के अधीन जारी किया गया आदेश उपधारा (3) में निर्धारित तरीके से तामील और प्रकाशित किया जाएगा।
(7) जब किसी कार्यवाही में किसी पक्षकार की मृत्यु हो जाती है, तो मजिस्ट्रेट मृतक पक्षकार के कानूनी प्रतिनिधि को कार्यवाही में पक्षकार बना सकता है और उसके बाद जांच जारी रखेगा, और यदि यह प्रश्न उठता है कि ऐसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए मृतक पक्षकार का कानूनी प्रतिनिधि कौन है, तो मृतक पक्षकार के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले सभी व्यक्तियों को उसमें पक्षकार बनाया जाएगा।
(8) यदि मजिस्ट्रेट की राय हो कि इस धारा के अंतर्गत उसके समक्ष लंबित किसी कार्यवाही में विवादित संपत्ति की कोई फसल या अन्य उपज शीघ्र और स्वाभाविक रूप से नष्ट हो सकती है, तो वह ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा या बिक्री का आदेश दे सकता है, और जांच पूरी होने पर, ऐसी संपत्ति या उसकी बिक्री से प्राप्त आय के निपटान के लिए ऐसा आदेश देगा जैसा वह उचित समझे।
(9) मजिस्ट्रेट, यदि वह उचित समझे, तो इस धारा के अंतर्गत कार्यवाही के किसी भी चरण में, किसी भी पक्ष के आवेदन पर, किसी भी गवाह को समन जारी कर उसे उपस्थित होने या कोई दस्तावेज या वस्तु प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकता है।
(10) इस धारा में कोई बात मजिस्ट्रेट को धारा 126 के तहत कार्यवाही करने की शक्तियों में कमी करने वाली नहीं मानी जाएगी।
पूरा पढ़ें: BNSS §164(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, "भूमि या जल" अभिव्यक्ति में भवन, बाजार, मत्स्य पालन, फसलें या भूमि के अन्य उत्पाद तथा ऐसी किसी संपत्ति का किराया या लाभ शामिल है।
(3) इस संहिता में समन तामील करने के लिए निर्धारित तरीके से आदेश की एक प्रति मजिस्ट्रेट द्वारा निर्देशित व्यक्ति या व्यक्तियों को तामील की जाएगी, और कम से कम एक प्रति विवाद के विषय के पास या उसके आसपास किसी प्रमुख स्थान पर चिपकाकर प्रकाशित की जाएगी।
(4) मजिस्ट्रेट, विवादित विषय पर कब्जे के अधिकार के संबंध में किसी भी पक्षकार के दावों या गुणों पर विचार किए बिना, प्रस्तुत किए गए कथनों का अवलोकन करेगा, पक्षकारों की सुनवाई करेगा, उनके द्वारा प्रस्तुत सभी साक्ष्यों को ग्रहण करेगा, यदि आवश्यक समझे तो ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य लेगा, और यदि संभव हो तो यह निर्णय करेगा कि उपधारा (1) के तहत उसके द्वारा दिए गए आदेश की तिथि को विवादित विषय पर किस पक्षकार का कब्जा था।
बशर्ते कि यदि मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि किसी पक्ष को पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट या अन्य सूचना प्राप्त होने की तिथि से दो महीने पहले या उस तिथि के बाद और उपधारा (1) के तहत उसके आदेश की तिथि से पहले बलपूर्वक और गलत तरीके से बेदखल किया गया है, तो वह बेदखल किए गए पक्ष को ऐसा मान सकता है मानो वह पक्ष उपधारा (1) के तहत उसके आदेश की तिथि को कब्जे में था।
(5) इस धारा में ऐसी कोई बात नहीं है जो किसी पक्षकार को, जिसे उपस्थित होने के लिए कहा गया हो, या किसी अन्य हितधारक को, यह साबित करने से रोके कि उपर्युक्त विवाद का कोई अस्तित्व नहीं है या कभी नहीं रहा है; और ऐसे मामले में मजिस्ट्रेट अपना उक्त आदेश रद्द कर देगा, और उस पर आगे की सभी कार्यवाही स्थगित कर दी जाएगी, लेकिन, ऐसे रद्द करने के अधीन, उपधारा (1) के तहत मजिस्ट्रेट का आदेश अंतिम होगा।
(6) (क) यदि मजिस्ट्रेट यह निर्णय करे कि विवादित विषय पर किसी पक्ष का कब्जा था, या उपधारा (4) के परंतुक के अनुसार विवाद के उक्त विषय पर कब्जे में माना जाना चाहिए, तो वह ऐसा आदेश जारी करेगा जिसमें ऐसे पक्ष को विधिवत बेदखल किए जाने तक उस विषय पर कब्जे का हकदार घोषित किया जाएगा, और बेदखली होने तक ऐसे कब्जे में किसी भी प्रकार की बाधा डालने से मना किया जाएगा; और जब वह उपधारा (4) के परंतुक के तहत कार्यवाही करे, तो वह बलपूर्वक और गलत तरीके से बेदखल किए गए पक्ष को कब्जे में वापस ला सकता है;
(ख) इस उपधारा के अधीन जारी किया गया आदेश उपधारा (3) में निर्धारित तरीके से तामील और प्रकाशित किया जाएगा।
(7) जब किसी कार्यवाही में किसी पक्षकार की मृत्यु हो जाती है, तो मजिस्ट्रेट मृतक पक्षकार के कानूनी प्रतिनिधि को कार्यवाही में पक्षकार बना सकता है और उसके बाद जांच जारी रखेगा, और यदि यह प्रश्न उठता है कि ऐसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए मृतक पक्षकार का कानूनी प्रतिनिधि कौन है, तो मृतक पक्षकार के प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले सभी व्यक्तियों को उसमें पक्षकार बनाया जाएगा।
(8) यदि मजिस्ट्रेट की राय हो कि इस धारा के अंतर्गत उसके समक्ष लंबित किसी कार्यवाही में विवादित संपत्ति की कोई फसल या अन्य उपज शीघ्र और स्वाभाविक रूप से नष्ट हो सकती है, तो वह ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा या बिक्री का आदेश दे सकता है, और जांच पूरी होने पर, ऐसी संपत्ति या उसकी बिक्री से प्राप्त आय के निपटान के लिए ऐसा आदेश देगा जैसा वह उचित समझे।
(9) मजिस्ट्रेट, यदि वह उचित समझे, तो इस धारा के अंतर्गत कार्यवाही के किसी भी चरण में, किसी भी पक्ष के आवेदन पर, किसी भी गवाह को समन जारी कर उसे उपस्थित होने या कोई दस्तावेज या वस्तु प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकता है।
(10) इस धारा में कोई बात मजिस्ट्रेट को धारा 126 के तहत कार्यवाही करने की शक्तियों में कमी करने वाली नहीं मानी जाएगी।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
