शिकायत कहाँ करें

किस थाने में, किस अधिकारी के पास और किस न्यायालय में — हर बात के साथ उसकी धारा, ताकि आप काउंटर पर उसे दिखा सकें।

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ज़ीरो एफ़आईआर — शिकायत किसी भी थाने में दर्ज होगी

थाना यह नहीं कह सकता कि "यह हमारे क्षेत्र का मामला नहीं है, वहाँ जाइए"। शिकायत यहीं दर्ज होगी।

भा.ना.सु.सं. धारा 173(पहले दं.प्र.सं. धारा 154)

ज़ीरो एफ़आईआर — शिकायत किसी भी थाने में दर्ज होगी

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(1) थाने के भारसाधक अधिकारी पर यह कर्तव्य डालती है कि संज्ञेय अपराध की सूचना लिखी जाए और दर्ज की जाए — और यह शब्दों में कहती है कि ऐसा होगा, चाहे अपराध किसी भी क्षेत्र में हुआ हो। पुरानी दं.प्र.सं. धारा 154(1) में यह शब्द नहीं थे, पर न्यायालयों ने वही कर्तव्य माना था। इसी को ज़ीरो एफ़आईआर कहते हैं: प्राथमिकी वहीं दर्ज होती है जहाँ आप खड़े हैं, उसे शून्य संख्या दी जाती है, और फिर वह उस थाने को भेज दी जाती है जिसकी अधिकारिता है।

सतविंदर कौर बनाम राज्य (राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार) (1999) में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि थाने का अधिकारी क्षेत्रीय अधिकारिता के आधार पर प्राथमिकी दर्ज करने से इनकार नहीं कर सकता; जाँच के बाद यदि अपराध उसकी सीमा से बाहर निकले तो मामला अधिकारिता वाले न्यायालय को भेजा जाएगा। ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) में संविधान पीठ ने कहा कि सूचना से संज्ञेय अपराध बनता हो तो दं.प्र.सं. धारा 154 (अब भा.ना.सु.सं. धारा 173) के अधीन प्राथमिकी दर्ज करना अनिवार्य है — भा.ना.सु.सं. ने इसमें केवल तीन से सात वर्ष वाले अपराधों के लिए 14 दिन की प्रारंभिक जाँच का अपवाद जोड़ा है (धारा 173(3))।

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काउंटर पर और क्या आपका अधिकार है

  • भा.ना.सु.सं. धारा 173(2)(पहले दं.प्र.सं. धारा 154(2))

    प्राथमिकी की प्रति मुफ़्त, उसी समय

    भा.ना.सु.सं. धारा 173(2) (पहले दं.प्र.सं. धारा 154(2)) के अनुसार दर्ज की गई सूचना की एक प्रति सूचना देने वाले या पीड़ित को तुरंत और नि:शुल्क दी जाएगी। यह माँगने की चीज़ नहीं, देने का कर्तव्य है — और उसी प्रति पर लिखी प्राथमिकी संख्या आगे हर आवेदन में काम आती है।

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  • भा.ना.सु.सं. धारा 173(1)

    इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी सूचना दी जा सकती है

    भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 173(1) के अनुसार सूचना इलेक्ट्रॉनिक संचार द्वारा भी दी जा सकती है; ऐसी सूचना तभी अभिलिखित मानी जाएगी जब सूचना देने वाला तीन दिन के भीतर उस पर हस्ताक्षर कर दे। यह उपबंध दंड प्रक्रिया संहिता में नहीं था।

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  • भा.ना.सु.सं. धारा 173(1)(पहले दं.प्र.सं. धारा 154(1))

    कुछ अपराधों में सूचना महिला अधिकारी लिखेगी

    भा.ना.सु.सं. धारा 173(1) के परंतुक (पहले दं.प्र.सं. धारा 154(1) का परंतुक) के अनुसार यौन अपराधों से संबंधित सूचना किसी महिला पुलिस अधिकारी या महिला अधिकारी द्वारा ही अभिलिखित की जाएगी; और यदि पीड़िता अस्थायी या स्थायी रूप से मानसिक या शारीरिक रूप से नि:शक्त है तो सूचना उसके निवास पर या उसकी सुविधा के स्थान पर, दुभाषिए या विशेषज्ञ की उपस्थिति में, वीडियो रिकॉर्डिंग के साथ ली जाएगी।

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  • भारतीय न्याय संहिता धारा 199(ग) (पहले भा.दं.सं. धारा 166क(ग))

    कुछ मामलों में दर्ज न करना स्वयं अपराध है

    भारतीय न्याय संहिता की धारा 199(ग) (पहले भा.दं.सं. धारा 166क(ग)) के अनुसार जो लोक सेवक भा.ना.सु.सं. धारा 173(1) (पहले दं.प्र.सं. धारा 154(1)) में गिनाए गए अपराधों की सूचना अभिलिखित करने में विफल रहता है, वह कठोर कारावास से दंडनीय है, जो छह मास से कम नहीं होगा और दो वर्ष तक हो सकता है, तथा जुर्माने से भी।

  • भा.ना.सु.सं. धारा 197(पहले दं.प्र.सं. धारा 177)

    आगे की जाँच और सुनवाई कहाँ होगी

    भा.ना.सु.सं. धारा 197 (पहले दं.प्र.सं. धारा 177) के अनुसार साधारणतया हर अपराध की जाँच और विचारण उस न्यायालय द्वारा किया जाएगा जिसकी स्थानीय अधिकारिता में वह अपराध किया गया। इसीलिए ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज होने के बाद उस थाने को भेजी जाती है — पर यह भेजना दर्ज करने के बाद होता है, पहले नहीं। जहाँ यह अनिश्चित हो कि अपराध किस क्षेत्र में हुआ, या वह एक से अधिक क्षेत्रों में फैला हो या लगातार चलने वाला अपराध हो, वहाँ भा.ना.सु.सं. धारा 198 (पहले दं.प्र.सं. धारा 178) के अनुसार उनमें से किसी भी न्यायालय को अधिकारिता है।

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अगर थाना दर्ज करने से मना कर दे

तीन सीढ़ियाँ, इसी क्रम में। मजिस्ट्रेट यह पूछेगा कि पिछली सीढ़ी चढ़ी या नहीं, इसलिए क्रम छोड़िए मत — और हर चरण की एक प्रति अपने पास रखिए।

  1. चरण 1भा.ना.सु.सं. धारा 173(4)(पहले दं.प्र.सं. धारा 154(3))

    थाने ने दर्ज नहीं किया — पुलिस अधीक्षक को लिखिए

    किसे: पुलिस अधीक्षक

    भा.ना.सु.सं. धारा 173(4) (पहले दं.प्र.सं. धारा 154(3)) के अनुसार यदि थाने का भारसाधक अधिकारी सूचना दर्ज करने से इनकार करता है, तो व्यथित व्यक्ति सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा पुलिस अधीक्षक को भेज सकता है। यदि अधीक्षक का समाधान हो जाता है कि सूचना से संज्ञेय अपराध बनता है, तो वह स्वयं जाँच करेगा या किसी अधीनस्थ अधिकारी से जाँच कराएगा। डाक से भेजने का उल्लेख धारा में ही है — रसीदी डाक की रसीद ही आपका प्रमाण है कि आपने यह चरण पूरा किया।

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  2. चरण 2भा.ना.सु.सं. धारा 175(3)(पहले दं.प्र.सं. धारा 156(3))

    अधीक्षक से भी कुछ नहीं हुआ — मजिस्ट्रेट के पास आवेदन

    किसे: मजिस्ट्रेट

    भा.ना.सु.सं. धारा 175(3) (पहले दं.प्र.सं. धारा 156(3)) के अनुसार धारा 210 के अधीन संज्ञान लेने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट पुलिस को जाँच करने का आदेश दे सकता है। पर अब — जो दं.प्र.सं. में नहीं था — मजिस्ट्रेट को पहले धारा 173(4) के अधीन पुलिस अधीक्षक को किए गए आवेदन पर, शपथपत्र सहित, विचार करना होगा और उस पुलिस अधिकारी का कथन सुनना होगा — इसीलिए ऊपर का चरण छोड़ा नहीं जा सकता।

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  3. चरण 3भा.ना.सु.सं. धारा 223(पहले दं.प्र.सं. धारा 200)

    या सीधे परिवाद दायर कीजिए

    किसे: मजिस्ट्रेट

    भा.ना.सु.सं. धारा 210(1)(क) (पहले दं.प्र.सं. धारा 190(1)(क)) के अनुसार मजिस्ट्रेट परिवाद पर भी अपराध का संज्ञान ले सकता है — पुलिस रिपोर्ट की प्रतीक्षा किए बिना। धारा 223 (पहले दं.प्र.सं. धारा 200) के अनुसार परिवाद लेने वाला मजिस्ट्रेट परिवादी और उपस्थित साक्षियों की शपथ पर परीक्षा करेगा — और एक नया परंतुक जोड़ा गया है: अभियुक्त को सुनवाई का अवसर दिए बिना संज्ञान नहीं लिया जाएगा।

साइबर अपराध — अधिकारिता आपके अपने शहर की है

ऑनलाइन ठगी में सबसे आम टालमटोल यही है कि "जिस बैंक में पैसा गया वह दूसरे शहर में है, वहीं शिकायत कीजिए"। कानून ऐसा नहीं कहता।

  • भा.ना.सु.सं. धारा 199(पहले दं.प्र.सं. धारा 179)

    जहाँ परिणाम हुआ, वहाँ भी विचारण होगा

    भा.ना.सु.सं. धारा 199 (पहले दं.प्र.सं. धारा 179) के अनुसार जब कोई कार्य इसलिए अपराध है कि कुछ किया गया और उसका कोई परिणाम निकला, तो अपराध की जाँच और विचारण उस न्यायालय द्वारा भी किया जा सकता है जिसकी स्थानीय अधिकारिता में वह परिणाम निकला। ऑनलाइन ठगी में पैसा आपके खाते से आपके शहर में कटा — परिणाम वहीं निकला — इसलिए आपके अपने थाने और न्यायालय को अधिकारिता है, चाहे ठग कहीं भी बैठा हो।

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  • भा.ना.सु.सं. धारा 198(पहले दं.प्र.सं. धारा 178)

    जब यह अनिश्चित हो कि अपराध कहाँ हुआ

    भा.ना.सु.सं. धारा 198 (पहले दं.प्र.सं. धारा 178) के अनुसार जहाँ यह अनिश्चित हो कि अपराध किस स्थानीय क्षेत्र में हुआ, या वह आंशिक रूप से एक क्षेत्र में और आंशिक रूप से दूसरे में हुआ, या वह लगातार चलने वाला अपराध है, वहाँ उनमें से किसी भी न्यायालय द्वारा उसकी जाँच और विचारण किया जा सकता है। साइबर अपराध लगभग हमेशा इसी श्रेणी में आता है।

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  • सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000, धारा 75

    भारत के बाहर से किया गया अपराध भी इसी कानून के अधीन है

    सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 75 के अनुसार यह अधिनियम भारत के बाहर किसी भी व्यक्ति द्वारा किए गए अपराध पर भी लागू होता है, यदि उस कार्य में भारत में स्थित कंप्यूटर, कंप्यूटर प्रणाली या कंप्यूटर नेटवर्क शामिल है। इसलिए "ठग विदेश में है" यह शिकायत न लेने का कारण नहीं है।

राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल और हेल्पलाइन 1930 थाने का विकल्प नहीं हैं — दोनों साथ चलते हैं। पोर्टल पर दर्ज शिकायत उसी क्षेत्र की पुलिस इकाई को जाती है।

मामला किस न्यायालय में जाएगा

यह अपराध की श्रेणी से तय होता है, आपकी पसंद से नहीं। प्रथम अनुसूची हर अपराध के सामने लिखती है कि वह किस न्यायालय द्वारा विचारणीय है।

  • भा.ना.सु.सं. धारा 22(पहले दं.प्र.सं. धारा 28)

    सत्र न्यायालय

    कौन-से अपराध
    सबसे गंभीर अपराध — हत्या, बलात्संग, डकैती और वे सब जिनके सामने प्रथम अनुसूची में "सेशन न्यायालय" लिखा है।
    अधिकतम दंडादेश
    भा.ना.सु.सं. धारा 22 (पहले दं.प्र.सं. धारा 28) के अनुसार सत्र न्यायाधीश या अपर सत्र न्यायाधीश विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी दंडादेश दे सकता है; किंतु मृत्यु दंडादेश उच्च न्यायालय द्वारा पुष्टि के अधीन है।
  • भा.ना.सु.सं. धारा 23(पहले दं.प्र.सं. धारा 29(1))

    मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट

    कौन-से अपराध
    वे अपराध जो मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय हैं और जिनमें सज़ा तीन वर्ष से अधिक हो सकती है।
    अधिकतम दंडादेश
    भा.ना.सु.सं. धारा 23(1) (पहले दं.प्र.सं. धारा 29(1)) के अनुसार मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मृत्यु, आजीवन कारावास और सात वर्ष से अधिक के कारावास को छोड़कर विधि द्वारा प्राधिकृत कोई भी दंडादेश दे सकता है।
  • भा.ना.सु.सं. धारा 23(पहले दं.प्र.सं. धारा 29(2))

    प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट

    कौन-से अपराध
    प्रथम अनुसूची में जिनके सामने "प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट" लिखा है — अधिकांश ठगी, चोरी और साइबर अपराध यहीं आते हैं।
    अधिकतम दंडादेश
    भा.ना.सु.सं. धारा 23(2) के अनुसार तीन वर्ष तक का कारावास, या पचास हज़ार रुपये तक जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा। (पुरानी दं.प्र.सं. धारा 29(2) में जुर्माने की सीमा दस हज़ार रुपये थी और सामुदायिक सेवा नहीं थी।)
  • भा.ना.सु.सं. धारा 23(पहले दं.प्र.सं. धारा 29(3))

    कोई भी मजिस्ट्रेट (द्वितीय श्रेणी सहित)

    कौन-से अपराध
    प्रथम अनुसूची में जिनके सामने "कोई मजिस्ट्रेट" लिखा है — सबसे हल्के अपराध।
    अधिकतम दंडादेश
    भा.ना.सु.सं. धारा 23(3) के अनुसार द्वितीय श्रेणी मजिस्ट्रेट एक वर्ष तक का कारावास, या दस हज़ार रुपये तक जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा दे सकता है। (पुरानी दं.प्र.सं. धारा 29(3) में जुर्माने की सीमा पाँच हज़ार रुपये थी।)
भा.ना.सु.सं. धारा 232(पहले दं.प्र.सं. धारा 209)

सत्र न्यायालय में सीधे नहीं जाया जाता

भा.ना.सु.सं. धारा 232 (पहले दं.प्र.सं. धारा 209) के अनुसार जब अपराध केवल सत्र न्यायालय द्वारा विचारणीय हो, तब मजिस्ट्रेट मामले को सत्र न्यायालय को सुपुर्द करेगा — BNSS में यह संज्ञान के 90 दिन के भीतर करना होता है, जिसे मजिस्ट्रेट कारण लिखकर अधिकतम 180 दिन तक बढ़ा सकता है। अर्थात् गंभीरतम अपराध में भी कार्यवाही मजिस्ट्रेट के समक्ष ही आरंभ होती है — धारा 210 (पहले दं.प्र.सं. 190) के अधीन संज्ञान वही लेता है।

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अपनी धारा का वर्गीकरण देखिएअपराध जाँचक बताता है कि आपकी धारा संज्ञेय है या नहीं, जमानतीय है या नहीं, और किस न्यायालय द्वारा विचारणीय है।

कौन-सी संहिता लागू होगी?

प्रक्रिया: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद दर्ज हर मामले पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता लागू है; उस दिन पहले से लंबित अन्वेषण, जाँच या विचारण दंड प्रक्रिया संहिता के अधीन चलता रहता है (भा.ना.सु.सं. धारा 531(2)(क))। अपराध: 1 जुलाई 2024 को या उसके बाद किया गया कृत्य भारतीय न्याय संहिता के अधीन, उससे पहले का भारतीय दंड संहिता के अधीन।