पाठ बदला गया है
BNS धारा 229 अब IPC धारा 193 है
झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने पर दंड।
पुराना कानून
BNS §229
झूठे साक्ष्य प्रस्तुत करने पर दंड।
(1) जो कोई जानबूझकर न्यायिक कार्यवाही के किसी भी चरण में झूठी गवाही देता है, या न्यायिक कार्यवाही के किसी भी चरण में उपयोग किए जाने के उद्देश्य से झूठी गवाही गढ़ता है, उसे किसी भी प्रकार के कारावास से सात वर्ष तक की अवधि के लिए दंडित किया जाएगा, और उस पर दस हजार रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट मामले के अतिरिक्त किसी अन्य मामले में जो कोई जानबूझकर झूठी गवाही देता है या झूठी गवाही गढ़ता है, उसे किसी भी प्रकार के कारावास से तीन वर्ष तक की अवधि के लिए दंडित किया जाएगा और उस पर पाँच हजार रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जाएगा।
स्पष्टीकरण 1.—कोर्ट-मार्शल के समक्ष मुकदमा एक न्यायिक कार्यवाही है।
स्पष्टीकरण 2.—अदालत के समक्ष कार्यवाही से पहले कानून द्वारा निर्देशित जांच न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, भले ही वह जांच अदालत के समक्ष न हो।
चित्रण।
जेड को मुकदमे के लिए भेजा जाना चाहिए या नहीं, यह निर्धारित करने के उद्देश्य से मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही पूछताछ में, ए शपथ पर एक ऐसा बयान देता है जिसे वह जानता है कि वह झूठा है। चूंकि यह पूछताछ न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, इसलिए ए ने झूठी गवाही दी है।
स्पष्टीकरण 3.—कानून के अनुसार न्यायालय द्वारा निर्देशित और न्यायालय के अधिकार के तहत संचालित जांच न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, भले ही वह जांच न्यायालय के समक्ष न हो।
चित्रण।
न्यायालय द्वारा भूमि की सीमाओं का प्रत्यक्ष निर्धारण करने के लिए नियुक्त अधिकारी के समक्ष चल रही पूछताछ में, 'ए' शपथपूर्वक एक ऐसा बयान देता है जिसे वह जानता है कि वह झूठा है। चूंकि यह पूछताछ न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, इसलिए 'ए' ने झूठी गवाही दी है।
पूरा पढ़ें: BNS §229(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट मामले के अतिरिक्त किसी अन्य मामले में जो कोई जानबूझकर झूठी गवाही देता है या झूठी गवाही गढ़ता है, उसे किसी भी प्रकार के कारावास से तीन वर्ष तक की अवधि के लिए दंडित किया जाएगा और उस पर पाँच हजार रुपये तक का जुर्माना भी लगाया जाएगा।
स्पष्टीकरण 1.—कोर्ट-मार्शल के समक्ष मुकदमा एक न्यायिक कार्यवाही है।
स्पष्टीकरण 2.—अदालत के समक्ष कार्यवाही से पहले कानून द्वारा निर्देशित जांच न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, भले ही वह जांच अदालत के समक्ष न हो।
चित्रण।
जेड को मुकदमे के लिए भेजा जाना चाहिए या नहीं, यह निर्धारित करने के उद्देश्य से मजिस्ट्रेट के समक्ष चल रही पूछताछ में, ए शपथ पर एक ऐसा बयान देता है जिसे वह जानता है कि वह झूठा है। चूंकि यह पूछताछ न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, इसलिए ए ने झूठी गवाही दी है।
स्पष्टीकरण 3.—कानून के अनुसार न्यायालय द्वारा निर्देशित और न्यायालय के अधिकार के तहत संचालित जांच न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, भले ही वह जांच न्यायालय के समक्ष न हो।
चित्रण।
न्यायालय द्वारा भूमि की सीमाओं का प्रत्यक्ष निर्धारण करने के लिए नियुक्त अधिकारी के समक्ष चल रही पूछताछ में, 'ए' शपथपूर्वक एक ऐसा बयान देता है जिसे वह जानता है कि वह झूठा है। चूंकि यह पूछताछ न्यायिक कार्यवाही का एक चरण है, इसलिए 'ए' ने झूठी गवाही दी है।
नया कानून
IPC §193
धारा 193 - मिथ्या साक्ष्य के लिए दण्ड
मिथ्या साक्ष्य के लिए दण्ड
जो कोई किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में साशय मिथ्या साक्ष्य देगा, या किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग में लाए जाने के प्रयोजन से मिथ्या साक्ष्य गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ;
और जो कोई किसी अन्य दशा में साशय मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
स्पष्टीकरण 1 - सेना-न्यायालय के समक्ष विचारण न्यायिक कार्यवाही है ।
स्पष्टीकरण 2 - न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के पूर्ववर्ती ऐसा अन्वेषण, जिसका विधि द्वारा निदेश दिया गया हो, न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण न्यायालय के समक्ष न भी होता हो ।
दृष्टांत :
क, मजिस्ट्रेट के समक्ष इस प्रयोजन से की गई जांच में कि य को विचारण के लिए सुपुर्द किया जाना चाहिए या नहीं, शपथ पर ऐसा कथन करता है, जिसका मिथ्या होना वह जानता है । यह जांच न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम होने के कारण क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है ।
स्पष्टीकरण 3 - विधि के अनुसार न्यायालय द्वारा निदिष्ट और न्यायालय के प्राधिकार के अधीन संचालित अन्वेषण न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण न्यायालय के समक्ष न भी होता हो ।
दृष्टांत :
क, भूमि की सीमाओं को मौके पर अभिनिश्चित करने के लिए न्यायालय द्वारा प्रतिनियुक्त आफिसर के समक्ष की गई जांच में शपथ पर ऐसा कथन करता है, जिसका मिथ्या होना वह जानता है । यह जांच न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम होने के कारण क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है ।
पूरा पढ़ें: IPC §193जो कोई किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में साशय मिथ्या साक्ष्य देगा, या किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में उपयोग में लाए जाने के प्रयोजन से मिथ्या साक्ष्य गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ;
और जो कोई किसी अन्य दशा में साशय मिथ्या साक्ष्य देगा या गढ़ेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डित किया जाएगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
स्पष्टीकरण 1 - सेना-न्यायालय के समक्ष विचारण न्यायिक कार्यवाही है ।
स्पष्टीकरण 2 - न्यायालय के समक्ष किसी कार्यवाही के पूर्ववर्ती ऐसा अन्वेषण, जिसका विधि द्वारा निदेश दिया गया हो, न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण न्यायालय के समक्ष न भी होता हो ।
दृष्टांत :
क, मजिस्ट्रेट के समक्ष इस प्रयोजन से की गई जांच में कि य को विचारण के लिए सुपुर्द किया जाना चाहिए या नहीं, शपथ पर ऐसा कथन करता है, जिसका मिथ्या होना वह जानता है । यह जांच न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम होने के कारण क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है ।
स्पष्टीकरण 3 - विधि के अनुसार न्यायालय द्वारा निदिष्ट और न्यायालय के प्राधिकार के अधीन संचालित अन्वेषण न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम है, चाहे वह अन्वेषण न्यायालय के समक्ष न भी होता हो ।
दृष्टांत :
क, भूमि की सीमाओं को मौके पर अभिनिश्चित करने के लिए न्यायालय द्वारा प्रतिनियुक्त आफिसर के समक्ष की गई जांच में शपथ पर ऐसा कथन करता है, जिसका मिथ्या होना वह जानता है । यह जांच न्यायिक कार्यवाही का एक प्रक्रम होने के कारण क ने मिथ्या साक्ष्य दिया है ।
1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों पर पुराना कानून लागू रहता है। यह जानकारी शैक्षिक है, कानूनी सलाह नहीं।
