पाठ लगभग अपरिवर्तित है
BNSS धारा 335 अब CrPC धारा 299 है
अभियुक्त की अनुपस्थिति में साक्ष्यों का अभिलेख।
पुराना कानून
BNSS §335
अभियुक्त की अनुपस्थिति में साक्ष्यों का अभिलेख।
(1) यदि यह सिद्ध हो जाए कि कोई अभियुक्त फरार हो गया है, और उसे तुरंत गिरफ्तार करने की कोई संभावना नहीं है, तो अभियोजित अपराध के लिए उस व्यक्ति पर मुकदमा चलाने या उसे मुकदमे के लिए भेजने के लिए सक्षम न्यायालय, उसकी अनुपस्थिति में, अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए गवाहों (यदि कोई हो) की जांच कर सकता है और उनके बयान दर्ज कर सकता है, और ऐसे किसी भी बयान को, उस व्यक्ति की गिरफ्तारी पर, उसके खिलाफ जांच या मुकदमे में साक्ष्य के रूप में दिया जा सकता है, यदि बयान देने वाला व्यक्ति मर गया हो या साक्ष्य देने में असमर्थ हो या न मिल सके या उसकी उपस्थिति को मामले की परिस्थितियों में अनुचित विलंब, व्यय या असुविधा के बिना सुनिश्चित न किया जा सके।
(2) यदि यह प्रतीत होता है कि किसी अज्ञात व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध किया गया है, तो उच्च न्यायालय या सत्र न्यायाधीश यह निर्देश दे सकता है कि प्रथम श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट जांच करे और ऐसे किसी भी गवाह से पूछताछ करे जो अपराध के संबंध में साक्ष्य दे सकता है और इस प्रकार लिए गए किसी भी बयान को उस व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य के रूप में दिया जा सकता है जिस पर बाद में अपराध का आरोप लगाया जाता है, यदि बयान देने वाला व्यक्ति मर चुका हो या साक्ष्य देने में असमर्थ हो या भारत की सीमा से बाहर हो।
पूरा पढ़ें: BNSS §335(2) यदि यह प्रतीत होता है कि किसी अज्ञात व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा मृत्युदंड या आजीवन कारावास से दंडनीय अपराध किया गया है, तो उच्च न्यायालय या सत्र न्यायाधीश यह निर्देश दे सकता है कि प्रथम श्रेणी का कोई मजिस्ट्रेट जांच करे और ऐसे किसी भी गवाह से पूछताछ करे जो अपराध के संबंध में साक्ष्य दे सकता है और इस प्रकार लिए गए किसी भी बयान को उस व्यक्ति के विरुद्ध साक्ष्य के रूप में दिया जा सकता है जिस पर बाद में अपराध का आरोप लगाया जाता है, यदि बयान देने वाला व्यक्ति मर चुका हो या साक्ष्य देने में असमर्थ हो या भारत की सीमा से बाहर हो।
नया कानून
CrPC §299
धारा 299. अभियुक्त की अनुपस्थिति में साक्ष्य का अभिलेखन
299. अभियुक्त की अनुपस्थिति में साक्ष्य का अभिलेखन
(1) यदि यह साबित हो जाता है कि कोई अभियुक्त व्यक्ति फरार हो गया है और उसके गिरफ्तार किए जाने की तुरंत कोई संभावना नहीं है, तो वह न्यायालय, जो परिवादित अपराध के लिए ऐसे व्यक्ति का विचारण करने के लिए या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने के लिए सक्षम है, उसकी अनुपस्थिति में, अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्षियों की (यदि कोई हों) परीक्षा कर सकेगा और उनके अभिसाक्ष्य अभिलिखित कर सकेगा, तथा ऐसा कोई अभिसाक्ष्य, ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी पर, उस अपराध की, जिसका उस पर आरोप है, जांच में या विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकेगा, यदि अभिसाक्षी मर चुका है या साक्ष्य देने में असमर्थ है या पाया नहीं जा सकता है या उसकी उपस्थिति ऐसे विलंब, व्यय या असुविधा के बिना, जो मामले की परिस्थितियों में अयुक्तियुक्त होगी, प्राप्त नहीं की जा सकती।
(2) यदि यह प्रतीत होता है कि मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय कोई अपराध किसी अज्ञात व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया गया है, तो उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश यह निदेश दे सकेगा कि कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जांच करे और ऐसे किसी साक्षी की परीक्षा करे जो उस अपराध के बारे में साक्ष्य दे सकता है, तथा इस प्रकार लिया गया कोई अभिसाक्ष्य ऐसे किसी व्यक्ति के विरुद्ध, जिस पर तत्पश्चात् उस अपराध का अभियोग लगाया जाता है, साक्ष्य में दिया जा सकेगा, यदि अभिसाक्षी मर चुका है या साक्ष्य देने में असमर्थ है या भारत की सीमाओं से परे है।
राज्य संशोधन
उत्तर प्रदेश—धारा 299 की उपधारा (1) में, "ऐसे व्यक्ति का विचारण करने के लिए सक्षम" शब्दों के स्थान पर "ऐसे व्यक्ति का विचारण करने के लिए या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने के लिए सक्षम" शब्द रखे जाएंगे।
[उत्तर प्रदेश अधिनियम 1976 का 6, धारा 7 द्वारा (1-5-1976 से)।]
पूरा पढ़ें: CrPC §299(1) यदि यह साबित हो जाता है कि कोई अभियुक्त व्यक्ति फरार हो गया है और उसके गिरफ्तार किए जाने की तुरंत कोई संभावना नहीं है, तो वह न्यायालय, जो परिवादित अपराध के लिए ऐसे व्यक्ति का विचारण करने के लिए या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने के लिए सक्षम है, उसकी अनुपस्थिति में, अभियोजन की ओर से पेश किए गए साक्षियों की (यदि कोई हों) परीक्षा कर सकेगा और उनके अभिसाक्ष्य अभिलिखित कर सकेगा, तथा ऐसा कोई अभिसाक्ष्य, ऐसे व्यक्ति की गिरफ्तारी पर, उस अपराध की, जिसका उस पर आरोप है, जांच में या विचारण में उसके विरुद्ध साक्ष्य में दिया जा सकेगा, यदि अभिसाक्षी मर चुका है या साक्ष्य देने में असमर्थ है या पाया नहीं जा सकता है या उसकी उपस्थिति ऐसे विलंब, व्यय या असुविधा के बिना, जो मामले की परिस्थितियों में अयुक्तियुक्त होगी, प्राप्त नहीं की जा सकती।
(2) यदि यह प्रतीत होता है कि मृत्यु या आजीवन कारावास से दंडनीय कोई अपराध किसी अज्ञात व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया गया है, तो उच्च न्यायालय या सेशन न्यायाधीश यह निदेश दे सकेगा कि कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जांच करे और ऐसे किसी साक्षी की परीक्षा करे जो उस अपराध के बारे में साक्ष्य दे सकता है, तथा इस प्रकार लिया गया कोई अभिसाक्ष्य ऐसे किसी व्यक्ति के विरुद्ध, जिस पर तत्पश्चात् उस अपराध का अभियोग लगाया जाता है, साक्ष्य में दिया जा सकेगा, यदि अभिसाक्षी मर चुका है या साक्ष्य देने में असमर्थ है या भारत की सीमाओं से परे है।
राज्य संशोधन
उत्तर प्रदेश—धारा 299 की उपधारा (1) में, "ऐसे व्यक्ति का विचारण करने के लिए सक्षम" शब्दों के स्थान पर "ऐसे व्यक्ति का विचारण करने के लिए या उसे विचारण के लिए सुपुर्द करने के लिए सक्षम" शब्द रखे जाएंगे।
[उत्तर प्रदेश अधिनियम 1976 का 6, धारा 7 द्वारा (1-5-1976 से)।]
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
