पाठ बदला गया है
BNSS धारा 394 अब CrPC धारा 356 है
पूर्व में दोषी ठहराए गए अपराधी का पता सूचित करने का आदेश।
पुराना कानून
BNSS §394
पूर्व में दोषी ठहराए गए अपराधी का पता सूचित करने का आदेश।
(1) जब कोई व्यक्ति, भारत में किसी न्यायालय द्वारा तीन वर्ष या उससे अधिक की कारावास अवधि से दंडनीय अपराध के लिए दोषी ठहराया गया हो, और फिर द्वितीय श्रेणी के मजिस्ट्रेट के न्यायालय के अलावा किसी अन्य न्यायालय द्वारा तीन वर्ष या उससे अधिक की कारावास अवधि से दंडनीय किसी अपराध के लिए दोषी ठहराया जाता है, तो ऐसा न्यायालय, यदि उचित समझे, तो उस व्यक्ति को कारावास की सजा सुनाते समय यह आदेश भी दे सकता है कि उसके निवास स्थान और रिहाई के बाद ऐसे निवास स्थान में किसी भी परिवर्तन या अनुपस्थिति की सूचना, इस प्रकार दी जाए, जैसा कि इसके बाद प्रावधान किया गया है, ऐसी सजा की समाप्ति की तिथि से पांच वर्ष से अधिक की अवधि के लिए।
(2) उपधारा (1) के प्रावधान ऐसे अपराधों को करने के लिए आपराधिक षड्यंत्रों और ऐसे अपराधों के लिए उकसाने और उन्हें करने के प्रयासों पर भी लागू होंगे।
(3) यदि अपील या अन्यथा ऐसी दोषसिद्धि रद्द कर दी जाती है, तो ऐसा आदेश शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अंतर्गत आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है।
(5) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा, रिहा किए गए दोषियों द्वारा निवास की अधिसूचना या निवास में परिवर्तन या निवास से अनुपस्थिति से संबंधित इस धारा के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है।
(6) ऐसे नियम उनके उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान कर सकते हैं और ऐसे किसी नियम के उल्लंघन के आरोप में किसी व्यक्ति पर सक्षम क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट द्वारा उस जिले में मुकदमा चलाया जा सकता है जिसमें वह स्थान स्थित है जिसे उसने अंतिम बार अपने निवास स्थान के रूप में अधिसूचित किया था।
पूरा पढ़ें: BNSS §394(2) उपधारा (1) के प्रावधान ऐसे अपराधों को करने के लिए आपराधिक षड्यंत्रों और ऐसे अपराधों के लिए उकसाने और उन्हें करने के प्रयासों पर भी लागू होंगे।
(3) यदि अपील या अन्यथा ऐसी दोषसिद्धि रद्द कर दी जाती है, तो ऐसा आदेश शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अंतर्गत आदेश अपीलीय न्यायालय द्वारा या उच्च न्यायालय या सत्र न्यायालय द्वारा पुनरीक्षण शक्तियों का प्रयोग करते समय भी दिया जा सकता है।
(5) राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा, रिहा किए गए दोषियों द्वारा निवास की अधिसूचना या निवास में परिवर्तन या निवास से अनुपस्थिति से संबंधित इस धारा के प्रावधानों को लागू करने के लिए नियम बना सकती है।
(6) ऐसे नियम उनके उल्लंघन के लिए दंड का प्रावधान कर सकते हैं और ऐसे किसी नियम के उल्लंघन के आरोप में किसी व्यक्ति पर सक्षम क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट द्वारा उस जिले में मुकदमा चलाया जा सकता है जिसमें वह स्थान स्थित है जिसे उसने अंतिम बार अपने निवास स्थान के रूप में अधिसूचित किया था।
नया कानून
CrPC §356
धारा 356. पूर्व दोषसिद्ध अपराधी का पता अधिसूचित करने का आदेश
356. पूर्व दोषसिद्ध अपराधी का पता अधिसूचित करने का आदेश
(1) जब कोई व्यक्ति, जो भारत में किसी न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 215, धारा 489क, धारा 489ख, धारा 489ग या धारा 489घ के अधीन [या धारा 506 के अधीन (जहां तक वह ऐसी आपराधिक अभित्रास से संबंधित है जो सात वर्ष तक की अवधि के कारावास से, या जुर्माने से, या दोनों से दंडनीय है)] दंडनीय किसी अपराध के लिए, या उस संहिता के अध्याय 12 या अध्याय 17 के अधीन तीन वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा चुका है, द्वितीय वर्ग के मजिस्ट्रेट के न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय द्वारा उन धाराओं या अध्यायों में से किसी के अधीन तीन वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए फिर दोषसिद्ध किया जाता है, तब ऐसा न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति को कारावास का दंडादेश देते समय यह भी आदेश दे सकेगा कि उसका निवास और छोड़े जाने के पश्चात् ऐसे निवास में कोई परिवर्तन या उससे अनुपस्थिति, ऐसे दंडादेश की समाप्ति की तारीख से पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए, जैसा इसमें इसके पश्चात् उपबंधित है, अधिसूचित की जाए।
(2) उपधारा (1) के उपबंध, उसमें नामित अपराधों के संबंध में, ऐसे अपराधों को करने के आपराधिक षड्यंत्रों को और ऐसे अपराधों के दुष्प्रेरण तथा उन्हें करने के प्रयत्नों को भी लागू होंगे।
(3) यदि ऐसी दोषसिद्धि अपील में या अन्यथा अपास्त कर दी जाती है, तो ऐसा आदेश शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अधीन आदेश अपील न्यायालय द्वारा, या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी, जब वह अपनी पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, किया जा सकेगा।
(5) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, छोड़े गए सिद्धदोषों द्वारा निवास के या निवास में परिवर्तन के या निवास से अनुपस्थिति के अधिसूचन से संबंधित इस धारा के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(6) ऐसे नियमों में उनके भंग के लिए दंड का उपबंध किया जा सकेगा और किसी ऐसे नियम के भंग का आरोपित कोई व्यक्ति उस जिले में सक्षम अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित किया जा सकेगा जिसमें वह स्थान स्थित है जो उसके द्वारा अंतिम बार अपने निवास स्थान के रूप में अधिसूचित किया गया था।
पूरा पढ़ें: CrPC §356(1) जब कोई व्यक्ति, जो भारत में किसी न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 215, धारा 489क, धारा 489ख, धारा 489ग या धारा 489घ के अधीन [या धारा 506 के अधीन (जहां तक वह ऐसी आपराधिक अभित्रास से संबंधित है जो सात वर्ष तक की अवधि के कारावास से, या जुर्माने से, या दोनों से दंडनीय है)] दंडनीय किसी अपराध के लिए, या उस संहिता के अध्याय 12 या अध्याय 17 के अधीन तीन वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा चुका है, द्वितीय वर्ग के मजिस्ट्रेट के न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय द्वारा उन धाराओं या अध्यायों में से किसी के अधीन तीन वर्ष या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के लिए फिर दोषसिद्ध किया जाता है, तब ऐसा न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति को कारावास का दंडादेश देते समय यह भी आदेश दे सकेगा कि उसका निवास और छोड़े जाने के पश्चात् ऐसे निवास में कोई परिवर्तन या उससे अनुपस्थिति, ऐसे दंडादेश की समाप्ति की तारीख से पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए, जैसा इसमें इसके पश्चात् उपबंधित है, अधिसूचित की जाए।
(2) उपधारा (1) के उपबंध, उसमें नामित अपराधों के संबंध में, ऐसे अपराधों को करने के आपराधिक षड्यंत्रों को और ऐसे अपराधों के दुष्प्रेरण तथा उन्हें करने के प्रयत्नों को भी लागू होंगे।
(3) यदि ऐसी दोषसिद्धि अपील में या अन्यथा अपास्त कर दी जाती है, तो ऐसा आदेश शून्य हो जाएगा।
(4) इस धारा के अधीन आदेश अपील न्यायालय द्वारा, या उच्च न्यायालय या सेशन न्यायालय द्वारा भी, जब वह अपनी पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग कर रहा हो, किया जा सकेगा।
(5) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, छोड़े गए सिद्धदोषों द्वारा निवास के या निवास में परिवर्तन के या निवास से अनुपस्थिति के अधिसूचन से संबंधित इस धारा के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी।
(6) ऐसे नियमों में उनके भंग के लिए दंड का उपबंध किया जा सकेगा और किसी ऐसे नियम के भंग का आरोपित कोई व्यक्ति उस जिले में सक्षम अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट द्वारा विचारित किया जा सकेगा जिसमें वह स्थान स्थित है जो उसके द्वारा अंतिम बार अपने निवास स्थान के रूप में अधिसूचित किया गया था।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
