पुराना कानून
BNSS §2
परिभाषाएँ।
(1) इस संहिता में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—
(क) “ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक” का अर्थ है वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, पहचान, तलाशी और साक्ष्य की जब्ती की प्रक्रियाओं की रिकॉर्डिंग, इलेक्ट्रॉनिक संचार का प्रसारण और ऐसे अन्य उद्देश्यों के लिए तथा ऐसे अन्य साधनों द्वारा किसी भी संचार उपकरण का उपयोग, जैसा कि राज्य सरकार नियमों द्वारा प्रदान कर सकती है;
(ख) “जमानत” का अर्थ है किसी अपराध के आरोपित या संदिग्ध व्यक्ति को किसी अधिकारी या न्यायालय द्वारा लगाई गई कुछ शर्तों पर कानून की हिरासत से रिहा करना, बशर्ते कि वह व्यक्ति किसी बांड या जमानत बांड पर हस्ताक्षर करे;
(ग) “जमानती अपराध” से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जिसे प्रथम अनुसूची में जमानती के रूप में दर्शाया गया हो, या जिसे उस समय लागू किसी अन्य कानून द्वारा जमानती बनाया गया हो; और “गैर-जमानती अपराध” से तात्पर्य किसी अन्य अपराध से है;
(घ) “जमानत बांड” से तात्पर्य जमानतदार के साथ रिहाई के लिए दिए गए वचन से है;
(ई) “बॉन्ड” से तात्पर्य व्यक्तिगत बॉन्ड या बिना ज़मानत के रिहाई के लिए वचनबद्धता से है;
(f) “आरोप” में प्रभार का कोई भी शीर्ष शामिल है जब प्रभार में एक से अधिक शीर्ष हों;
(g) “संज्ञेय अपराध” से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जिसके लिए, और “संज्ञेय मामला” से तात्पर्य ऐसे मामले से है जिसमें, कोई पुलिस अधिकारी, प्रथम अनुसूची के अनुसार या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत, बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है;
(h) “शिकायत” से तात्पर्य किसी मजिस्ट्रेट को मौखिक या लिखित रूप में इस संहिता के अंतर्गत कार्रवाई करने के उद्देश्य से दिए गए किसी आरोप से है कि किसी व्यक्ति ने, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात, कोई अपराध किया है, परन्तु इसमें पुलिस रिपोर्ट शामिल नहीं है।
स्पष्टीकरण.—किसी पुलिस अधिकारी द्वारा किसी मामले में बनाई गई रिपोर्ट, जिसमें जांच के बाद गैर-संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, शिकायत मानी जाएगी; और पुलिस अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जिसमें टेलीफोन, मोबाइल शामिल हैं, का उपयोग करता है;
(i) “इलेक्ट्रॉनिक संचार” से तात्पर्य किसी भी लिखित, मौखिक, चित्रमय सूचना या वीडियो सामग्री के संचार से है, जिसे टेलीफोन, मोबाइल सहित किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के माध्यम से प्रसारित या स्थानांतरित किया जाता है (चाहे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को, या एक उपकरण से दूसरे उपकरण को, या एक व्यक्ति से किसी उपकरण को, या किसी उपकरण से किसी व्यक्ति को)।
फोन, या अन्य वायरलेस दूरसंचार उपकरण, या कंप्यूटर, या ऑडियो-वीडियो प्लेयर या कैमरा या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या इलेक्ट्रॉनिक रूप, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट किया जा सकता है;
(j) “उच्च न्यायालय” से तात्पर्य है,—
(i) किसी राज्य के संबंध में, उस राज्य का उच्च न्यायालय;
(ii) किसी ऐसे केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में, जिस पर किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को विधि द्वारा विस्तारित किया गया है, वह उच्च न्यायालय;
(iii) किसी अन्य केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अलावा उस प्रदेश का सर्वोच्च आपराधिक अपील न्यायालय;
(k) “जांच” से तात्पर्य इस संहिता के अंतर्गत किसी मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा मुकदमे के अलावा की गई प्रत्येक जांच से है;
(एल) “जांच” में इस संहिता के अंतर्गत साक्ष्य एकत्र करने हेतु पुलिस अधिकारी द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति (मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त) द्वारा की जाने वाली सभी कार्यवाही शामिल है जिसे मजिस्ट्रेट द्वारा इस संबंध में अधिकृत किया गया हो।
स्पष्टीकरण.—जहां किसी विशेष अधिनियम के प्रावधान इस संहिता के प्रावधानों के साथ असंगत हों, वहां विशेष अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे;
(m) “न्यायिक कार्यवाही” में कोई भी ऐसी कार्यवाही शामिल है जिसके दौरान शपथ पर कानूनी रूप से साक्ष्य लिया जाता है या लिया जा सकता है;
(n) न्यायालय या मजिस्ट्रेट के संबंध में “स्थानीय क्षेत्राधिकार” से तात्पर्य उस स्थानीय क्षेत्र से है जिसके भीतर न्यायालय या मजिस्ट्रेट इस संहिता के अधीन अपनी सभी या कोई भी शक्तियाँ प्रयोग कर सकता है और ऐसा स्थानीय क्षेत्र राज्य के संपूर्ण भाग या राज्य के किसी भाग को समाहित कर सकता है, जैसा कि राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट करे;
(ओ) “गैर-संज्ञेय अपराध” से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जिसके लिए, और “गैर-संज्ञेय मामला” से तात्पर्य ऐसे मामले से है जिसमें, किसी पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है;
(पी) “अधिसूचना” से तात्पर्य राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना से है;
(q) “अपराध” से तात्पर्य किसी भी ऐसे कार्य या चूक से है जिसे उस समय लागू किसी कानून द्वारा दंडनीय बनाया गया हो और इसमें कोई भी ऐसा कार्य शामिल है जिसके संबंध में पशु अतिक्रमण अधिनियम, 1871 (1 ऑफ 1871) की धारा 20 के तहत शिकायत की जा सकती है;
(r) “पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी” में, जब पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी थाने से अनुपस्थित हो या बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो पुलिस अधिकारी भी शामिल है।
थाने में उपस्थित वह अधिकारी जो ऐसे अधिकारी के बाद रैंक में अगला हो और कांस्टेबल से ऊपर के रैंक का हो, या जब राज्य सरकार ऐसा निर्देश दे, तो कोई अन्य पुलिस अधिकारी जो वहां उपस्थित हो;
(s) “स्थान” में घर, भवन, तम्बू, वाहन और पोत शामिल हैं;
(टी) “पुलिस रिपोर्ट” से तात्पर्य धारा 193 की उपधारा (3) के अंतर्गत किसी पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट को भेजी गई रिपोर्ट से है;
(u) “पुलिस स्टेशन” से तात्पर्य राज्य सरकार द्वारा सामान्यतः या विशेषतः पुलिस स्टेशन घोषित किए गए किसी भी चौकी या स्थान से है, और इसमें राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में निर्दिष्ट कोई भी स्थानीय क्षेत्र शामिल है;
(v) “लोक अभियोजक” से तात्पर्य धारा 18 के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति से है, और इसमें लोक अभियोजक के निर्देशों के अधीन कार्य करने वाला कोई व्यक्ति भी शामिल है;
(w) “उप-मंडल” से तात्पर्य जिले के उप-मंडल से है;
(x) “समन-मामला” से तात्पर्य किसी अपराध से संबंधित मामले से है, जो वारंट-मामला न हो;
(y) “पीड़ित” से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसे अभियुक्त व्यक्ति के कृत्य या चूक के कारण कोई हानि या चोट लगी हो तथा इसमें ऐसे पीड़ित का अभिभावक या कानूनी उत्तराधिकारी भी शामिल है;
(ज़) “वारंट-मामला” से तात्पर्य ऐसे मामले से है जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध से संबंधित हो।
(2) यहाँ प्रयुक्त शब्द और अभिव्यक्तियाँ जो परिभाषित नहीं हैं, परन्तु सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2 ऑफ 2000) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 में परिभाषित हैं, उनका वही अर्थ होगा जो क्रमशः उस अधिनियम और संहिता में उन्हें दिया गया है।
पूरा पढ़ें: BNSS §2(क) “ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक” का अर्थ है वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग, पहचान, तलाशी और साक्ष्य की जब्ती की प्रक्रियाओं की रिकॉर्डिंग, इलेक्ट्रॉनिक संचार का प्रसारण और ऐसे अन्य उद्देश्यों के लिए तथा ऐसे अन्य साधनों द्वारा किसी भी संचार उपकरण का उपयोग, जैसा कि राज्य सरकार नियमों द्वारा प्रदान कर सकती है;
(ख) “जमानत” का अर्थ है किसी अपराध के आरोपित या संदिग्ध व्यक्ति को किसी अधिकारी या न्यायालय द्वारा लगाई गई कुछ शर्तों पर कानून की हिरासत से रिहा करना, बशर्ते कि वह व्यक्ति किसी बांड या जमानत बांड पर हस्ताक्षर करे;
(ग) “जमानती अपराध” से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जिसे प्रथम अनुसूची में जमानती के रूप में दर्शाया गया हो, या जिसे उस समय लागू किसी अन्य कानून द्वारा जमानती बनाया गया हो; और “गैर-जमानती अपराध” से तात्पर्य किसी अन्य अपराध से है;
(घ) “जमानत बांड” से तात्पर्य जमानतदार के साथ रिहाई के लिए दिए गए वचन से है;
(ई) “बॉन्ड” से तात्पर्य व्यक्तिगत बॉन्ड या बिना ज़मानत के रिहाई के लिए वचनबद्धता से है;
(f) “आरोप” में प्रभार का कोई भी शीर्ष शामिल है जब प्रभार में एक से अधिक शीर्ष हों;
(g) “संज्ञेय अपराध” से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जिसके लिए, और “संज्ञेय मामला” से तात्पर्य ऐसे मामले से है जिसमें, कोई पुलिस अधिकारी, प्रथम अनुसूची के अनुसार या उस समय लागू किसी अन्य कानून के तहत, बिना वारंट के गिरफ्तार कर सकता है;
(h) “शिकायत” से तात्पर्य किसी मजिस्ट्रेट को मौखिक या लिखित रूप में इस संहिता के अंतर्गत कार्रवाई करने के उद्देश्य से दिए गए किसी आरोप से है कि किसी व्यक्ति ने, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात, कोई अपराध किया है, परन्तु इसमें पुलिस रिपोर्ट शामिल नहीं है।
स्पष्टीकरण.—किसी पुलिस अधिकारी द्वारा किसी मामले में बनाई गई रिपोर्ट, जिसमें जांच के बाद गैर-संज्ञेय अपराध का खुलासा होता है, शिकायत मानी जाएगी; और पुलिस अधिकारी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, जिसमें टेलीफोन, मोबाइल शामिल हैं, का उपयोग करता है;
(i) “इलेक्ट्रॉनिक संचार” से तात्पर्य किसी भी लिखित, मौखिक, चित्रमय सूचना या वीडियो सामग्री के संचार से है, जिसे टेलीफोन, मोबाइल सहित किसी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के माध्यम से प्रसारित या स्थानांतरित किया जाता है (चाहे एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को, या एक उपकरण से दूसरे उपकरण को, या एक व्यक्ति से किसी उपकरण को, या किसी उपकरण से किसी व्यक्ति को)।
फोन, या अन्य वायरलेस दूरसंचार उपकरण, या कंप्यूटर, या ऑडियो-वीडियो प्लेयर या कैमरा या कोई अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरण या इलेक्ट्रॉनिक रूप, जैसा कि केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट किया जा सकता है;
(j) “उच्च न्यायालय” से तात्पर्य है,—
(i) किसी राज्य के संबंध में, उस राज्य का उच्च न्यायालय;
(ii) किसी ऐसे केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में, जिस पर किसी राज्य के उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र को विधि द्वारा विस्तारित किया गया है, वह उच्च न्यायालय;
(iii) किसी अन्य केंद्र शासित प्रदेश के संबंध में, भारत के सर्वोच्च न्यायालय के अलावा उस प्रदेश का सर्वोच्च आपराधिक अपील न्यायालय;
(k) “जांच” से तात्पर्य इस संहिता के अंतर्गत किसी मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा मुकदमे के अलावा की गई प्रत्येक जांच से है;
(एल) “जांच” में इस संहिता के अंतर्गत साक्ष्य एकत्र करने हेतु पुलिस अधिकारी द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति (मजिस्ट्रेट के अतिरिक्त) द्वारा की जाने वाली सभी कार्यवाही शामिल है जिसे मजिस्ट्रेट द्वारा इस संबंध में अधिकृत किया गया हो।
स्पष्टीकरण.—जहां किसी विशेष अधिनियम के प्रावधान इस संहिता के प्रावधानों के साथ असंगत हों, वहां विशेष अधिनियम के प्रावधान प्रभावी होंगे;
(m) “न्यायिक कार्यवाही” में कोई भी ऐसी कार्यवाही शामिल है जिसके दौरान शपथ पर कानूनी रूप से साक्ष्य लिया जाता है या लिया जा सकता है;
(n) न्यायालय या मजिस्ट्रेट के संबंध में “स्थानीय क्षेत्राधिकार” से तात्पर्य उस स्थानीय क्षेत्र से है जिसके भीतर न्यायालय या मजिस्ट्रेट इस संहिता के अधीन अपनी सभी या कोई भी शक्तियाँ प्रयोग कर सकता है और ऐसा स्थानीय क्षेत्र राज्य के संपूर्ण भाग या राज्य के किसी भाग को समाहित कर सकता है, जैसा कि राज्य सरकार अधिसूचना द्वारा निर्दिष्ट करे;
(ओ) “गैर-संज्ञेय अपराध” से तात्पर्य ऐसे अपराध से है जिसके लिए, और “गैर-संज्ञेय मामला” से तात्पर्य ऐसे मामले से है जिसमें, किसी पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का अधिकार नहीं है;
(पी) “अधिसूचना” से तात्पर्य राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना से है;
(q) “अपराध” से तात्पर्य किसी भी ऐसे कार्य या चूक से है जिसे उस समय लागू किसी कानून द्वारा दंडनीय बनाया गया हो और इसमें कोई भी ऐसा कार्य शामिल है जिसके संबंध में पशु अतिक्रमण अधिनियम, 1871 (1 ऑफ 1871) की धारा 20 के तहत शिकायत की जा सकती है;
(r) “पुलिस स्टेशन के प्रभारी अधिकारी” में, जब पुलिस स्टेशन का प्रभारी अधिकारी थाने से अनुपस्थित हो या बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो, तो पुलिस अधिकारी भी शामिल है।
थाने में उपस्थित वह अधिकारी जो ऐसे अधिकारी के बाद रैंक में अगला हो और कांस्टेबल से ऊपर के रैंक का हो, या जब राज्य सरकार ऐसा निर्देश दे, तो कोई अन्य पुलिस अधिकारी जो वहां उपस्थित हो;
(s) “स्थान” में घर, भवन, तम्बू, वाहन और पोत शामिल हैं;
(टी) “पुलिस रिपोर्ट” से तात्पर्य धारा 193 की उपधारा (3) के अंतर्गत किसी पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट को भेजी गई रिपोर्ट से है;
(u) “पुलिस स्टेशन” से तात्पर्य राज्य सरकार द्वारा सामान्यतः या विशेषतः पुलिस स्टेशन घोषित किए गए किसी भी चौकी या स्थान से है, और इसमें राज्य सरकार द्वारा इस संबंध में निर्दिष्ट कोई भी स्थानीय क्षेत्र शामिल है;
(v) “लोक अभियोजक” से तात्पर्य धारा 18 के अधीन नियुक्त किसी व्यक्ति से है, और इसमें लोक अभियोजक के निर्देशों के अधीन कार्य करने वाला कोई व्यक्ति भी शामिल है;
(w) “उप-मंडल” से तात्पर्य जिले के उप-मंडल से है;
(x) “समन-मामला” से तात्पर्य किसी अपराध से संबंधित मामले से है, जो वारंट-मामला न हो;
(y) “पीड़ित” से तात्पर्य ऐसे व्यक्ति से है जिसे अभियुक्त व्यक्ति के कृत्य या चूक के कारण कोई हानि या चोट लगी हो तथा इसमें ऐसे पीड़ित का अभिभावक या कानूनी उत्तराधिकारी भी शामिल है;
(ज़) “वारंट-मामला” से तात्पर्य ऐसे मामले से है जो मृत्युदंड, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय अपराध से संबंधित हो।
(2) यहाँ प्रयुक्त शब्द और अभिव्यक्तियाँ जो परिभाषित नहीं हैं, परन्तु सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2 ऑफ 2000) और भारतीय न्याय संहिता, 2023 में परिभाषित हैं, उनका वही अर्थ होगा जो क्रमशः उस अधिनियम और संहिता में उन्हें दिया गया है।
नया कानून
CrPC §2
धारा 2. परिभाषाएं
2. परिभाषाएं
इस संहिता में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—
(क) "जमानतीय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या जो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है; और "अजमानतीय अपराध" से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है;
(ख) "आरोप" के अंतर्गत, जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हैं तब, आरोप का कोई शीर्ष भी है;
(ग) "संज्ञेय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है और "संज्ञेय मामला" से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिसमें पुलिस अधिकारी, प्रथम अनुसूची के अनुसार या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन, वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकता है;
(घ) "परिवाद" से इस संहिता के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा कार्रवाई किए जाने की दृष्टि से मौखिक रूप में या लिखित रूप में उससे किया गया यह अभिकथन अभिप्रेत है कि किसी व्यक्ति ने, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात, अपराध किया है, किन्तु इसके अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट नहीं है।
स्पष्टीकरण—ऐसे मामले में, जो अन्वेषण के पश्चात् किसी असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट करता है, पुलिस अधिकारी द्वारा की गई रिपोर्ट परिवाद समझी जाएगी; और जिस पुलिस अधिकारी द्वारा ऐसी रिपोर्ट की गई है, वह परिवादी समझा जाएगा;
(ङ) "उच्च न्यायालय" से अभिप्रेत है—
(i) किसी राज्य के संबंध में, उस राज्य का उच्च न्यायालय;
(ii) ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जिस पर किसी राज्य के उच्च न्यायालय की अधिकारिता विधि द्वारा विस्तारित कर दी गई है, वह उच्च न्यायालय;
(iii) किसी अन्य संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, भारत के उच्चतम न्यायालय से भिन्न, उस राज्यक्षेत्र के लिए दांडिक अपील का उच्चतम न्यायालय;
(च) "भारत" से वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जिन पर इस संहिता का विस्तार है;
(छ) "जांच" से इस संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा की गई ऐसी हर जांच अभिप्रेत है जो विचारण नहीं है;
(ज) "अन्वेषण" के अंतर्गत वे सब कार्यवाहियां हैं जो इस संहिता के अधीन कोई पुलिस अधिकारी या (मजिस्ट्रेट से भिन्न) कोई ऐसा व्यक्ति, जो मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया है, साक्ष्य एकत्र करने के लिए करता है;
(झ) "न्यायिक कार्यवाही" के अंतर्गत कोई ऐसी कार्यवाही है जिसके अनुक्रम में साक्ष्य शपथ पर विधित: लिया जाता है या लिया जा सकता है;
(ञ) "स्थानीय अधिकारिता" से, किसी न्यायालय या मजिस्ट्रेट के संबंध में, वह स्थानीय क्षेत्र अभिप्रेत है जिसके भीतर वह न्यायालय या मजिस्ट्रेट इस संहिता के अधीन अपनी सब या कोई शक्तियां प्रयोग कर सकता है, और ऐसे स्थानीय क्षेत्र के अंतर्गत संपूर्ण राज्य या राज्य का कोई भाग हो सकेगा, जैसा राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;
(ट) "महानगर क्षेत्र" से धारा 8 के अधीन महानगर क्षेत्र घोषित किया गया, या घोषित किया गया समझा गया, क्षेत्र अभिप्रेत है;
(ठ) "असंज्ञेय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है और "असंज्ञेय मामला" से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिसमें पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का प्राधिकार नहीं है;
(ड) "अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ढ) "अपराध" से कोई ऐसा कार्य या लोप अभिप्रेत है जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा दंडनीय बनाया गया है और इसके अंतर्गत कोई ऐसा कार्य भी है जिसके बारे में पशु-अतिचार अधिनियम, 1871 (1871 का 1) की धारा 20 के अधीन परिवाद किया जा सकता है;
(ण) "पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी" के अंतर्गत, जब पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी थाना-भवन से अनुपस्थित है या बीमारी अथवा अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब, थाना-भवन में उपस्थित वह पुलिस अधिकारी है जो ऐसे अधिकारी से पंक्ति में अगला है और आरक्षी की पंक्ति से ऊपर है, अथवा जब राज्य सरकार ऐसा निदेश दे तब, इस प्रकार उपस्थित कोई अन्य पुलिस अधिकारी है;
(त) "स्थान" के अंतर्गत गृह, भवन, तंबू, यान और जलयान भी हैं;
(थ) "प्लीडर" से, जब वह किसी न्यायालय की किसी कार्यवाही के संबंध में प्रयुक्त होता है, ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन ऐसे न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने के लिए प्राधिकृत है, और इसके अंतर्गत ऐसी कार्यवाही में कार्य करने के लिए न्यायालय की अनुज्ञा से नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति भी है;
(द) "पुलिस रिपोर्ट" से धारा 173 की उपधारा (2) के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट को भेजी गई रिपोर्ट अभिप्रेत है;
(ध) "पुलिस थाना" से कोई ऐसी चौकी या स्थान अभिप्रेत है जिसे राज्य सरकार ने साधारणतया या विशेषतया पुलिस थाना घोषित किया है, और इसके अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई स्थानीय क्षेत्र भी है;
(न) "विहित" से इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(प) "लोक अभियोजक" से धारा 24 के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत लोक अभियोजक के निदेशाधीन कार्य करने वाला कोई व्यक्ति भी है;
(फ) "उपखंड" से किसी जिले का उपखंड अभिप्रेत है;
(ब) "समन-मामला" से ऐसे अपराध से संबंधित मामला अभिप्रेत है जो वारंट-मामला नहीं है;
(बक) "पीड़ित" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे उस कार्य या लोप के कारण, जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है, कोई हानि या क्षति कारित हुई है, और "पीड़ित" पद के अंतर्गत उसका संरक्षक या विधिक वारिस भी है;
(भ) "वारंट-मामला" से ऐसे अपराध से संबंधित मामला अभिप्रेत है जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है;
(म) इसमें प्रयुक्त और अपरिभाषित, किन्तु भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में परिभाषित, शब्दों और पदों के वही अर्थ होंगे जो उस संहिता में उन्हें क्रमशः दिए गए हैं।
पूरा पढ़ें: CrPC §2इस संहिता में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,—
(क) "जमानतीय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो प्रथम अनुसूची में जमानतीय के रूप में दिखाया गया है या जो तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा जमानतीय बनाया गया है; और "अजमानतीय अपराध" से कोई अन्य अपराध अभिप्रेत है;
(ख) "आरोप" के अंतर्गत, जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हैं तब, आरोप का कोई शीर्ष भी है;
(ग) "संज्ञेय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है और "संज्ञेय मामला" से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिसमें पुलिस अधिकारी, प्रथम अनुसूची के अनुसार या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन, वारंट के बिना गिरफ्तार कर सकता है;
(घ) "परिवाद" से इस संहिता के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा कार्रवाई किए जाने की दृष्टि से मौखिक रूप में या लिखित रूप में उससे किया गया यह अभिकथन अभिप्रेत है कि किसी व्यक्ति ने, चाहे वह ज्ञात हो या अज्ञात, अपराध किया है, किन्तु इसके अंतर्गत पुलिस रिपोर्ट नहीं है।
स्पष्टीकरण—ऐसे मामले में, जो अन्वेषण के पश्चात् किसी असंज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट करता है, पुलिस अधिकारी द्वारा की गई रिपोर्ट परिवाद समझी जाएगी; और जिस पुलिस अधिकारी द्वारा ऐसी रिपोर्ट की गई है, वह परिवादी समझा जाएगा;
(ङ) "उच्च न्यायालय" से अभिप्रेत है—
(i) किसी राज्य के संबंध में, उस राज्य का उच्च न्यायालय;
(ii) ऐसे संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, जिस पर किसी राज्य के उच्च न्यायालय की अधिकारिता विधि द्वारा विस्तारित कर दी गई है, वह उच्च न्यायालय;
(iii) किसी अन्य संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, भारत के उच्चतम न्यायालय से भिन्न, उस राज्यक्षेत्र के लिए दांडिक अपील का उच्चतम न्यायालय;
(च) "भारत" से वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जिन पर इस संहिता का विस्तार है;
(छ) "जांच" से इस संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा की गई ऐसी हर जांच अभिप्रेत है जो विचारण नहीं है;
(ज) "अन्वेषण" के अंतर्गत वे सब कार्यवाहियां हैं जो इस संहिता के अधीन कोई पुलिस अधिकारी या (मजिस्ट्रेट से भिन्न) कोई ऐसा व्यक्ति, जो मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया है, साक्ष्य एकत्र करने के लिए करता है;
(झ) "न्यायिक कार्यवाही" के अंतर्गत कोई ऐसी कार्यवाही है जिसके अनुक्रम में साक्ष्य शपथ पर विधित: लिया जाता है या लिया जा सकता है;
(ञ) "स्थानीय अधिकारिता" से, किसी न्यायालय या मजिस्ट्रेट के संबंध में, वह स्थानीय क्षेत्र अभिप्रेत है जिसके भीतर वह न्यायालय या मजिस्ट्रेट इस संहिता के अधीन अपनी सब या कोई शक्तियां प्रयोग कर सकता है, और ऐसे स्थानीय क्षेत्र के अंतर्गत संपूर्ण राज्य या राज्य का कोई भाग हो सकेगा, जैसा राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;
(ट) "महानगर क्षेत्र" से धारा 8 के अधीन महानगर क्षेत्र घोषित किया गया, या घोषित किया गया समझा गया, क्षेत्र अभिप्रेत है;
(ठ) "असंज्ञेय अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है और "असंज्ञेय मामला" से ऐसा मामला अभिप्रेत है जिसमें पुलिस अधिकारी को वारंट के बिना गिरफ्तार करने का प्राधिकार नहीं है;
(ड) "अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ढ) "अपराध" से कोई ऐसा कार्य या लोप अभिप्रेत है जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा दंडनीय बनाया गया है और इसके अंतर्गत कोई ऐसा कार्य भी है जिसके बारे में पशु-अतिचार अधिनियम, 1871 (1871 का 1) की धारा 20 के अधीन परिवाद किया जा सकता है;
(ण) "पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी" के अंतर्गत, जब पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी थाना-भवन से अनुपस्थित है या बीमारी अथवा अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब, थाना-भवन में उपस्थित वह पुलिस अधिकारी है जो ऐसे अधिकारी से पंक्ति में अगला है और आरक्षी की पंक्ति से ऊपर है, अथवा जब राज्य सरकार ऐसा निदेश दे तब, इस प्रकार उपस्थित कोई अन्य पुलिस अधिकारी है;
(त) "स्थान" के अंतर्गत गृह, भवन, तंबू, यान और जलयान भी हैं;
(थ) "प्लीडर" से, जब वह किसी न्यायालय की किसी कार्यवाही के संबंध में प्रयुक्त होता है, ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन ऐसे न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने के लिए प्राधिकृत है, और इसके अंतर्गत ऐसी कार्यवाही में कार्य करने के लिए न्यायालय की अनुज्ञा से नियुक्त कोई अन्य व्यक्ति भी है;
(द) "पुलिस रिपोर्ट" से धारा 173 की उपधारा (2) के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा मजिस्ट्रेट को भेजी गई रिपोर्ट अभिप्रेत है;
(ध) "पुलिस थाना" से कोई ऐसी चौकी या स्थान अभिप्रेत है जिसे राज्य सरकार ने साधारणतया या विशेषतया पुलिस थाना घोषित किया है, और इसके अंतर्गत राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई स्थानीय क्षेत्र भी है;
(न) "विहित" से इस संहिता के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(प) "लोक अभियोजक" से धारा 24 के अधीन नियुक्त कोई व्यक्ति अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत लोक अभियोजक के निदेशाधीन कार्य करने वाला कोई व्यक्ति भी है;
(फ) "उपखंड" से किसी जिले का उपखंड अभिप्रेत है;
(ब) "समन-मामला" से ऐसे अपराध से संबंधित मामला अभिप्रेत है जो वारंट-मामला नहीं है;
(बक) "पीड़ित" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे उस कार्य या लोप के कारण, जिसके लिए अभियुक्त व्यक्ति पर आरोप लगाया गया है, कोई हानि या क्षति कारित हुई है, और "पीड़ित" पद के अंतर्गत उसका संरक्षक या विधिक वारिस भी है;
(भ) "वारंट-मामला" से ऐसे अपराध से संबंधित मामला अभिप्रेत है जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है;
(म) इसमें प्रयुक्त और अपरिभाषित, किन्तु भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) में परिभाषित, शब्दों और पदों के वही अर्थ होंगे जो उस संहिता में उन्हें क्रमशः दिए गए हैं।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
