किस उपबंध के अधीन: भा.ना.सु.सं. धारा 173(4) (दं.प्र.सं. 154(3))
पुलिस अधीक्षक को शिकायत — भा.ना.सु.सं. धारा 173(4) (दं.प्र.सं. धारा 154(3)) — वह कदम जो लोग छोड़ देते हैं
यह प्रारूप अंग्रेज़ी में (English)
खाने भरिए
आप यहाँ जो कुछ भी लिखते हैं वह आपके अपने ब्राउज़र में ही रहता है। न कहीं भेजा जाता है, न सहेजा जाता है, न हमें दिखता है। पन्ना बंद करते ही वह मिट जाता है — इसलिए प्रिंट करने से पहले बंद मत कीजिए।
जो खाना खाली छोड़ेंगे, उसकी जगह प्रिंट में एक लकीर छपेगी — उसे हाथ से भरा जा सकता है। खाली फ़ॉर्म प्रिंट करके साथ ले जाना भी ठीक है।
वैसा ही जैसा आधार या पहचान-पत्र पर है।
समय के क्रम में लिखिए: पहले क्या हुआ, फिर क्या। जो याद नहीं है उसका अनुमान मत लगाइए।
जिस दिन आपने थाने / बैंक को लिखित शिकायत दी थी।
दस्तावेज़
सेवा में,
पुलिस अधीक्षक / वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक
________________
(रजिस्टर्ड डाक से — भेजने की तिथि अभिलेख पर आवश्यक है)
विषय: थानाध्यक्ष, थाना ________________ द्वारा एफ़आईआर दर्ज करने से इनकार — भा.ना.सु.सं. धारा 173(4) [दं.प्र.सं. धारा 154(3)] के अधीन शिकायत।
किस उपबंध के अधीन: भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 173(4) [पहले दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 154(3)]।
महोदय,
1. मैं ________________, निवासी ________________, मोबाइल ________________ हूँ।
2. दिनांक ________________ को मेरे साथ निम्नलिखित घटना हुई, जिससे संज्ञेय अपराध बनता है:
________________
3. दिनांक ________________ को मैंने इसी आशय की लिखित सूचना थानाध्यक्ष, थाना ________________ को दी। उसकी प्रति इस शिकायत के साथ संलग्न है।
4. आज तक उस सूचना पर कोई प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई और न ही मुझे भा.ना.सु.सं. धारा 173(2) [दं.प्र.सं. धारा 154(2)] के अधीन कोई प्रति दी गई।
5. भा.ना.सु.सं. धारा 173(4) [दं.प्र.सं. धारा 154(3)] यह उपबंधित करती है कि थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा सूचना लेखबद्ध करने से इनकार किए जाने से व्यथित कोई भी व्यक्ति ऐसी सूचना का सार लिखित रूप में और डाक द्वारा सम्बद्ध पुलिस अधीक्षक को भेज सकेगा; और पुलिस अधीक्षक, यदि उसका समाधान हो जाता है कि ऐसी सूचना से संज्ञेय अपराध का किया जाना प्रकट होता है, तो या तो स्वयं अन्वेषण करेगा या अपने अधीनस्थ किसी पुलिस अधिकारी द्वारा अन्वेषण किए जाने का निदेश देगा।
6. ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार, (2014) 2 SCC 1 में उच्चतम न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया कि यदि सूचना से संज्ञेय अपराध प्रकट होता है तो धारा 154 दं.प्र.सं. [अब भा.ना.सु.सं. धारा 173] के अधीन एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य है। भा.ना.सु.सं. यही नियम रखती है, एक अपवाद के साथ: तीन से सात वर्ष तक दंडनीय अपराधों में पुलिस उप-अधीक्षक की अनुमति से चौदह दिन तक की प्रारंभिक जाँच हो सकती है (भा.ना.सु.सं. धारा 173(3))।
अतः निवेदन है कि उपर्युक्त सूचना पर एफ़आईआर दर्ज कराई जाए तथा अन्वेषण का निदेश दिया जाए, और की गई कार्रवाई से मुझे लिखित रूप में अवगत कराया जाए।
भवदीय,
________________
________________
स्थान: ________________
दिनांक: ________________
संलग्नक: साथ लगी सूची के अनुसार।साथ क्या लगाना है
- थानाध्यक्ष को दी गई लिखित शिकायत की प्रति, तथा उस पर मिली रसीद या डायरी संख्या।
- रजिस्टर्ड डाक की रसीद। भा.ना.सु.सं. धारा 173(4) (दं.प्र.सं. 154(3)) कहती है 'लिखित रूप में और डाक द्वारा' — हाथ से पहुँचाई गई शिकायत की कोई तिथि अभिलेख पर नहीं होती।
- समर्थन में सबूत: स्क्रीनशॉट, बैंक स्टेटमेंट, चिकित्सा पत्र — जो लागू हो।
- पहचान-पत्र की छायाप्रति।
- पूरे सेट की एक छायाप्रति अपने पास रखिए। भा.ना.सु.सं. धारा 175(3) (दं.प्र.सं. 156(3)) का आवेदन इसी पर टिकता है।
