पाठ बदला गया है
BNSS धारा 447 अब CrPC धारा 407 है
उच्च न्यायालय को मामलों और अपीलों को स्थानांतरित करने का अधिकार।
पुराना कानून
BNSS §447
उच्च न्यायालय को मामलों और अपीलों को स्थानांतरित करने का अधिकार।
(1) जब भी यह उच्च न्यायालय के समक्ष प्रकट किया जाता है---
(क) कि उसके अधीनस्थ किसी भी आपराधिक न्यायालय में निष्पक्ष और तटस्थ जांच या परीक्षण नहीं किया जा सकता; या
(ख) कि कानून से संबंधित कोई असामान्य रूप से कठिन प्रश्न उठने की संभावना है; या
(ग) कि इस संहिता के किसी प्रावधान के तहत इस धारा के अंतर्गत आदेश देना आवश्यक है, या इससे पक्षकारों या गवाहों की सामान्य सुविधा होगी, या यह न्याय के उद्देश्यों के लिए उपयुक्त है।
यह आदेश दे सकता है---
(i) किसी अपराध की जांच या मुकदमा किसी ऐसे न्यायालय द्वारा किया जाए जो धारा 197 से 205 (दोनों सहित) के तहत योग्य न हो, लेकिन अन्य मामलों में ऐसे अपराध की जांच या मुकदमा करने के लिए सक्षम हो;
(ii) कि किसी विशेष मामले या अपील, या मामलों या अपीलों के वर्ग को, उसके अधिकार क्षेत्र के अधीनस्थ आपराधिक न्यायालय से समान या उच्चतर अधिकार क्षेत्र वाले किसी अन्य ऐसे आपराधिक न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए;
(iii) कि किसी विशेष मामले को सत्र न्यायालय में विचार के लिए भेजा जाए; या
(iv) कि कोई विशेष मामला या अपील उसे स्थानांतरित कर दी जाए और उसके समक्ष सुनवाई की जाए।
(2) उच्च न्यायालय निचली अदालत की रिपोर्ट पर, या किसी हितधारक के आवेदन पर, या अपनी स्वयं की पहल पर कार्रवाई कर सकता है:
बशर्ते कि एक ही सत्र मंडल में एक आपराधिक न्यायालय से दूसरे आपराधिक न्यायालय में किसी मामले को स्थानांतरित करने के लिए उच्च न्यायालय में कोई आवेदन तब तक नहीं किया जा सकेगा, जब तक कि इस तरह के स्थानांतरण के लिए सत्र न्यायाधीश के समक्ष आवेदन न किया गया हो और उनके द्वारा अस्वीकार न कर दिया गया हो।
(3) उपधारा (1) के तहत आदेश के लिए प्रत्येक आवेदन प्रस्ताव द्वारा किया जाएगा, जो कि, जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता हो, को छोड़कर, हलफनामे या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
(4) जब ऐसा आवेदन किसी आरोपी व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तो उच्च न्यायालय उसे उपधारा (7) के तहत उच्च न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले किसी भी मुआवजे के भुगतान के लिए बांड या जमानत बांड निष्पादित करने का निर्देश दे सकता है।
(5) ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक आरोपी व्यक्ति लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना देगा, साथ ही आवेदन के आधारों की एक प्रति भी देगा; और आवेदन की सुनवाई और सूचना देने के बीच कम से कम चौबीस घंटे बीत जाने तक आवेदन के गुण-दोष पर कोई आदेश नहीं दिया जाएगा।
(6) यदि आवेदन किसी अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले या अपील के स्थानांतरण के लिए हो, तो उच्च न्यायालय, यदि वह संतुष्ट हो कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो यह आदेश दे सकता है कि आवेदन के निपटारे तक अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाही को उन शर्तों पर स्थगित कर दिया जाए, जिन्हें उच्च न्यायालय उचित समझे।
बशर्ते कि ऐसा स्थगन धारा 346 के तहत अधीनस्थ न्यायालय की पुनर्विचार याचिका की शक्ति को प्रभावित नहीं करेगा।
(7) जहां उपधारा (1) के तहत आदेश के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है, तो उच्च न्यायालय, यदि उसकी राय हो कि आवेदन तुच्छ या परेशान करने वाला था, तो आवेदक को आवेदन का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में ऐसी राशि का भुगतान करने का आदेश दे सकता है, जिसे वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे।
(8) जब उच्च न्यायालय उपधारा (1) के अंतर्गत आदेश देता है कि किसी मामले को किसी न्यायालय से अपने समक्ष सुनवाई के लिए स्थानांतरित किया जाए, तो वह ऐसी सुनवाई में वही प्रक्रिया अपनाएगा जो वह न्यायालय अपनाता यदि मामला इस प्रकार स्थानांतरित न किया गया होता।
(9) इस धारा में कोई बात धारा 218 के तहत सरकार के किसी आदेश को प्रभावित करने वाली नहीं मानी जाएगी।
पूरा पढ़ें: BNSS §447(क) कि उसके अधीनस्थ किसी भी आपराधिक न्यायालय में निष्पक्ष और तटस्थ जांच या परीक्षण नहीं किया जा सकता; या
(ख) कि कानून से संबंधित कोई असामान्य रूप से कठिन प्रश्न उठने की संभावना है; या
(ग) कि इस संहिता के किसी प्रावधान के तहत इस धारा के अंतर्गत आदेश देना आवश्यक है, या इससे पक्षकारों या गवाहों की सामान्य सुविधा होगी, या यह न्याय के उद्देश्यों के लिए उपयुक्त है।
यह आदेश दे सकता है---
(i) किसी अपराध की जांच या मुकदमा किसी ऐसे न्यायालय द्वारा किया जाए जो धारा 197 से 205 (दोनों सहित) के तहत योग्य न हो, लेकिन अन्य मामलों में ऐसे अपराध की जांच या मुकदमा करने के लिए सक्षम हो;
(ii) कि किसी विशेष मामले या अपील, या मामलों या अपीलों के वर्ग को, उसके अधिकार क्षेत्र के अधीनस्थ आपराधिक न्यायालय से समान या उच्चतर अधिकार क्षेत्र वाले किसी अन्य ऐसे आपराधिक न्यायालय में स्थानांतरित किया जाए;
(iii) कि किसी विशेष मामले को सत्र न्यायालय में विचार के लिए भेजा जाए; या
(iv) कि कोई विशेष मामला या अपील उसे स्थानांतरित कर दी जाए और उसके समक्ष सुनवाई की जाए।
(2) उच्च न्यायालय निचली अदालत की रिपोर्ट पर, या किसी हितधारक के आवेदन पर, या अपनी स्वयं की पहल पर कार्रवाई कर सकता है:
बशर्ते कि एक ही सत्र मंडल में एक आपराधिक न्यायालय से दूसरे आपराधिक न्यायालय में किसी मामले को स्थानांतरित करने के लिए उच्च न्यायालय में कोई आवेदन तब तक नहीं किया जा सकेगा, जब तक कि इस तरह के स्थानांतरण के लिए सत्र न्यायाधीश के समक्ष आवेदन न किया गया हो और उनके द्वारा अस्वीकार न कर दिया गया हो।
(3) उपधारा (1) के तहत आदेश के लिए प्रत्येक आवेदन प्रस्ताव द्वारा किया जाएगा, जो कि, जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता हो, को छोड़कर, हलफनामे या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
(4) जब ऐसा आवेदन किसी आरोपी व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तो उच्च न्यायालय उसे उपधारा (7) के तहत उच्च न्यायालय द्वारा दिए जाने वाले किसी भी मुआवजे के भुगतान के लिए बांड या जमानत बांड निष्पादित करने का निर्देश दे सकता है।
(5) ऐसा आवेदन करने वाला प्रत्येक आरोपी व्यक्ति लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना देगा, साथ ही आवेदन के आधारों की एक प्रति भी देगा; और आवेदन की सुनवाई और सूचना देने के बीच कम से कम चौबीस घंटे बीत जाने तक आवेदन के गुण-दोष पर कोई आदेश नहीं दिया जाएगा।
(6) यदि आवेदन किसी अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले या अपील के स्थानांतरण के लिए हो, तो उच्च न्यायालय, यदि वह संतुष्ट हो कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो यह आदेश दे सकता है कि आवेदन के निपटारे तक अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाही को उन शर्तों पर स्थगित कर दिया जाए, जिन्हें उच्च न्यायालय उचित समझे।
बशर्ते कि ऐसा स्थगन धारा 346 के तहत अधीनस्थ न्यायालय की पुनर्विचार याचिका की शक्ति को प्रभावित नहीं करेगा।
(7) जहां उपधारा (1) के तहत आदेश के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है, तो उच्च न्यायालय, यदि उसकी राय हो कि आवेदन तुच्छ या परेशान करने वाला था, तो आवेदक को आवेदन का विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति को मुआवजे के रूप में ऐसी राशि का भुगतान करने का आदेश दे सकता है, जिसे वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे।
(8) जब उच्च न्यायालय उपधारा (1) के अंतर्गत आदेश देता है कि किसी मामले को किसी न्यायालय से अपने समक्ष सुनवाई के लिए स्थानांतरित किया जाए, तो वह ऐसी सुनवाई में वही प्रक्रिया अपनाएगा जो वह न्यायालय अपनाता यदि मामला इस प्रकार स्थानांतरित न किया गया होता।
(9) इस धारा में कोई बात धारा 218 के तहत सरकार के किसी आदेश को प्रभावित करने वाली नहीं मानी जाएगी।
नया कानून
CrPC §407
धारा 407. उच्च न्यायालय की मामलों और अपीलों को अंतरित करने की शक्ति
407. उच्च न्यायालय की मामलों और अपीलों को अंतरित करने की शक्ति
(1) जब कभी उच्च न्यायालय को यह प्रतीत कराया जाता है—
(क) कि उसके अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय में निष्पक्ष और पक्षपातरहित जांच या विचारण नहीं हो सकता; अथवा
(ख) कि विधि का कोई ऐसा प्रश्न, जो असाधारण रूप से कठिन है, उठने की संभावना है; अथवा
(ग) कि इस धारा के अधीन आदेश इस संहिता के किसी उपबंध द्वारा अपेक्षित है, अथवा उससे पक्षकारों या साक्षियों की साधारण सुविधा होगी, अथवा वह न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है,
तब वह यह आदेश दे सकेगा—
(i) कि किसी अपराध की जांच या उसका विचारण ऐसे किसी न्यायालय द्वारा किया जाए जो धारा 177 से धारा 185 तक (दोनों सहित) के अधीन अर्हित नहीं है, किन्तु अन्य बातों में ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने के लिए सक्षम है;
(ii) कि कोई विशिष्ट मामला या अपील, अथवा मामलों या अपीलों का कोई वर्ग, उसके प्राधिकार के अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय से किसी अन्य ऐसे दंड न्यायालय को, जिसकी अधिकारिता समान या उच्चतर है, अंतरित कर दिया जाए;
(iii) कि कोई विशिष्ट मामला विचारण के लिए सेशन न्यायालय को सुपुर्द किया जाए; अथवा
(iv) कि कोई विशिष्ट मामला या अपील उसे स्वयं अंतरित कर दी जाए और उसके समक्ष विचारित की जाए।
(2) उच्च न्यायालय या तो अवर न्यायालय की रिपोर्ट पर, अथवा किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर, अथवा स्वप्रेरणा से, कार्य कर सकेगा:
परन्तु किसी मामले को उसी सेशन खंड के एक दंड न्यायालय से दूसरे दंड न्यायालय को अंतरित करने के लिए उच्च न्यायालय में कोई आवेदन तब तक नहीं होगा जब तक कि ऐसे अंतरण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश से न किया गया हो और उसके द्वारा नामंजूर न कर दिया गया हो।
(3) उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए हर आवेदन प्रस्ताव द्वारा किया जाएगा, जो उस दशा के सिवाय जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता है, शपथपत्र या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
(4) जब ऐसा आवेदन किसी अभियुक्त व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तब उच्च न्यायालय उसे यह निदेश दे सकेगा कि वह उस प्रतिकर के संदाय के लिए, जो उच्च न्यायालय उपधारा (7) के अधीन अधिनिर्णीत करे, प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करे।
(5) ऐसा आवेदन करने वाला हर अभियुक्त व्यक्ति लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना, उन आधारों की एक प्रति सहित जिन पर वह किया गया है, देगा; और आवेदन के गुणागुण पर कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक ऐसी सूचना दिए जाने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घंटे बीत न गए हों।
(6) जहां आवेदन किसी अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले या अपील के अंतरण के लिए है, वहां उच्च न्यायालय, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो, यह आदेश दे सकेगा कि आवेदन के निपटारे तक अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाहियां ऐसे निबंधनों पर, जो उच्च न्यायालय अधिरोपित करना ठीक समझे, रोक दी जाएं:
परन्तु ऐसे रोके जाने से धारा 309 के अधीन अधीनस्थ न्यायालय की प्रतिप्रेषण की शक्ति पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
(7) जहां उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है, वहां उच्च न्यायालय, यदि उसकी यह राय है कि आवेदन तुच्छ या तंग करने वाला था तो, आवेदक को यह आदेश दे सकेगा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसने आवेदन का विरोध किया है, प्रतिकर के रूप में ऐसी रकम, जो एक हजार रुपए से अधिक नहीं होगी और जो वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे, दे।
(8) जब उच्च न्यायालय उपधारा (1) के अधीन यह आदेश देता है कि कोई मामला किसी न्यायालय से उसके स्वयं के समक्ष विचारण के लिए अंतरित किया जाए, तब वह ऐसे विचारण में वही प्रक्रिया का पालन करेगा जिसका पालन उस न्यायालय ने किया होता यदि मामला इस प्रकार अंतरित न किया गया होता।
(9) इस धारा की कोई बात धारा 197 के अधीन सरकार के किसी आदेश पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी।
पूरा पढ़ें: CrPC §407(1) जब कभी उच्च न्यायालय को यह प्रतीत कराया जाता है—
(क) कि उसके अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय में निष्पक्ष और पक्षपातरहित जांच या विचारण नहीं हो सकता; अथवा
(ख) कि विधि का कोई ऐसा प्रश्न, जो असाधारण रूप से कठिन है, उठने की संभावना है; अथवा
(ग) कि इस धारा के अधीन आदेश इस संहिता के किसी उपबंध द्वारा अपेक्षित है, अथवा उससे पक्षकारों या साक्षियों की साधारण सुविधा होगी, अथवा वह न्याय के उद्देश्यों के लिए समीचीन है,
तब वह यह आदेश दे सकेगा—
(i) कि किसी अपराध की जांच या उसका विचारण ऐसे किसी न्यायालय द्वारा किया जाए जो धारा 177 से धारा 185 तक (दोनों सहित) के अधीन अर्हित नहीं है, किन्तु अन्य बातों में ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने के लिए सक्षम है;
(ii) कि कोई विशिष्ट मामला या अपील, अथवा मामलों या अपीलों का कोई वर्ग, उसके प्राधिकार के अधीनस्थ किसी दंड न्यायालय से किसी अन्य ऐसे दंड न्यायालय को, जिसकी अधिकारिता समान या उच्चतर है, अंतरित कर दिया जाए;
(iii) कि कोई विशिष्ट मामला विचारण के लिए सेशन न्यायालय को सुपुर्द किया जाए; अथवा
(iv) कि कोई विशिष्ट मामला या अपील उसे स्वयं अंतरित कर दी जाए और उसके समक्ष विचारित की जाए।
(2) उच्च न्यायालय या तो अवर न्यायालय की रिपोर्ट पर, अथवा किसी हितबद्ध पक्षकार के आवेदन पर, अथवा स्वप्रेरणा से, कार्य कर सकेगा:
परन्तु किसी मामले को उसी सेशन खंड के एक दंड न्यायालय से दूसरे दंड न्यायालय को अंतरित करने के लिए उच्च न्यायालय में कोई आवेदन तब तक नहीं होगा जब तक कि ऐसे अंतरण के लिए आवेदन सेशन न्यायाधीश से न किया गया हो और उसके द्वारा नामंजूर न कर दिया गया हो।
(3) उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए हर आवेदन प्रस्ताव द्वारा किया जाएगा, जो उस दशा के सिवाय जब आवेदक राज्य का महाधिवक्ता है, शपथपत्र या प्रतिज्ञान द्वारा समर्थित होगा।
(4) जब ऐसा आवेदन किसी अभियुक्त व्यक्ति द्वारा किया जाता है, तब उच्च न्यायालय उसे यह निदेश दे सकेगा कि वह उस प्रतिकर के संदाय के लिए, जो उच्च न्यायालय उपधारा (7) के अधीन अधिनिर्णीत करे, प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करे।
(5) ऐसा आवेदन करने वाला हर अभियुक्त व्यक्ति लोक अभियोजक को आवेदन की लिखित सूचना, उन आधारों की एक प्रति सहित जिन पर वह किया गया है, देगा; और आवेदन के गुणागुण पर कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक ऐसी सूचना दिए जाने और आवेदन की सुनवाई के बीच कम से कम चौबीस घंटे बीत न गए हों।
(6) जहां आवेदन किसी अधीनस्थ न्यायालय से किसी मामले या अपील के अंतरण के लिए है, वहां उच्च न्यायालय, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि न्याय के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो, यह आदेश दे सकेगा कि आवेदन के निपटारे तक अधीनस्थ न्यायालय की कार्यवाहियां ऐसे निबंधनों पर, जो उच्च न्यायालय अधिरोपित करना ठीक समझे, रोक दी जाएं:
परन्तु ऐसे रोके जाने से धारा 309 के अधीन अधीनस्थ न्यायालय की प्रतिप्रेषण की शक्ति पर प्रभाव नहीं पड़ेगा।
(7) जहां उपधारा (1) के अधीन आदेश के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है, वहां उच्च न्यायालय, यदि उसकी यह राय है कि आवेदन तुच्छ या तंग करने वाला था तो, आवेदक को यह आदेश दे सकेगा कि वह किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसने आवेदन का विरोध किया है, प्रतिकर के रूप में ऐसी रकम, जो एक हजार रुपए से अधिक नहीं होगी और जो वह मामले की परिस्थितियों में उचित समझे, दे।
(8) जब उच्च न्यायालय उपधारा (1) के अधीन यह आदेश देता है कि कोई मामला किसी न्यायालय से उसके स्वयं के समक्ष विचारण के लिए अंतरित किया जाए, तब वह ऐसे विचारण में वही प्रक्रिया का पालन करेगा जिसका पालन उस न्यायालय ने किया होता यदि मामला इस प्रकार अंतरित न किया गया होता।
(9) इस धारा की कोई बात धारा 197 के अधीन सरकार के किसी आदेश पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
